/mayapuri/media/media_files/2026/01/27/xc-2026-01-27-15-13-36.jpeg)
25 जनवरी की शाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक सुनहरे लेकिन भावुक पल के रूप में उस वक्त दर्ज हो गई, जब गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने बॉलीवुड में ‘ही-मैन’ के रूप में मशहूर रहे धर्म पाजी यानी अभिनेता स्व. धर्मेंद्र सिंह देओल को देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (मरणोपरांत) से नवाजने का फैसला किया है। यह खबर हर उस भारतीय के दिल को छू गई, जिसने धर्मेंद्र को पर्दे पर मुस्कुराते, लड़ते और प्यार करते देखा है। धर्मेंद्र तो हमेशा हर भारतीय के दिलों के असली ‘विभूषण’ रहे हैं और रहेंगे। (Dharmendra Padma Vibhushan posthumous)
/mayapuri/media/post_attachments/2026/01/Dharmendra-185461.jpg)
1960 में फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से शुरू हुआ धर्मेंद्र के अभिनय का सफर उनकी मौत के कुछ समय बाद एक जनवरी 2026 में रिलीज़ हुई उनकी अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’ पर आकर थमा। फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ में उनके साथ बलराज साहनी और कुमकुम भी थीं। तीन सौ फिल्मों में अभिनय करने वाले धर्मेंद्र के नाम ही सर्वाधिक सफल फिल्में देने का रिकॉर्ड दर्ज है। ऐसा रिकॉर्ड उनके अलावा किसी अन्य अभिनेता के नाम नहीं है। लेकिन धर्मेंद्र का यह साधारण 65 साल लंबा करियर नहीं था, बल्कि यह एक ऐसे कलाकार की कहानी थी, जिसने हमेशा अपने किरदारों के ज़रिए समाज को कोई न कोई संदेश दिया। धर्मेंद्र ने अपनी हर फिल्म के माध्यम से अपने प्रशंसकों को कुछ न कुछ प्रेरणा देने का ही काम किया।
/mayapuri/media/post_attachments/078/Dil-Bhi-Tera-Hum-Bhi-Tere-Hindi-1960-20230113133130-500x500-189908.jpg)
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BM2Y0YTM4YzgtZmIxYi00YjU0LTk0YjUtYjVkYmQxNDgxYjA1XkEyXkFqcGc@._V1_-689561.jpg)
यह अलग बात है कि नब्बे के दशक के बाद धर्मेंद्र ने जे पी दत्ता व कुछ अन्य निर्देशकों के साथ कुछ ऐसी फिल्मों में अभिनय किया कि उनकी इमेज एक्शन स्टार की बनी। कुछ लोग उन्हें ‘कुत्ते... कमीने...’ के संवादों के लिए भी याद करते हैं। पर सबसे बड़ा सच यह है कि धर्मेंद्र सिर्फ एक्शन हीरो नहीं थे। धर्मेंद्र उन मात्र ऐसे कलाकार हैं, जो कि ‘इप्टा’ या किसी अन्य खास विचारधारा वाली संस्था के साथ बिना जुड़े अपनी फिल्मों या अपने द्वारा निभाए गए किरदारों के माध्यम से सामाजिक सरोकार के मुद्दों को भी बखूबी उठाया। 1960 में रिलीज़ धर्मेंद्र के करियर की पहली फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ थी, जिसमें गरीबी, वेश्यावृत्ति और समाज के हाशिए पर पड़े लोगों के जीवन संघर्षों की बात की गई है। फिल्म ‘‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’’ पंचू (धर्मेंद्र) का किरदार संघर्ष और प्यार के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक बुराइयों के बीच फंसे किरदारों की त्रासदी को दर्शाते हुए यह फिल्म गहरा सामाजिक संदेश देती है, कि कैसे परिस्थितियाँ लोगों को गलत रास्ते पर धकेलती हैं और फिर भी उनमें अच्छाई की उम्मीद बाकी रहती है। (Dharmendra Singh Deol national award)
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BMDc2ZjZmYjQtNTc0ZC00OGNmLTk5NGMtODZmZTlhMzhjZDhkXkEyXkFqcGc@._V1_-841077.jpg)
Also Read:Disha Patani और Talwinder की बढ़ती नजदीकियां और वायरल वीडियो से अटकलें तेज़
1962 की मोहन कुमार निर्देशित फिल्म ‘अनपढ़’ सामाजिक सरोकार के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करती है। इतना ही नहीं आप 1969 में रिलीज़ फिल्म ‘सत्यकाम’ को लीजिए... भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ईमानदार व्यक्ति की जंग, जो आज भी प्रासंगिक है। 1968 की फिल्म ‘‘आँखें’’ देशप्रेम और जासूसी के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश दे जाती है। 1974 की फिल्म ‘दोस्त’ में धर्मेंद्र ने एक ऐसा किरदार निभाया, जो जेल से छूटने के बाद समाज सुधार की बात करता है। तो वहीं धर्मेंद्र की मौत के बाद एक जनवरी 2026 को रिलीज़ फिल्म ‘इक्कीस’ में उन्होंने 1971 के युद्ध के नायक अरुण खेत्रपाल के पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल की भूमिका निभाई, जो देशभक्ति और बलिदान की एक मार्मिक मिसाल है। धर्मेंद्र ने अपनी जीवन व फिल्मी करियर की अंतिम फिल्म में पूरे समाज, देश व मानवता का जो संदेश दे गए हैं, वही संदेश उन्होंने 1964 में रिलीज़ चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘हकीकत’ के अपने किरदार बहादुर सिंह के माध्यम से 61 साल पहले भी दिया था। इससे यह साफ होता है कि धर्मेंद्र अनपढ़ नहीं बल्कि बहुत सोचने वाले इंसान थे, जिन्हें समाज, देश व हर नागरिक की चिंता सताती थी। धर्मेंद्र ने अपनी फिल्मों में अपने किरदारों के संवादों के माध्यम से भी सामाजिक सरोकारों की ही बात की। मसलन- फिल्म ‘सत्यकाम’ के संवाद ‘‘सच की राह पर चलने वाले को दुनिया पागल कहती है, लेकिन असली सुकून उसी पागलपन में है।’’ को लीजिए, यह संवाद ईमानदारी का संदेश देता है।
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BZDZmOTg5MmEtYTU2NC00MjFmLWFmNDItZTVhMzMzYzdlN2NmXkEyXkFqcGc@._V1_-545631.jpg)
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BMGQ1MGQyNGYtOTg2MC00NzY5LWFhYTYtNGEwYzg3ZTM1ZjhmXkEyXkFqcGc@._V1_-840209.jpg)
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BOTc2YjAzMzktMGE2YS00Y2FhLThjZmQtODk1ZWM4NTE3MjMyXkEyXkFqcGc@._V1_-591741.jpg)
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BMmEwODU0YTUtY2UwYi00YWJlLWI0ZTktZGI4ZmFhOWYxNWMwXkEyXkFqcGc@._V1_-602314.jpg)
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BYjRlZmQxMjEtZmZkYy00ZWU0LTk2OTQtMzJmZjQ4ZGY2OGY5XkEyXkFqcGc@._V1_FMjpg_UX1000_-964541.jpg)
फिल्म ‘अनुपमा’ का संवाद ‘‘इंसान के पास शब्द कम पड़ जाते हैं जब संवेदनाएँ गहरी होती हैं।’’ अपने आप में कमाल का संवाद है। यह संवाद उनकी संवेदनशीलता का प्रतीक है। (Dharmendra Padma Vibhushan Republic Day eve)
तो वहीं फिल्म ‘फूल और पत्थर’ का संवाद ‘‘दुनिया को नफरत से नहीं, ममता और प्यार से जीता जा सकता है।’’ अपने आप में परिवर्तन का संदेश दे जाता है। यह संवाद ज़ोर देकर कहता है कि बदलाव संभव है।
/mayapuri/media/post_attachments/images/M/MV5BZWYyMDNjZGYtZjJiOS00ODIzLTkzNDEtZWVmYjgzYjMxMWQ5XkEyXkFqcGc@._V1_-638817.jpg)
इतना ही नहीं आप रमेश सिप्पी की एक्शन प्रधान फिल्म ‘शोले’ को ही लीजिए। फिल्म भले ही गब्बर सिंह जैसे खतरनाक डाकू को मिटाने की कहानी बयान करती हो। लेकिन इसी फिल्म का संवाद ‘‘यह हाथ नहीं, फांसी का फंदा है!’’ अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने का प्रतीक है। (Dharmendra film career 300 movies)
जी हाँ! ‘अनुपमा’, ‘बंदिनी’, ‘खामोशी’, ‘चुपके चुपके’, ‘गुड्डी’, ‘सत्यकाम’ सहित हृषिकेश मुखर्जी और विमल राय की कई सफलतम फिल्मों में धर्मेंद्र ने एक संजीदा व सॉफ्ट पुरुष के किरदार निभाए। बतौर अभिनेता धर्मेंद्र ने हमेशा उन किरदारों को तवज्जो दी, जिन किरदारों ने बड़े-बड़े सवाल बड़ी सादगी के साथ उठाए। इन सभी फिल्मों में धर्मेंद्र ने बहुत परतों वाला काम किया।
/mayapuri/media/post_attachments/silhouette/wp-content/uploads/sites/3/2023/01/Hrishikesh-Mukherjee-and-Dharmendra-in-Dagdar-Baboo-muhurat-489714.jpeg)
निजी जीवन में धर्मेंद्र ‘धरती पुत्र’ कहलाए। पंजाब के फगवाड़ा से आया वह सीधा-सादा लड़का, जो ताउम्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहा। उनकी सादगी, उनकी कविताएँ और उनका अपने खेतों के प्रति प्रेम यह बताता है कि पद्म अवॉर्ड के लिए जो गरिमा और सामाजिक जुड़ाव चाहिए, वह उनके व्यक्तित्व में हमेशा से था। हालांकि, प्रशंसकों और फिल्म जानकारों का मानना है कि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। उन्हें 2012 में पद्म भूषण मिला था, लेकिन उनके कद और योगदान को देखते हुए ‘पद्म विभूषण’ की प्रतीक्षा थोड़ी लंबी रही।
/filters:format(webp)/mayapuri/media/media_files/2026/01/27/dharmendra1-2026-01-27-15-04-48.webp)
जैसा कि हमने पहले ही बताया कि वह ‘धरती पुत्र’ थे और सदैव ज़मीन से जुड़े रहे। धर्मेंद्र सिर्फ सिनेमाई पर्दे के ‘हीरो’ नहीं थे, बल्कि उन्होंने राजनीति के मैदान में भी अपनी सेवाएँ दीं। और जब तक वह सांसद रहे, अपने क्षेत्र की भलाई के ही काम करते रहे। 2004 से 2009 तक वह बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे। उन दिनों उनके आलोचकों ने उनके संसद में कम उपस्थिति पर सवाल उठाए। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि ज़मीन पर उतरकर धर्मेंद्र क्या काम कर रहे हैं और उससे किसे फायदा पहुँच रहा है। जमीनी हकीकत यह थी कि उन्होंने अपने कार्यकाल में बीकानेर के बुनियादी ढांचे के लिए कई ठोस कदम उठाए। उन्होंने अपनी सांसद निधि का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के कमरों के निर्माण और शिक्षा की बेहतरी के लिए खर्च किया। अपने लोकसभा क्षेत्र बीकानेर के दूर-दराज़ के इलाकों में सड़कों का जाल बिछाने और पीने के पानी की समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने कई ट्यूबवेल और वाटर-टैंक परियोजनाओं को मंजूरी दिलवाई थी। बीकानेर के स्थानीय कलाकारों और वहाँ की पारंपरिक कला को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पैरवी की। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था – ‘‘मैं यहाँ राजनीति करने नहीं, अपने लोगों की सेवा करने आया हूँ।’’ वह अक्सर बीकानेर के स्थानीय लोगों के साथ ज़मीन पर बैठकर खाना खाते और उनकी समस्याएँ सुनते थे, जो उनके ‘ज़मीन से जुड़े’ व्यक्तित्व को दर्शाता है। बीकानेर की सड़कों पर धूल उड़ाते हुए जब धर्मेंद्र प्रचार करते रहे, तब वह एक सुपरस्टार नहीं बल्कि एक ‘धरती पुत्र’ ही नज़र आ रहे थे। अब जब सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण दिए जाने की घोषणा की है, तो बीकानेर की जनता भी गर्व से कह रही है कि उनके ‘सांसद जी’ को उनका हक मिल गया। (Dharmendra last film Ikkees 2026)
/mayapuri/media/post_attachments/web2images/1884/2025/11/24/333_1763971438-832734.jpeg)
/mayapuri/media/post_attachments/web2images/521/2025/11/11/whatsapp-image-2025-11-11-at-184628-3_1762867783-526359.jpeg)
Also Read:Vadh 2 Trailer: Sanjay Mishra और Neena Gupta की फिल्म 'वध 2' का ट्रेलर आउट
आज धर्मेंद्र हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन यह सम्मान उनकी उस विरासत को सलाम है, जो उन्होंने 89 वर्षों के अपने जीवन में छोड़ी है। भारत सरकार का यह फैसला करोड़ों प्रशंसकों के लिए एक सुकून भरी खबर है।
/mayapuri/media/post_attachments/dhanamonline-english/2025-11-11/qcj2soou/dharmendra-146409.avif?w=480&auto=format%2Ccompress&fit=max)
धर्मेंद्र जी को मरणोपरांत मिला यह पद्म विभूषण सिर्फ एक कलाकार को मिला सम्मान नहीं है, बल्कि उस सच्चाई और सादगी को मिला सलाम है जिसे उन्होंने ‘सत्यकाम’ जैसी फिल्मों और बीकानेर के सांसद के तौर पर जिया।
FAQ
Q1. धर्मेंद्र को पद्म विभूषण कब और किस अवसर पर दिया गया?
धर्मेंद्र को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या, 25 जनवरी को भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत पद्म विभूषण देने का फैसला किया गया।
Q2. धर्मेंद्र को यह सम्मान क्यों दिया गया?
उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान, रिकॉर्डतोड़ सफल फिल्मों और सामाजिक संदेश देने वाले सशक्त अभिनय के लिए सम्मानित किया गया।
Q3. धर्मेंद्र के फिल्मी करियर की शुरुआत कब हुई थी?
धर्मेंद्र ने 1960 में फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी।
Q4. धर्मेंद्र ने अपने करियर में कितनी फिल्मों में काम किया?
धर्मेंद्र ने लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया और सर्वाधिक सफल फिल्मों का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज है।
Q5. धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म कौन सी थी?
धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’ थी, जो जनवरी 2026 में रिलीज़ हुई।
Dharmendra age | padma vibhushan award ceremony | Indian cinema legends | heman dharmendra | Bollywood Republic Day 2026 | Indian Cinema Tribute not present in content
Follow Us
/mayapuri/media/media_files/2026/01/23/cover-2677-2026-01-23-18-02-16.png)