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ए आर रहमान के 40 दिन के ‘डिजिटल डिटॉक्स’ के मायने पिछले कुछ दिनों से ऑस्कर विजेता संगीतकार व गायक ए आर रहमान लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। जनवरी 2026 में वह तब न सिर्फ सुर्खियों में आए, बल्कि विवाद के केंद्र बन गए जब ‘बीबीसी एशिया’ के पत्रकार को इंटरव्यू देते हुए ए आर रहमान ने खुद को बॉलीवुड में कम काम मिलने के लिए लोगों के विचारों में आए बदलाव को कहते हुए काफी कुछ ऐसा कह दिया, जिससे एक वर्ग काफी नाराज हो गया। और सोशल मीडिया पर फिल्म ‘रामायण’ को भी बैन करने की मांग उठ गई थी। क्योंकि नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘रामायण’ को संगीत से ए आर रहमान ही संवार रहे हैं। बाद में ए आर रहमान ने अपनी सफाई देकर मामला रफा-दफा किया। तो वहीं इन दिनों वह डागर बंधुओं के एक गीत को चुराने का आरोप झेल रहे हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। 12 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लगभग दोषी ठहरा चुका है। पर अभी 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले ही ए आर रहमान ने 40 दिनों के लिए ‘डिजिटल डिटॉक्स’ यानी तकनीकी दुनिया से पूर्णतः गायब होने का ऐलान कर सुर्खियों में छा गए हैं। कलाकार मन को समझने वाले इसे महज एक खबर की संज्ञा देने की बजाय एक कलाकार का अपनी ‘रूह’ को बचाने के लिए किया गया ‘सत्याग्रह’ मान रहा है। (A. R. Rahman 40 days digital detox announcement)
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ए आर रहमान के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि वह कहीं 40 दिनों के लिए छुट्टी बिताने जा रहे हों। बल्कि इसकी जड़ें उनके आध्यात्मिक विश्वास और सृजन की भूख में हैं। 19 फरवरी से शुरू हुआ ‘रमजान’ का पवित्र महीना उनके लिए आत्म-शुद्धि का काल है। एक साधक के लिए ‘उपवास’ केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण है। आज के समय में इंटरनेट हमारी छठी इंद्री बन चुका है। ए आर रहमान ने महसूस किया है कि डिजिटल नोटिफिकेशन के शोर में वह ‘अनहद नाद’ कहीं खो जाता है, जिसे सुनने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनका यह 40 दिनों का एकांतवास दरअसल एक मानसिक तीर्थयात्रा है।
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ए आर रहमान के इस ‘डिजिटल डिटॉक्स’ के ऐलान को नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘रामायण’ से भी जोड़कर देखा जा रहा है। नितेश तिवारी के इस महाकाव्य के लिए संगीत तैयार करना किसी भी संगीतकार के लिए हिमालय चढ़ने जैसा है। ‘रामायण’ केवल एक कहानी नहीं, यह भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ है। वाल्मीकि की उस मर्यादा और दिव्यता को सुरों में पिरोने के लिए रहमान को खुद को इस युग के कोलाहल से मुक्त करना ही होगा। (AR Rahman Supreme Court case update 2026)
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चर्चा है कि राम नवमी के अवसर पर इस फिल्म का एक भव्य आयोजन होने वाला है, जहाँ बतौर संगीतकार ए आर रहमान अपनी संगीत की धुन से दुनिया को मंत्रमुग्ध करेंगे। उस ‘अग्नि-परीक्षा’ से पहले, रहमान खुद को ‘शून्य’ कर लेना चाहते हैं। उन्हें इस बात की समझ है कि जब तक कलाकार का मन अंदर से शांत न हो, वह ऐसे ‘ब्रह्मांडीय संगीत’ का सृजन नहीं कर सकता जो पीढ़ियों तक सुना जा सके।
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ए आर रहमान का यह कदम समाज के लिए एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हमारी सफलता का पैमाना हमारे सोशल मीडिया ‘एंगेजमेंट’ से तय होता है। यह वह दौर है, जब लोग कलाकार की सफलता को इस बात से आंकते हैं कि उसके इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स कितने हैं? स्पॉटिफाई पर फॉलोअर्स की संख्या कितनी है? लेकिन अहम सवाल तो यह है कि क्या कोई भी कलाकार या क्रिएटिव इंसान ‘लाइक्स’ और ‘ट्रेंड्स’ के दबाव में अमर कृति रच सकता है? (BBC Asia interview controversy AR Rahman)
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हर इंसान को इस बात को अच्छी तरह से समझना होगा कि इंसान की जड़ें मिट्टी में होती हैं, ‘आसमान’ पर नहीं। ए आर रहमान ने ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का ऐलान कर सही मायनों में अपनी जड़ों की ओर लौटने का रास्ता चुना है। और इससे उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि तकनीक सृजन का साधन हो सकती है, स्रोत नहीं। स्रोत तो हमेशा इंसान के अंदर विद्यमान होता है, जिसे खोजने के लिए मौन अनिवार्य है। आज का इंसान अपनी जड़ों से कटकर एक ऐसे ‘वर्चुअल वृक्ष’ की तरह हो गया है, जो बाहर से हरा दिखता है लेकिन जिसकी आत्मा सूख चुकी है।
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मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, निरंतर डिजिटल कनेक्टिविटी हमारी गहन सोचने की क्षमता को कमतर करती जा रही है। जब ए आर रहमान 40 दिन के लिए मोबाइल फोन छोड़ते हैं, तो वह दरअसल अपनी ‘एकाग्रता’ को वापस पा रहे हैं। संगीत ‘साधना’ ही है। और साधना विक्षेप बर्दाश्त नहीं करती।
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फिल्म ‘रॉकस्टार’ के उस गीत को याद कीजिए, ‘जब कहीं पे कुछ भी नहीं था, वही था...’। तो अब ए आर रहमान निजी जीवन में उसी ‘शून्य’ की तलाश में हैं। वह उस संगीत की खोज में हैं जो बाजार के नियमों से नहीं, बल्कि आत्मा के विलाप और उल्लास से निकलता है।
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ए आर रहमान के 40 दिनों के इस ‘डिजिटल डिटॉक्स’ को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए। इसके काफी गहरे मायने हैं। यह हमें आइना दिखाता है कि हम तकनीक के मालिक नहीं, बल्कि गुलाम बन चुके हैं। माना जा रहा है कि ए आर रहमान जब 40 दिनों बाद लौटेंगे, तो उनके पास सिर्फ ‘रामायण’ की धुनें नहीं होंगी, बल्कि एक तरोताजा आत्मा होगी।
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ए आर रहमान का यह ‘डिजिटल डिटॉक्स’ भारतीय कला और जीवनशैली के लिए एक नया ‘घोषणापत्र’ है, कि कभी-कभी पीछे हटना ही सबसे लंबी छलांग लगाने की पूर्व शर्त होती है।
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