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शक्ति सामंत ने न सिर्फ सफलतम फिल्मों का निर्माण व निर्देशन किया, बल्कि कई कलाकारों को बतौर अभिनेता पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। कई संगीतमय सफलतम फिल्मों के सर्जक शक्ति सामंत की वजह से बॉलीवुड को शर्मीला टैगोर जैसी अभिनेत्री मिली, तो वहीं राजेश खन्ना जिस फिल्म से सुपरस्टार बने, उस फिल्म का निर्माण भी शक्ति सामंत ने ही किया था। इसी के साथ शक्ति सामंत उन फिल्म निर्देशकों में से रहे हैं, जिन्होंने अपनी फिल्मों में सामाजिक सरोकारों का अहमियत दी। उन्होंने व्यावसायिक मनोरंजन के साथ-साथ गंभीर सामाजिक विषयों को भी संतुलित रूप से अपनी फिल्मों में पिरोया। शक्ति सामंत ने अपना लक्ष्य हमेशा सामाजिक सरोकारों से जुड़ी सफल कहानियों की खोज में लगाया। उन्होंने प्रेम को केंद्र में रखकर सार्थक सामाजिक नाटक बनाने के लिए खुद को समर्पित किया। कहानियों की खोज, किरदारों के लिए उपयुक्त चेहरों की खोज और प्रभावशाली संगीत की तलाश उनका जीवन भर का लक्ष्य रहा। शक्ति सामंत ने अपनी फिल्मों के माध्यम से साबित किया कि व्यावसायिक सिनेमा मनोरंजक होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से प्रासंगिक और भावनात्मक रूप से गहरा भी हो सकता है। (Shakti Samanta birth centenary special)
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शक्ति सामंत की फिल्में सिर्फ मनोरंजक ही नहीं रही बल्कि उनकी कई फिल्मों ने सामाजिक विषयों, जैसे कि महिलाओं की स्थिति, लालच और भ्रष्टाचार, को उजागर किया।
आराधना: पितृत्व और सामाजिक रूढ़ियों पर चोट 1969 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘‘आराधना’’ में उन्होंने पितृत्व और सामाजिक रूढ़ियों के विषय को उठाया। फिल्म में एक अविवाहित माँ (वंदना) के संघर्ष और अपने बच्चे को समाज की खातिर अनाथालय में छोड़ने पर मजबूर होने, और फिर उसे वापस पाने के प्रयास की मार्मिक कहानी है। यह समाज के दोहरे मानकों व पाखंड पर सवाल उठाती है। शक्ति सामंत की फिल्म ‘आराधना’ मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों के भीतर मातृत्व, प्रेम और बलिदान के विषयों पर केंद्रित है, लेकिन यह अविवाहित मातृत्व से जुड़े सामाजिक कलंक को भी दर्शाती है। फिल्म का मुख्य संदेश भारतीय समाज में एक महिला की ताकत, लचीलापन और बलिदान की क्षमता को एक माँ के रूप में महिमामंडित करता है। फिल्म की नायिका, वंदना (शर्मिला टैगोर), अपने प्रेमी और गुप्त पति (राजेश खन्ना) की असामयिक मृत्यु के बाद गर्भवती और अविवाहित रह जाती है। उसे एक रूढ़िवादी समाज का सामना करना पड़ता है जो अविवाहित माताओं को स्वीकार नहीं करता। लेकिन सामाजिक बहिष्कार से बचने और अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए, वंदना अपने बच्चे को गोद देने पर मजबूर होती है। वह अपने बेटे के करीब रहने के लिए बाद में उसी घर में दाई के रूप में काम करती है। यह कहानी भारतीय ‘त्याग की मूर्ति माँ’ के मॉडल को पुष्ट करती है, जहाँ एक माँ का जीवन उसके बच्चे के लिए बलिदान और त्याग के इर्द-गिर्द घूमता है। फिल्म एक महिला की भावनात्मक शक्ति, सहनशक्ति और गरिमा को उसकी कठिन यात्रा के माध्यम से चित्रित करती है, क्योंकि वह चुपचाप अपने बच्चे के बड़े होने को दूर से देखती है। इन सामाजिक बाधाओं के बावजूद, फिल्म प्रेम, नियति और मानवीय भावनाओं की गहराई पर भी जोर देती है, जो अंततः माँ और बेटे के भावनात्मक पुनर्मिलन की ओर ले जाती है। संक्षेप में कहें तो फिल्म ‘‘आराधना’’ उस दौर में एक व्यावसायिक फिल्म होते हुए भी मनोरंजन के साथ-साथ एक महिला के जीवन में आने वाली सामाजिक चुनौतियों और एक माँ के बलिदान की कहानी को भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत करती है। (Shakti Samanta contribution to Hindi cinema)
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हावड़ा ब्रिज: सामाजिक बुराइयों का चित्रण 1958 में शक्ति सामंत की फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ मूलतः एक क्राइम थ्रिलर फिल्म है। पर उन्होंने इसमें भी सामाजिक सरोकार के तौर पर मानवीय लालच और भ्रष्टाचार के विषयों को दर्शाया। यह फिल्म व्यावसायिक सिनेमा के ढांचे में सामाजिक बुराइयों को उजागर करती है। फिल्म की कहानी रंगून के एक व्यापारी, प्रेम कुमार की है, जो अपने भाई के हत्यारों को खोजने और परिवार की एक कीमती विरासत को वापस पाने के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) आता है। इस यात्रा के दौरान, फिल्म तत्कालीन कलकत्ता के आपराधिक अंडरवर्ल्ड को दर्शाती है, जिसमें तस्करी और हत्या जैसे अपराध शामिल हैं। शक्ति सामंत ने अपनी इस फिल्म में कई सामाजिक सरोकार की चर्चा की। फिल्म दर्शाती है कि भौतिकवादी लालच किस हद तक व्यक्तियों को अपराध की ओर धकेल सकता है। तो वहीं यह फिल्म संगठित आपराधिक गिरोह (तस्करों का एक समूह) के संचालन को दिखाती है। यह समाज के उस स्याह पक्ष को सामने लाती है जहाँ कानून से परे जाकर अवैध गतिविधियाँ संचालित होती हैं। फिल्म में मधुबाला द्वारा निभाया गया एडना का किरदार, एक कैबरे डांसर का है, जो उस समय के समाज में एक हाशिए पर या रूढ़िवादी नजरिए से देखे जाने वाले पेशे को दर्शाता है। हालांकि, फिल्म में वह एक मजबूत और सहायक महिला के रूप में उभरती है जो नायक की मदद करती है, जिससे उसकी अच्छाई सामने आती है। कुल मिलाकर शक्ति सामंत की फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ का मुख्य सामाजिक संदेश यह है कि अपराध का रास्ता विनाश की ओर ले जाता है और अंततः सच्चाई और न्याय की जीत होती है। फिल्म यह संदेश देती है कि समाज में व्याप्त बुराइयों और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना आवश्यक है। यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ यह भी दिखाती है कि भले ही अपराधी बच निकलने की कोशिश करें, लेकिन उन्हें उनके कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। नायक का दृढ़ संकल्प (अपने भाई के लिए न्याय सुनिश्चित करना) व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना को रेखांकित करता है।
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अजनबी: पारिवारिक मूल्य व संबंधों का चित्रण शक्ति सामंत की 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘अजनबी’ मूलतः एक मनोरंजन-उन्मुख संगीतमय ड्रामा और सस्पेंस थ्रिलर है, लेकिन इसमें भी कुछ सामाजिक सरोकार भी निहित हैं, विशेष रूप से वर्ग अंतर और पारिवारिक मूल्यों के संबंध में। फिल्म ‘अजनबी’ मध्यम वर्ग के एक ईमानदार युवक (राजेश खन्ना द्वारा अभिनीत) और एक धनी व महत्वाकांक्षी युवती (ज़ीनत अमान द्वारा अभिनीत) की कहानी है। फिल्म इन दोनों के बीच के आर्थिक और सामाजिक वर्ग के अंतर को दर्शाती है। कहानी दिखाती है कि कैसे अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि और जीवन के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाले दो लोग प्यार में पड़ते हैं, शादी करते हैं, लेकिन बाद में जीवन में गलतफहमियों और परिस्थितियों के कारण अलग हो जाते हैं। फिल्म ‘अजनबी’ यह संदेश देती है कि सच्चा प्यार सामाजिक या आर्थिक स्थिति की परवाह नहीं करता है। मध्यम वर्ग के लड़के और धनी लड़की का मिलन इस बात को रेखांकित करता है। कहानी इस बात पर प्रकाश डालती है कि गलतफहमियाँ और बाहरी कारक (जैसे कि एक महत्वाकांक्षी साली और अन्य भ्रष्ट पात्र) किस प्रकार मजबूत रिश्तों को भी प्रभावित कर सकते हैं और उन्हें तोड़ सकते हैं। फिल्म में विवाह और रिश्तों में विश्वास और संवाद की महत्ता को दर्शाया गया है। यह दिखाता है कि कैसे आपसी समझ की कमी से अलगाव हो सकता है, और अंततः सुलह और परिवार के पुनर्मिलन पर जोर दिया जाता है। फिल्म में प्रेम चोपड़ा द्वारा अभिनीत चरित्र जैसे पात्रों के माध्यम से भ्रष्टाचार और अनैतिकता के मुद्दे भी उठाए गए हैं, जो राजेश खन्ना के ईमानदार चरित्र के विपरीत हैं। यह ईमानदारी के महत्व और बुरे कार्यों के परिणामों को दर्शाता है। संक्षेप में, फिल्म एक मनोरंजक प्रारूप में प्रेम, विश्वास और ईमानदारी के सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती है, साथ ही यह भी बताती है कि सामाजिक और आर्थिक अंतरों के बावजूद मानवीय रिश्ते महत्वपूर्ण होते हैं। (Rajesh Khanna first superhit film producer)
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कटी पतंग: महिलाओं की पहचान, प्रेम, त्याग और समाज का दोहरा चेहरा 1971 में रिलीज़ फिल्म ‘कटी पतंग’ में शक्ति सामंत ने सामाजिक सरोकार के रूप में महिलाओं की पहचान, प्रेम, त्याग और समाज के दोहरे मापदंडों जैसे मुद्दों को उठाया, जहाँ नायिका माधवी (आशा पारेख) अपने प्रेमी द्वारा धोखा दिए जाने के बाद एक मृत दोस्त की पहचान अपनाकर एक विधवा का जीवन जीती है, जो उस समय के रूढ़िवादी समाज में स्त्री की स्थिति, उसकी अग्निपरीक्षा और आत्म-सम्मान की कहानी कहती है, जिसमें सच्ची प्रेम और पहचान की तलाश प्रमुख सामाजिक संदेश है। फिल्म ‘कटी पतंग’ की नायिका माधवी एक नई पहचान (पूनम) अपनाती है, जिससे समाज के सामने एक विधवा होने का नाटक करती है, जो उस समय महिलाओं के लिए एक बड़ा सामाजिक दबाव था। तो वहीं इस फिल्म में प्रेम की पवित्रता और धोखे के दर्द का भी चित्रण है। जहां नायिका अपने प्रेमी के विश्वासघात के बाद टूट जाती है, लेकिन फिर भी सच्चे प्यार की तलाश में रहती हैं। यह फिल्म उस समय के समाज में प्रेम में पड़ी या धोखा खाई महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण को दर्शाती है और उन पर लगने वाले कलंक को तोड़ने की कोशिश करती है। माधवी अपने दोस्त के बच्चे की परवरिश के लिए अपनी पहचान और प्रेम को त्याग देती है, जो त्याग और निस्वार्थ प्रेम का संदेश देता है। माधवी की कहानी उस समय की रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ एक स्त्री के संघर्ष को दर्शाती है, जो अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। कुल मिलाकर यह फिल्म अंततः सच्चे प्रेम और समझ के माध्यम से सभी बाधाओं को पार करने और मानवीय रिश्तों में गहराई की बात करती है। शक्ति सामंत ने इस फिल्म में एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो परिस्थितियों से टूटकर भी हार नहीं मानती और अपनी पहचान की लड़ाई लड़ती है, जो स्त्री सशक्तिकरण का प्रतीक है। इस फिल्म में क्षमा और पुनर्मिलन के महत्व पर जोर दिया गया है, जहां नायक और नायिका गलतफहमियों को दूर कर एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं। संक्षेप में, ‘कटी पतंग’ सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक सच्चाइयों को छूती हुई एक ऐसी फिल्म है जो प्रेम, पहचान और एक महिला के संघर्ष को बड़ी खूबसूरती से पेश करती है।
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अमर प्रेम: भावनात्मक उपेक्षा और सामाजिक पाखंड शक्ति सामंत की फिल्म ‘अमर प्रेम’ समाज के पाखंड, भावनात्मक उपेक्षा और हाशिए पर पड़ी महिलाओं की उपेक्षा पर प्रकाश डालती है। यह एक अकेली महिला (वेश्या) और एक अकेला व्यवसायी के बीच एक अपरंपरागत बंधन की संवेदनशील कहानी प्रस्तुत करती है, जो मानवीय गरिमा और सहानुभूति पर जोर देती है। जी हाँ! फिल्म ‘अमर प्रेम’ में शक्ति सामंत ने मानवीय मूल्यों में गिरावट, सामाजिक पाखंड और हाशिए पर पड़ी महिलाओं की उपेक्षा जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को उजागर करने का प्रयास किया। तो वहीं यह संदेश देने का भी प्रयास किया कि सच्चा प्यार और करुणा सामाजिक बंधनों और पूर्वाग्रहों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। फिल्म पुष्पा (शर्मिला टैगोर) के किरदार के माध्यम से उन महिलाओं की दुर्दशा को चित्रण करती है, जिन्हें उनके पतियों द्वारा छोड़ दिया जाता है और समाज उन्हें वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करता है। समाज उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार भी नहीं देता। यह फिल्म न केवल पुष्पा की उसके पति और माँ द्वारा उपेक्षा को दिखाती है, बल्कि छोटे लड़के, नंदू के साथ उसकी सौतेली माँ के दुर्व्यवहार को भी दर्शाती है। यह परिवारों के भीतर भावनात्मक समर्थन की कमी को रेखांकित करती है। फिल्म समाज के दोहरे मानकों पर प्रकाश डालती है, जो दूसरों के चरित्र पर उंगलियाँ उठाते हैं लेकिन उन परिस्थितियों की अनदेखी करते हैं जो व्यक्तियों को उन स्थितियों में धकेलती हैं। आनंद बाबू (राजेश खन्ना) के गीत ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...’ के माध्यम से इस पाखंड पर व्यंग्य किया गया है। फिल्म ‘अमर प्रेम’ इस बात पर खास जोर देती है कि किस तरह स्वार्थ और सामाजिक दबाव के चलते मानवीय रिश्ते और मूल्य कमजोर होते जा रहे हैं। फिल्म का केंद्रीय संदेश यह है कि प्यार, स्नेह और करुणा किसी भी सामाजिक नियम या कलंक से परे हैं। आनंद बाबू और पुष्पा का रिश्ता, हालांकि अपरंपरागत है, विशुद्ध रूप से सम्मान और भावनात्मक लगाव पर आधारित है, न कि शारीरिक इच्छा पर। फिल्म ‘अमर प्रेम’ यह बताती है कि रिश्ते खून के नहीं, बल्कि दिल के होते हैं। पुष्पा और नंदू के बीच का रिश्ता (एक माँ-बेटे का रिश्ता) इसका एक मार्मिक उदाहरण है। नंदू बड़ा होकर इंजीनियर बनता है और अपनी ‘माँ’ पुष्पा को सम्मानपूर्वक अपने साथ ले जाता है, जो यह साबित करता है कि सच्चे संबंध सामाजिक मान्यताओं से ऊपर होते हैं। यह फिल्म हाशिए पर पड़े व्यक्तियों के संघर्षों को संवेदनशील रूप से चित्रित करती है और सहानुभूति व मानवीय गरिमा के महत्व पर जोर देती है। कुल मिलाकर, ‘अमर प्रेम’ एक कालातीत कहानी है जो दर्शकों को सामाजिक पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाने, मानवीय संबंधों की जटिलताओं को समझने और बिना शर्त प्यार व करुणा के मूल्यों की बात करती है।
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इंसान जाग उठा: सामाजिक असमानता का चित्रण इतना ही नहीं फिल्म ‘इंसान जाग उठा’ में शक्ति सामंत ने भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानताओं का मुद्दा उठाया। हालांकि यह शुरू में व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हुई थी, लेकिन इसने सामाजिक सरोकार के प्रति उनके झुकाव को दर्शाया।
बॉक्स आयटमः गायक व हीरो बनते-बनते निर्माता व निर्देशक बन बैठे (Shakti Samanta love based social dramas)
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13 जनवरी 1926 को पश्चिम बंगाल के बर्दवान में जन्मे शक्ति सामंत की शिक्षा-दीक्षा देहरादून में उनके अंकल के घर पर हुई, पर उन्होंने स्नातक की पढ़ाई कोलकाता से की। बांग्ला मातृभाषी शक्ति सामंत ने देहरादून में शिक्षा लेते हुए हिंदी और उर्दू पर भी इतनी अच्छी पकड़ बना ली कि बाद में शक्ति सामंत ने दूसरों को उर्दू सिखाई भी। इतना ही नहीं देहरादून में शिक्षा ग्रहण करते हुए हिंदी व उर्दू में महारत हासिल करने ने ही उन्हें मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने में मदद की थी।
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बहुत कम लोगों को पता होगा कि शक्ति सामंत अपने कॉलेज के दिनों में गाना गाया करते थे और उन दिनों उनकी तमन्ना फिल्मों में बतौर अभिनेता और गायक स्थापित होने की थी। पढ़ाई पूरी करने के तकदीर ने उन्हें मुंबई से करीब 200 किलोमीटर दूर दपोली के उर्दू स्कूल में शिक्षक की नौकरी दिला दी। उस स्कूल में हर शुक्रवार छुट्टी होती थी, तो शक्ति दा मुंबई पहुँचकर फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष किया करते थे। वह लगातार संघर्ष कर रहे थे, पर बात नहीं बन रही थी। एक दिन उनकी मुलाकात अशोक कुमार यानी कि दादा मुनि से हो गई। दादा मुनि ने उन्हें सलाह दी कि वह फिल्मों में गायक या हीरो बनने का मोह छोड़कर प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में काम करें। फिर शक्ति सामंत ने अपना इरादा बदला। और उन्हें बॉम्बे टॉकीज़ में नौकरी मिल गई। हिंदी व उर्दू के ज्ञान की काबिलियत को देखते हुए ज्ञान मुखर्जी, सतीश निगम और फणी मजूमदार जैसे निर्देशकों ने उन्हें सहायक बनाया। कुछ समय बाद वह बॉम्बे टॉकीज़ छोड़कर वृजेन्द्र गौड़ के साथ बतौर सहायक इस शर्त पर जुड़े कि अगर उन्हें फिल्म बनाने का कहीं से मौका मिला, तो वह उन्हें छोड़ देंगे। उन दिनों वृजेन्द्र गौड़ फिल्म ‘कस्तुरी’ निर्देशित कर रहे थे। इसी वजह से शक्ति सामंत को पाहवा की फिल्म ‘बहू’ निर्देशित करने का अवसर इस शर्त पर मिला कि फिल्म की कहानी और संवाद ब्रजेंद्र गौड़ लिखेंगे। यह फिल्म 1955 में रिलीज़ हुई थी। लेकिन शक्ति सामंत को पहचान मिली 1956 में रिलीज़ फिल्म ‘‘इंस्पेक्टर’’ से। उसके बाद शेरू, डिटेक्टिव और हिल स्टेशन जैसी कुछ फिल्मों की कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘‘शक्ति फिल्म्स’’ की शुरुआत की। जिसकी पहली फिल्म थी एक मर्डर मिस्ट्री जिसकी कहानी बनी अस्पताल के बेड पर। शक्ति सामंत का एक एक्सीडेंट हुआ था और जब वो अस्पताल में ठीक हो रहे थे तब उन्होंने ‘‘हावड़ा ब्रिज’’ की कहानी बुनी और अशोक कुमार को सुनाई जो फिल्म के हीरो थे। अशोक कुमार ने ही मधुबाला को राज़ी किया और कहते हैं कि मधुबाला को सिर्फ़ 1 रुपए में साइन किया गया था। हावड़ा ब्रिज में वी. सी. नैयर ने संगीत दिया था और उनकी धुनें शक्ति सामंत को इतनी पसंद आईं कि उन्होंने तय सीमा से दो गाने ज़्यादा बनाए। फिल्म सुपर हिट रही और यहीं से बतौर निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत का करियर ऊँचाइयों की तरफ बढ़ने लगा। उसके बाद शक्ति सामंत ने तमाम सफलतम फिल्में बनाते हुए सामाजिक संदेश भी दिया। (Shakti Samanta legacy in Indian cinema)
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1950 के दशक के मध्य से लेकर 2000 के दशक तक शक्ति सामंत ने कई यादगार फिल्में दीं। मसलन- बहारें फिर भी आएंगी (1966), एन इवनिंग इन पेरिस (1967), आराधना (1969), कटी पतंग (1970), अमर प्रेम (1972), अनुराग (1972), अजनबी (1974), अमानुष (1975, हिंदी और बंगाली द्विभाषी), आनंद आश्रम (1977, हिंदी और बंगाली द्विभाषी), द ग्रेट गैंबलर (1979), बरसात की एक रात (1981), आवाज़ (1984), दुश्मन (1990), देवदास (2002, बंगाली) आदि।
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FAQ
Q1. शक्ति सामंत कौन थे?
शक्ति सामंत हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध निर्माता–निर्देशक थे, जिन्होंने व्यावसायिक और सामाजिक सिनेमा के बीच बेहतरीन संतुलन स्थापित किया।
Q2. शक्ति सामंत की सबसे बड़ी खासियत क्या थी?
उनकी फिल्मों में मजबूत कहानी, उपयुक्त कलाकार, मधुर संगीत और सामाजिक सरोकारों का सुंदर समावेश उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।
Q3. शक्ति सामंत ने किन कलाकारों को पहचान दिलाई?
शक्ति सामंत ने शर्मिला टैगोर को हिंदी सिनेमा में स्थापित किया और राजेश खन्ना को सुपरस्टार बनाने वाली फिल्म का निर्माण किया।
Q4. क्या शक्ति सामंत सिर्फ म्यूजिकल फिल्मों के लिए जाने जाते थे?
नहीं, वे संगीतमय फिल्मों के साथ-साथ सामाजिक विषयों और भावनात्मक कहानियों को भी उतनी ही गंभीरता से प्रस्तुत करते थे।
Q5. शक्ति सामंत की फिल्मों का संगीत क्यों यादगार है?
उन्होंने हमेशा कहानी के अनुरूप प्रभावशाली संगीत को महत्व दिया, जिससे उनकी फिल्में और गाने आज भी क्लासिक माने जाते हैं।
Shakti Samanta's "Araadhana" | Hindi Cinema Legend | about Rajesh Khanna | Sharmila Tagore not present in content
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