ऐसी कव्वाली न तो बनी है और न ही आगे कभी बनेगी

एक समय था जब कव्वाली फिल्म की सफलता की गारंटी मानी जाती थी. वैसे तो फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक कवालियां बनी है लेकिन मशहूर फिल्म लेखक विनोद कुमार फिल्म संगीत की दुनिया के उस सिरमौर कव्वाली के बनने के बारे में बता रहे हैं...

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ऐसी कव्वाली न तो बनी है और न ही आगे कभी बनेगी
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एक समय था जब कव्वाली फिल्म की सफलता की गारंटी मानी जाती थी. वैसे तो फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक कवालियां बनी है लेकिन मशहूर फिल्म लेखक विनोद कुमार फिल्म संगीत की दुनिया के उस सिरमौर कव्वाली के बनने के बारे में बता रहे हैं जिसे रिकार्ड होने के बाद भी गायक–गायिकाएं और साजिंदे चौबीसों घंटे बिना थके हुए इस कव्वाली को गाते रहे और स्टूडियो से निकलने वाले हर एक की जुबान पर बस यही था – ऐसी कव्वाली न तो बनी और न आगे कभी बनेगी. 

एक दौर था जब कव्वालियां फिल्मों की जान हुआ करती थीं और इन्हीं कव्वालियों पर फिल्मों की सफलता का दारोमदार होता था. हिन्दी सिनेमा के स्वर्ण युग के दौरान, कव्वाली अपने चरम पर थी और लगभग हर फिल्म में कम से कम एक कव्वाली होती ही थी. 

कव्वाली सूफी इस्लामिक भक्ति गायन का एक ऐसा रूप है  जो मूल रूप से पूरे दक्षिण एशिया में सूफी मंदिरों या दरगाहों में गाई जाती रही हैं. लेकिन जब से फिल्मों में कव्वालियों को शामिल किया जाने लगा तब से कव्वालियां लोकप्रिय होने लगी. 

जहां तक पहली फिल्मी कव्वाली की बात है तो यह 1935 की फिल्म तलाश-ए-हक में कव्वाली थी – 'अल्लाह हूं". इसके बाद एक बहुत ही लोकप्रिय कव्वाली 1945 की फिल्म 'जीनत' के लिए बनी. जिसके बोल हैं आहें ना भरी. जिसे नूरजहां, कल्याणी और जोहरा ने आवाज दी थी. 

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एक बहुत ही लोकप्रिय कव्वाली थी 1958 की फिल्म अल हिलाल में जिसके बोल हैं – 'हमें तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों ने'. 

अगर बात की जाए सबसे लोकप्रिय कव्वाली की तो ज्यादातर लोग फिल्म "बरसात की रात" की कव्वाली – "ना तो कारवां की तलाश है" को मानते हैं जिसका संगीत रौशन ने दिया था. इस कव्वाली की लोकप्रियता के बाद रोशन कव्वाली किंग बन गए जिन्होंने फिल्मों में कई और लोकप्रिय कव्वालियां दीं. 

रोशन ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा", "लागा चुनरी में दाग, छुपाएं कैसे", "रहें ना रहें हम महका करेंगे", "बहारों ने मेरा चमन लूट कर", "पूरे ताल मिले नदी के जल में", "मन रे तू काहे न धीर धरे", "निगाहें मिलाने को जी चाहता है" जैसे महान गीत दिए. लेकिन रोशन साहब ने हिंदी सिनेमा को जो कव्वाली दी उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं है.

फिल्म बरसात की रात की उस कव्वाली के बारे में निर्विवादित ढंग से हर कोई मानता है कि ना इससे पहले ऐसी कव्वाली आई और ना ही इसके बाद. इस कव्वाली के बनने की कहानी भी बहुत ही दिलचस्प है. बात है उन्नीस सौ साठ की, जब मशहूर निर्देशक पी संतोषी भारत भूषण, मधुबाला और श्यामा को बतौर लीड एक्टर लेकर बरसात की रात फिल्म बना रहे थे. फिल्म में संगीत था रोशन का और गीत लिखे थे महान कलमकार साहिर लुधियानवी ने.

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साहिर लुधियानवी को एक नायाब कव्वाली लिखने की जिम्मेदारी दी गई. साहिर लुधियानवी ने ऐसी कव्वाली की रचना की जिसमें न केवल उर्दू बल्कि ब्रज, हिन्दी, पंजाबी और फारसी जैसी तमाम भाषाओं को अपनी जादुई लेखनी में इस तरह पिरोया कि जब आप कव्वाली को सुनते हैं तो लगता है कि किसी ने जिंदगी और इश्क का फलसफा आपके सामने निचोड़ कर रख दिया हो. 

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इस कव्वाली को रोशन साहब ने राग कलावती से खूबसूरती से सजाया जिसे मोहम्मद रफी, मन्ना डे, आशा भोसले, एसडी बातिश, सुधा मल्होत्रा जैसे महान गायक गायिकाओं ने अपनी आवाज देकर उस कव्वाली को अमर कर दिया. 

रोशन साहब ने बहुत ही बारीकी से हर भाषा को उसी अंदाज में गवाया जैसा उसका उच्चारण होता है. इस कव्वाली की रिकार्डिंग के लिए फेमस स्टूडियो को पूरी रात के लिए बुक कराया ताकि रिकॉर्डिंग के दौरान कोई शोर–शराबा नहीं हो. 

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उस दिन इस कव्वाली का रिहर्सल हुआ और रिकॉर्डिंग के लिए सभी गायकों से कहा गया कि वे सभी शाम सात बजे तक स्टूडियो तैयार होकर पहुंच जाएं. बताया जाता है कि इसकी रिकॉर्डिंग से पहले लगातार 12 घंटे रिहर्सल चला था. मोहम्मद रफी साहब, मन्ना डे, आशा भोसले, एस डी बातिश, सुधा मल्होत्रा जैसे देश के प्रसिद्ध गायक– गायिका तय समय पर स्टूडियो पहुंच चुके थे. रिकॉर्डिंग के लिए अस्सी साजिंदों को बुलाया गया था. वहां बीस से अधिक टेक्नीशियन भी मौजूद थे ताकि किसी भी तरह की तकनीकी दिक्कत नहीं हो. 

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प्रसिद्ध रेडियो अनाउंसर अमीन सयानी के अनुसार यह कव्वाली राग कलावती से सजी थी और कव्वाली का अंदाज पाकिस्तानी कव्वाल मुबारक अली फतेह अली के अंदाज की तरह रखा गया था. रात को जैसे ही पूरी तरह सड़कों पर सन्नाटा छा गया, स्टूडियो के भीतर रोशन साहब ने रिकॉर्डिंग की इजाजत दे दी. 

सभी गायकों और साजिंदो ने पूरे भक्ति भाव के साथ इस कव्वाली का गाया. सभी गायक और साजिंदे  इस कव्वाली को गाने में इतने मग्न थे कि उन्हें इसका अहसास ही नहीं रहा कि रिकार्डिंग सफलतापूर्वक पूरी हो गई. जब रिकॉर्डिंग पूरी होने की घोषणा की गई तब वहां उपस्थित गायकों और साजिंदों के बीच से यह आवाज उठनी शुरू हो गई कि – इतनी अच्छी कव्वाली. ऐसी कव्वाली न तो अब तक बनी है और न ही कभी बन पाएगी. 

यह सुनकर उन गायकों और साजिंदों में से किसी ने कहा – जी कहता है कि इस कव्वाली को रात भर गाते रहे. 

इस बात का बाकी लोगों ने समर्थन किया. कई लोग बोल पड़े – वाकई. ऐसा लगता है कि इस कव्वाली को रात भर गाएं. पता नहीं कब ऐसी कव्वाली गाने को मिले. 

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इसके बाद सभी लोगों में इस बात पर सहमति बन गई कि इस कव्वाली को वे सभी रात भर गाएंगे. लेकिन तब तक रौशन साहब वहां से जा चुके थे. इस पर मन्ना डे ने आशा भोसले से कहा – आशा जरा नीचे जाकर देखो रौशन साहब चले तो नहीं गए. उनको रोककर कहना कि हम सब इस कव्वाली को रात भर गाएंगे. इसकी व्यवस्था करा दें. आशा भोसले जब नीचे गई तब देखा कि राैशन साहब गाड़ी में बैठ चुके हैं. आशा भोसले ने रौशन साहब को आवाज दी. रौशन साहब ने देखा कि आशा भोसले हाथ हिलाकर कुछ कह रही है. रौशन साहब कार से बाहर निकले और पूछा कि क्या बात है. आशा भोसले ने कहा – रौशन साहब आज रात कोई घर नहीं जा रहा है. सबने तय किया कि हम सब रात भर कव्वाली गाएंगे.

रौशन साहब ने फेमस स्टूडियो में रात का कामकाज संभालने वाले स्टाफ से कहा – हमने पूरे रात के लिए स्टूडियो बुक कराया हुआ है. हमारे लोग रात भर स्टूडियो में रहेंगे. इसका इंतजाम कर दो कि रात में जरूरत पड़ने पर चाय आदि मिलती रहे. जो भी खर्च होगा मैं दूंगा. 

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इसके बाद सारे लोग पूरी रात कव्वाली गाते रहे. कव्वाली गाते–गाते सुबह हो गई. कुछ गायक और साजिंदे तो सुबह वहां से निकल गए लेकिन तब भी काफी लोग रह गए और सब सुबह नौ बजे गाते बजाते रहे. इस कव्वाली का जादू आज तक इस कारण से बरकरार है क्योंकि इसे लिखने वाले से लेकर इसे संगीत देने वाले और इसे गाने तथा इसमें बजाने वाले सभी ने इस कव्वाली को चैलेंज की तरह लिया और अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है. जहां मन्ना डे ने क्लासिकल सिंगिंग का जादू बिखेरा है. उधर आशा भोसले और सुधा मल्होत्रा एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ करती नजर आती हैं. मोहम्मद रफी का इस कव्वाली में प्रवेश तब होता है जब आधी कव्वाली हो चुकी होती है लेकिन उसके बाद तो रफी साहब का ही जादू चलता है. जहां से रफी साहब इस कव्वाली को अपने हाथ में लेते हैं तो फिर यह कव्वाली बाकी सभी गायकों के हाथ से निकल जाती है और कव्वाली की बागडोर रफी साहब के हाथ में आ जाती है. दरअसल रफी साहब की आवाज मुख्य एक्टर भारत भूषण के लिए होती है और इस फिल्म के फिल्मांकन में दिखाया जाता है कि आधी कव्वाली के बाद भारत भूषण हारमोनियम थाम लेते हैं और गाना शुरू करते हैं. उनकी बगल में एक साजिंदा भी उनका साथ देता हुआ गा रहा है. भारत भूषण और बगल में बैठे साजिंदे दोनों ही के लिए रफी साहब की आवाज है और  हैरतअंगेज बात ये है कि एक ही वक्त में जब रफी साहब भारत भूषण के लिए गाते हैं तो उनकी आवाज भारत भूषण पर अलग लगती है, और ज्यों ही वो सांजिदे के लिए गाते हैं तो उनकी आवाज बिल्कुल अलग लगती है. ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही गायक एक ही समय में दो लोगों के लिए बिल्कुल अलग – अलग अंदाज में गाए. 

इस कव्वाली की रिकॉर्डिंग के दौरान दुनिया ने देखा कि उस समय के महान गायक और साजिंदे चौबीसों घंटे बिना थके हुए इस कव्वाली को गाते रहे और स्टूडियो से निकलने वाले हर एक की जुबान पर बस यही था – ऐसी कव्वाली न तो बनी और न आगे कभी बनेगी. 

इस कव्वाली के बने हुए 62 साल से अधिक का समय बीत चुका है लेकिन आज भी यह बात सच है कि ऐसी कव्वाली न तो बनी और न आगे बनेगी. 

विनोद कुमार मशहूर फिल्म लेखक और पत्रकार हैं जिन्होंने सिनेमा जगत की कई हस्तियों पर कई पुस्तकें लिखी हैं. इन पुस्तकों में "मेरी आवाज सुनो", "सिनेमा के 150 सितारे", "रफी की दुनिया" के अलावा देवानंद, दिलीप कुमार और राज कपूर की जीवनी आदि शामिल हैं.

-विनोद कुमार

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