मूवी रिव्यू: साधारण ‘वेरिज बजाबाकी’ (मराठी)

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रेटिंग**

आज अगर शिक्षा की बात की जाये तो बच्चों से कहीं ज्यादा उनके पेरेन्ट्स महत्वाकांक्षी बन वुके हैं। इसके अलावा मॉल कल्चर स्कूलों को भी नहीं छोड़ रहा है । निर्देशक राजू भोसले ने फिल्म ‘वेरिज बजाबाकी’ में ये सब दिखाने की कोशिशकी है ।

कहानी, अवलोकन व अभिनय

कहानी के अनुसार एक माड्रन स्कूल का ऑनर उसे मॉल में तब्दील करना चाहता है लेकिन प्रिंसिपल के कहने पर वो ये कहते हुये अपना प्रौग्राम मुलतवी कर देता है कि अन्य स्कूलों के साथ इस स्कूल के बच्चों को एक प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने के लिने के लिये जंगल में भेजा जाये अगर वे बच्चे ये स्पर्धा जीत गये तो वो मॉल बनाने का विचार छोड़ देगा। सभी स्कूलों के बच्चे एक साथ इस स्पर्धा में भाग लेते हैं। लेकिन इनके मां बाप इनकी जीत को लेकर इनसे कहीं ज्यादा उत्तेजित हैं। इनमें एक पेरेंटस तो अपने बच्चे को चेतावनी तक दे देता है कि अगर वो जीत कर नहीं आया तो उसे घर से निकाल दिया जायेगा। एक जगंल में सारे बच्चे जमा होते हैं और वे सभी आपस में मिलजुल कर रहने की एक मिसाल पेश करते हैं। उन्हें देख उनके पेरेन्ट्स को भी एहसास होता हैं कि वे अपने बच्चों को लेकर कितने गलत थे। निर्देशक ने कुछ बच्चों को लेकर जो भी बताने की कोशिश की, वो एक छोटी सी चिल्ड्रन फिल्म से ज्यादा नहीं है। फिल्म में बच्चे हैं गाने हैं लेकिन मनोरंजन न के बराबर है। लिहाजा बच्चे भी फिल्म का आनंद नहीं उठा पाते। बच्चों के अलावा फिल्म में छोटी छोटी भूमिकाओं में मोहन जोशी और उपेन्द्र लिमये जैसे कलाकार हैं लेकिन वे भी साधारण से ज्यादा नजर नहीं आ पाते। लिहाजा फिल्म को दर्शकों का प्रतिसाद मिलने में संशय है।

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