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विश्व प्रसिध्द ऑपेरा गायिका और एक avid ट्रैवलर जिओकोंडा वेसिचेल्ली ने दुनिया के करीब-करीब हर कोने को देखा, परखा और वहां रही है। लगभग एक सौ साठ देश। अलग अलग महाद्वीप। अलग अलग संस्कृतियाँ। अलग अलग भाषाएँ। कभी रेगिस्तान की खामोशी, कभी समुद्र की अंतहीन लहरें। कभी भीड़ से भरे शहर, कभी एकांत में बसे छोटे से मठ। सालों साल तक उनका जीवन सिर्फ सफर ही सफर में बीतता रहा। सूटकेस में उनकी जिंदगी सिमटी हुई थी और फ्लाइट और होटल के कमरे में उनका हर दिन गुज़र रहा था। नए चेहरे, नई कहानियाँ, नए जज्बात के साथ । लेकिन जीवन का एक लंबा समय इतना सब देखने, सुनने, भोगने के बाद भी, एक जगह थी जहाँ लौटने की चाह हमेशा उनके मन के किसी कोने में बनी रही। वो था उनका अपना घर। इटली।
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जब उन्होंने दुनिया को देखने, झेलने और समझने के बाद आखिरकार अपने घर वापस लौटी जहां बहुत सालों पहले वो रहा करती थी। उन्होने वो पुराना दरवाज़ा खोला, तो वहां एक सुखद सन्नाटा था। कोई शोर नहीं, दर्शकों की चीख पुकार नहीं, कोई तालियाँ नहीं, कोई फ्लैश लाइट नहीं, कोई स्वागत समारोह नहीं, बस एक सुकून, एक शांति और एक अपनापन था। सबसे पहले जिस चीज़ पर उनकी दृष्टि पड़ी, वह थी उनकी वही पियानो की खामोश मौजूदगी जिसे कभी किसी ज़माने में जियोकोंडा बजाया करती थी । जैसे वह पियानो बरसों से उनका इंतज़ार कर रहा हो।
जिओकोंडा एक ओपेरा सिंगर हैं। संगीत उनके जीवन का सिर्फ हिस्सा ही नहीं, बल्कि उनका जीवन ही है। लेकिन बीते न जाने कितने वर्षों में संगीत अक्सर एयरपोर्ट्स, होटल लॉबी और परफॉर्मेंस हॉल तक सीमित रह गया था। वह अपने पियानो से दूर थीं। उस पियानो से, जिसके साथ उन्होंने अपने बचपन के कई पल बिताए थे। जिसके सामने बैठकर उन्होंने पहली बार खुद को पहचाना था।
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दुनिया घूमते हुए उन्होंने बहुत कुछ सीखा। लंबी यात्राओं का धैर्य। अनजान लोगों से तुरंत जुड़ जाने की कला। सूरज को नए नए समंदरों के ऊपर उगते देखने का शऊर । ऐसी भाषाएँ सुनीं, जिन्हें वह बोल नहीं पाती थीं, लेकिन महसूस ज़रूर कर लेती थीं। हर देश ने उन्हें कुछ न कुछ दिया। कहीं खाने का नया स्वाद। कहीं लोगों की गर्मजोशी। कहीं संगीत की अलग लय।
फिर भी, सफर के बीच में भी उनका देश, उनका घर, इटली हमेशा उनके साथ लिपटा रहा। कभी किसी रेसिपी में। कभी हाथों के इशारों में, कभी किसी धुन को हल्के से गुनगुनाते हुए, जब वह किसी फ्लाइट का इंतज़ार कर रही होती थीं। उनका देश उनके भीतर ही चलता रहा।
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दुनिया भर में सालों साल तक, इतना घूमने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि सफर जितना खूबसूरत होता है, उतना ही वह घर की अहमियत भी सिखाता है। बाहर की दुनिया देखने के बाद घर की कीमत और गहरी हो जाती है।
दुनिया के हर देश, हर जंगल, हर पहाड़, हर पर्वत, हर नदी, हर, समुन्दर उनके लिए एक खोंज और पड़ताल की मंज़िल रही हैं। लेकिन इटली उनके लिए कोई मंज़िल नहीं थी। वह एक वापसी थी। जीवन की उस लय में लौटना, जो उन्हें सबसे ज़्यादा समझ आती थी। अपने घर की ओर जाने वाली हर कैफे में से उठने वाली कपों की हल्की खनक, वो जानी पहचानी गलियाँ। बारिश के बाद पत्थरों से उठती वो खुशबू। यह सब उनके लिए किसी संगीत की तरह महसूस हो रही थी । जैसे किसी लंबी सिम्फनी के बाद फिर से मूल सुर में लौट आना होता है ।
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अपने घर में, अपने कमरे में, उनका वही पुराना पियानो चुपचाप खड़ा था। जिओकोंडा ने बिना किसी तैयारी के उसके सामने बैठना तय किया । सामने कोई दर्शक नहीं था । कोई कार्यक्रम नहीं। कोई समय सीमा नहीं थी । बस वह, उनका संगीत और कमरे की एक सुकून भरी खामोशी थी ।
शुरुआती सुर थोड़े हिचकिचाए हुए थे। जैसे पियानो और कलाकार एक दूसरे को फिर से पहचान रहे हों। जैसे दोनों पूछ रहे हों कि इतने समय बाद क्या सब कुछ पहले जैसा हो पाएगा? लेकिन धीरे धीरे उंगलियाँ खुलने लगीं। धुन बहने लगी। संगीत सांस लेने लगा।
जियोकोंडा के बजाए हुए हर नोट में दुनिया की झलक थी। लैटिन अमेरिका की गलियों की धड़कन। उत्तर के देशों की गहरी शांति। पूर्व की जटिल सजावट। लेकिन इन सबके नीचे एक भावना साफ झलक रही थी। इटली की उष्णता, भावनाओं से डर न खाने वाली वो एहसास । सीधी और दिल से निकली हुई।
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यह कोई स्टेज या स्टूडियो परफॉर्मेंस नहीं था। यह कोई अभ्यास भी नहीं था। यह एक आपसी संवाद था। खुद से। अपने बीते सफर से। अपने घर से।
दुनिया भर के इस सफर ने जिओकोंडा को सिखाया कि दुनिया कितनी विशाल है। लोग कितने अलग होते हुए भी कितने एक जैसे हैं। और जिज्ञासा कैसे हर रोज़ की थकान के बाद भी ज़िंदा रहती है। लेकिन पियानो के सामने बैठकर उन्हें एक और सच्चाई समझ में आई। घूमने का असली मतलब तभी बनता है, जब लौटने के लिए कोई जगह हो।
घर, वो जगह, जहाँ उनकी आज़ादी पर कोई रोक नहीं था। घर वह जगह , जहाँ उनके अनुभव ठहर सकते थे। जहाँ उनकी यादें संगीत बन सकती थीं।
अगले कुछ दिनों में उनका जीवन बहुत सरल हो गया। सुबह खिड़कियों से आती रोशनी। कॉफी की खुशबू। पियानो का अभ्यास। लंबी सैर। कोई जल्दबाज़ी नहीं। कोई पैकिंग नहीं। पियानो अब उनके लिए बाहर की दिशा दिखाने वाला नहीं, बल्कि अंदर की तरफ इशारा करने वाला कंपास बन गया था।
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हर धुन, हर रचना, किसी रिहर्सल की तरह नहीं लगती थी। वह एक घर लौटने जैसा अनुभव था। जैसे उन्होंने हज़ारों किलोमीटर को संगीत में बदल दिया हो।
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दोस्तों ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें सफर की याद आती है। वह मुस्कुराईं। हाँ, ज़रूर आती है। दुनिया उन्हें हमेशा बुलाती रहेगी। वह जानती हैं कि वह फिर निकलेंगी। फिर नए रास्तों पर चलेंगी। फिर नई कहानियाँ बटोरेंगी।
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लेकिन इस समय, इस पल, ठहराव में भी एक खुशी थी। एक ही जगह को गहराई से महसूस करने की खुशी। दुनिया के बहुत सारी जगहों को हल्के से छूने के बाद, अब एक जगह, एक स्थिरता को पूरी तरह जीने का सुकून महसूस हो रहा था ।
जिओकोंडा वेस्सिकेल्ली की दुनिया भर की यात्रा असाधारण थी। लेकिन उनकी यह वापसी कहीं ज़्यादा गहरी थी। इटली में। अपने घर में। अपने पियानो के साथ। उन्हें एक संपूर्णता का एहसास मिला। यह कोई अंत नहीं था। बल्कि एक ठहराव था। संगीत में आने वाला वह छोटा सा विराम, जो अगले सुर को और भी सुंदर बना देता है।
और उन्हीं सुरों के बीच की उस खामोशी में, उन्होंने समझा कि सब कुछ देख लेने के बाद, सबसे खूबसूरत आवाज़ वही होती है, जो आपको घर लौटने पर सुनाई देती है।
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