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Holi in Bollywood films: सामाजिक बदलाव का आईना सिनेमाई होली अब चैपाल से निकलकर क्लब तक पहुँच गई

यह लेख बताता है कि कैसे फागुन, रंग और होली के उत्सव को भारतीय सिनेमा ने दशकों से जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। फिल्मों में दिखाई गई होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक परिवेश का प्रतिबिंब रही है।...

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फागुन की बयार और ढोलक की थाप के बीच जब हवा में गुलाल उड़ता है, तो हर भारतीय का हृदय झूम उठता है। लेकिन इस उमंग को घर-घर तक पहुँचाने का काम जिस जादूगर ने किया, वह है बॉलीवुड यानी कि ‘भारतीय सिनेमा’। बॉलीवुड और होली का रिश्ता वैसा ही है जैसा राग और सुर का। सिनेमाई पर्दे पर बिखरे यह रंग कभी प्रेम की अभिव्यक्ति बना, कभी विद्रोह की गूंज, तो कभी सामाजिक बदलाव का आईना। पचास के दशक की ग्रामीण मर्यादा से लेकर आज के दौर की बेबाक आधुनिकता तक, ‘फिल्मों में वर्णित होली’ ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि बदलते भारत की दास्तान लिखी है। आइए, सिनेमा के उन गलियारों में चलें जहाँ रंगों के बहाने समाज ने अपनी नई तस्वीर गढ़ी है। पिछले सौ साल से भी अधिक लंबे बॉलीवुड के इतिहास में फिल्मी पर्दे पर बिखरे होली के रंग इस बात के गवाह हैं कि हमारा समाज किस तरह बदला है। (Bollywood Holi songs evolution in Indian cinema)

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ग्रामीण जड़ें और सामूहिकता का दौर (1950-60 का दशक)

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारतीय सिनेमा ग्रामीण परिवेश के करीब था। महबूब खान की 1957 में रिलीज कालजयी फिल्म ‘मदर इंडिया’ में होली का दृश्य केवल नाच-गाना नहीं था, बल्कि वह फसल कटने की खुशी और मिट्टी से जुड़ाव का प्रतीक था। ‘होली आई रे कन्हाई..’ गाना एक सामूहिक उल्लास को दर्शाता था, जहाँ पूरा गाँव एक इकाई के रूप में उत्सव मनाता था। यहाँ होली मर्यादाओं के भीतर थी और इसमें एक पवित्रता थी। सामाजिक स्तर पर यह दौर ‘नेहरूवियन समाजवाद’ का था, जहाँ सामुदायिक विकास ही प्राथमिकता थी, और फिल्मों में होली इसी सामूहिकता का आईना बनी। फिल्म ‘मदर इंडिया’ के शकील बदायूनी लिखित होली गीत ‘‘होली आयी रे कन्हाई..’’ को संगीतकार नौशाद के निर्देशन में शमशाद बेगम ने आवाज दी थी। इस गाने को राधा बनी नरगिस दत्त के साथ सुनील दत्त, राज कुमार, राजेंद्र कुमार, कुमकुम व गाँव वासी बने जूनियर आर्टिस्टों पर फिल्माया गया था।

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विरोध, विद्रोह और ‘गब्बर’ की होली (1970-80 का दशक)

70 के दशक तक आते-आते समाज का सरकार व सामंती व्यवस्था आदि से मोहभंग होने लगा था। परिणामतः व्यवस्था के प्रति गुस्सा और ग्रामीण भारत में सामंती व्यवस्था का क्रूर चेहरा सिनेमा में नजर आने लगा था। 1975 में रिलीज रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ की होली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रामगढ़ के निवासियों के लिए होली खुशियों का मौका थी, लेकिन गब्बर सिंह का हमला उस खुशी को दहशत में बदल देता है। ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ गाना जहाँ एक तरफ प्रेम और भाईचारे की बात करता है, वहीं इसी दृश्य में गब्बर का वह खूंखार संवाद- ‘‘कब है होली, कब है होली?..’’ समाज में व्याप्त असुरक्षा और अपराध की ओर संकेत करता है। खुशी, प्यार और दुश्मनी को भूलकर गले मिलने का संदेश देने वाले इस गीत को गीतकार आनंद बख्शी ने लिखा था, जिसे संगीतकार आर.डी. बर्मन के निर्देशन में किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने गाया था। यह गाना धर्मेंद्र और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया था।

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इसी दौर में 1981 में यश चोपड़ा ने अपने निर्देशन में बनी फिल्म ‘सिलसिला’ में होली को सामाजिक मर्यादा और व्यक्तिगत प्रेम के टकराव के रूप में पेश किया। ‘रंग बरसे भीगे चूनर वाली’ गाना आज भी होली का पर्याय है, लेकिन उस दृश्य की गहराई को देखें तो वह पारंपरिक वैवाहिक ढांचे के भीतर दबी हुई प्रेम की दबी इच्छाओं का विस्फोट था। यह वह दौर था जब सिनेमा ने निजी भावनाओं को सामाजिक ढांचे से ऊपर रखना शुरू कर दिया था। फिल्म ‘सिलसिला’ के इस फोक गीत के संगीतकार शिव-हरि थे और इसे अमिताभ बच्चन ने खुद गाया था और उन्हीं पर फिल्माया गया था। मजेदार बात इस गीत को अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन ने लिखा था। (history of Holi celebration in Hindi films)

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उदारीकरण और ग्लैमरस होली (1990-2000 का दशक)

90 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय समाज ‘ग्लोबल’ होने लगा। इसका सीधा असर सिनेमा पर पड़ा। अब होली गाँव की चैपाल से निकलकर बड़े बंगलों के लॉन और विदेशी लोकेशंस पर पहुँच गई। इस बदलाव को इसी बात से समझा जा सकता है कि 1981 में फिल्म ‘सिलसिला’ में ‘‘रंग बरसे..’’ जैसा फोक गीत देने वाले फिल्मकार यश चोपड़ा ने 12 साल बाद 1993 में रिलीज फिल्म ‘डर’ में ‘अंग से अंग लगाना’ जैसा गाना लेकर आए, जिसमें होली को एक कामुक और निजी उत्सव के रूप में पेश किया। यहाँ होली अब केवल भाईचारे का त्योहार नहीं रही, बल्कि इसमें ‘प्राइवेसी’ और ‘रोमांस’ का तड़का लग गया। आनंद बख्शी लिखित इस गीत के भी संगीतकार शिव-हरि ही थे। जबकि इसे अलका याग्निक, सुदेश भोसले, विनोद राठौड़ व देवकी पंडित ने स्वरबद्ध किया था। यह गाना लोनावाला स्थित एक बंगले में शाहरुख खान, जुही चावला व सनी देओल पर फिल्माया गया था।


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धीरे-धीरे यश चोपड़ा और सूरज बड़जात्या की फिल्मों ने होली को एक भव्य ‘पारिवारिक समारोह’ बना दिया। 2003 में आयी बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘बागबान’ की होली पारिवारिक मूल्यों और बुजुर्गों के सम्मान को केंद्र में रखती है। फिल्म में अवधी लोकगीत शैली का गाना ‘होरी खेले रघुवीरा’ गाना यह दर्शाता है कि आधुनिकता के बीच भी भारतीय समाज अपनी परंपराओं की जड़ों को ढूंढने की कोशिश कर रहा था। इसे सुखविंदर सिंह, अलका याग्निक, अमिताभ बच्चन और उदित नारायण ने गाया। अमिताभ बच्चन ने तो इसे अपने अंदाज में गाया। यह गाना होली के त्योहार पर रंग, संगीत और प्रेम को उजागर करता है।

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मॉडर्न इंडिया और 2010 में रिलीज फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ का दौर (2010 से अब तक)

आज के दौर का सिनेमा और उसकी होली पूरी तरह बदल चुकी है। अब यह त्योहार केवल परिवार या गाँव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोस्तों के साथ ‘पार्टी’ करने और अपनी आजादी का जश्न मनाने का जरिया है। 2013 में रिलीज फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ का ‘बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी’ गाना आधुनिक युवाओं की मानसिकता को दर्शाता है। यहाँ होली में कोई वर्जना नहीं है, कोई सामाजिक बंधन नहीं है... बस स्वच्छंदता और मौज-मस्ती है। संगीतकार प्रीतम के निर्देशन में इस गाने को शाल्मली खोलगडे और विशाल ददलानी ने गाया था। यह गाना रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण पर फिल्माया गया था, जिसमें इनकी केमिस्ट्री कमाल की थी। (famous Holi scenes in Indian cinema history)

2013 में ही रिलीज संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ में संजय लीला भंसाली ने होली के रंगों को कामुकता और हिंसा के मेल के साथ दिखाया। फिल्म के होली गीत ‘‘लहू मुँह लग गया..’’ है, जिसमें रंग केवल गालों पर नहीं लगते, बल्कि वह जुनून और लहू का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। यह दर्शाता है कि समकालीन सिनेमा अब भावनाओं को और अधिक प्रखर और कच्चा (रॉ) दिखाने लगा है। गुजरात के पारंपरिक लोक संगीत से प्रेरित और सिद्धार्थ गरिमा लिखित इस गीत को संगीतकार संजय लीला भंसाली के निर्देशन में शैल हांडा और उस्मान मीर ने गाया है। इस गाने को रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण पर फिल्माया गया।

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वर्जनाओं का टूटनाः जब विधवाओं ने खेला रंग

सिनेमा ने होली के माध्यम से सबसे बड़ा सामाजिक बदलाव ‘विधवाओं’ के चित्रण में दिखाया है। सदियों से विधवाओं को रंगों से दूर रखने वाली कुप्रथा पर सिनेमा ने चोट की। फिल्म ‘कटी पतंग’ (1970) का गाना ‘आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली, बस खेलेंगे हम होली, चाहे भीगे तेरी चुनरिया, चाहे भीगे रे चोली..’ में नायिका (आशा पारेख) जो एक विधवा के भेष में है, अनचाहे ही रंगों के घेरे में आती है। आनंद बख्शी लिखित इस गीत को संगीतकार राहुल देव बर्मन के निर्देशन में किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने स्वरबद्ध किया है। जिसे राजेश खन्ना और आशा पारेख पर फिल्माया गया।
वहीं, आधुनिक फिल्मों और वेब सीरीज में अब विधवाओं को अपनी इच्छा से होली खेलते हुए दिखाकर समाज की पुरानी बेड़ियों को टूटते हुए दिखाया जा रहा है। 

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क्या बॉलीवुड से ‘होली’ गायब हो रही है? (2015-2025 का दौर)

हैरानी की बात यह है कि जिस बॉलीवुड ने होली को वैश्विक पहचान दी, पिछले एक दशक (विशेषकर 2015 के बाद) में उसी सिनेमाई पर्दे से होली के रंग कुछ फीके पड़ते दिखाई दिए हैं। यदि हम 2017 में रिलीज फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ या ‘जॉली एलएलबी 2’ जैसे कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो बड़े बजट की फिल्मों में अब होली के भव्य दृश्य और विशेष गीत कम ही नजर आते हैं।
हम याद दिला दें कि शशांक खेतान निर्देशित फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ में आधुनिक होली पार्टी ऐंथम ‘बद्री की दुल्हनिया’ है, जिसे वरुण धवन व आलिया भट्ट पर फिल्माया गया है। जो कि मशहूर लोकगीत

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Akshay Kumar and Huma Qureshi 'Go Pagal' Splashing Holi Colors with their  Jolly LL.B 2 - w3buzz

‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे’ का रीमेक है। इसे नेहा कक्कड़, मोनाली ठाकुर, देव नेगी और इक्का ने गाया है।
अब बड़े बजट की फिल्मों में होली गीत न होने के पीछे कई कारण हैं। पहला- सिनेमा का वैश्विकरण, अब फिल्में केवल भारतीय दर्शकों के लिए नहीं, बल्कि ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं, जहाँ त्यौहारों से ज्यादा ‘यूनिवर्सल कंटेंट’ पर जोर है। दूसरा- कहानी कहने का बदलता अंदाज; अब फिल्में ‘मसाला’ जॉनर से हटकर रियलिस्टिक और थ्रिलर की ओर मुड़ गई हैं, जहाँ नाच-गाने वाले त्यौहारों के लिए जगह कम बची है। तीसरा- डिजिटल क्रांति यानी कि ओटीटी के दौर में कहानियाँ अब शहर की गलियों के बजाय डार्क रूम्स और क्राइम थ्रिलर में सिमट गई हैं। आज का निर्माता ‘होली गीत’ पर पैसा खर्च करने के बजाय उसे कहानी की गति में बाधा मानने लगा है। यह कमी खलती है, क्योंकि होली सिर्फ एक सीन नहीं, बल्कि भारतीय दर्शकों के लिए सिनेमा से जुड़ने का एक इमोशनल पुल हुआ करती थी।
बॉलीवुड फिल्मों में होली का सफर ‘मिट्टी’ से शुरू होकर ‘मल्टीप्लेक्स’ तक पहुँच गया है। पहले जहाँ होली का रंग ‘गुलाल’ होता था, जो सादगी का प्रतीक था, अब उसका स्थान ‘नियॉन कलर्स’ और ‘पूल पार्टी’ ने ले लिया है। फिल्मों ने दिखाया है कि कैसे हमारा समाज अधिक व्यक्तिवादी, स्वतंत्र और बेबाक हुआ है। लेकिन इन सबके बीच, होली का मूल तत्व ‘बुरा न मानो होली है..’ आज भी फिल्मों के जरिए हमें यह याद दिलाता है कि साल में एक दिन ऐसा आता है जब सारे भेदभाव रंगों की एक परत के नीचे छिप जाते हैं। (symbolism of colors in Bollywood Holi sequences)

Chalat Musafir Moh Liya Re' is not traditional folk tune | SHANKAR-JAIKISHAN

बॉक्स आयटमः

बॉलीवुड फिल्मों की ‘होली’ के यादगार संवादः
कुछ संवाद ऐसे हैं जिन्होंने होली के अर्थ को सिनेमाई इतिहास में अमर कर दिया!
1- होली कब है... कब है होली? : फिल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह का यह संवाद डर और तनाव पैदा करने के लिए जाना जाता है।
2- होली खेलने का शौक है, पर तुम्हारी पिचकारी में दम नहीं! : फिल्म ‘सौदागर’ में राजकुमार का यह संवाद, अपनी खास शैली में प्रतिद्वंद्वी को चुनौती देने के लिए जाना जाता है।
3- अपने ही रंग में रंग लेना... : यह संवाद अक्सर प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाने के लिए उपयोग किया जाता है।

[Holi Special] Amjad Khan as Gabbar Singh: Sholay

When Raaj Kumar threw gulaal on Dilip Kumar's face despite repeated  warnings - India Today

बॉक्स आयटमः

बॉलीवुड की ‘टॉप 10’ होली प्लेलिस्ट
1- रंग बरसे भीगे चुनर वाली (फिल्म ‘सिलसिला’) : अमिताभ बच्चन की आवाज के बिना होली अधूरी है।
2- होली के दिन दिल खिल जाते हैं (फिल्म ‘शोले’) : दोस्ती और भाईचारे का गीत।
3- आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली (फिल्म ‘कटी पतंग’) : राजेश खन्ना का क्लासिक अंदाज।
4- होली आई रे कन्हाई (फिल्म ‘मदर इंडिया’) : लोक संगीत और परंपरा का संगम।
5- अंग से अंग लगाना (फिल्म ‘डर’) : होली का शरारती और रोमांटिक पहलू।
6- होरी खेले रघुवीरा (फिल्म ‘बागबान’) : अवधी अंदाज और पारिवारिक उत्सव।
7- डू मी अ फेवर, लेट्स प्ले होली (फिल्म ‘वक्त’) : आधुनिक और फंकी होली।
8- बलम पिचकारी (फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’) : न्यू जनरेशन का सबसे पसंदीदा गाना।
9- बद्री की दुल्हनिया (फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’) : हाई-एनर्जी डांस नंबर।
10- लहू मुँह लग गया (फिल्म ‘राम-लीला’) : रंगों के साथ प्रेम की तीव्रता।

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बॉक्स आयटमः

सेलिब्रिटी कोट्स (होली पर फिल्मी सितारों के विचार)
अमिताभ बच्चनः होली मेरे लिए हमेशा से ‘सिलसिला’ और आर.के. स्टूडियो की यादें लेकर आती है। यह रंगों से ज्यादा रिश्तों को सहेजने का दिन है।
शाहरुख खानः मुझे होली पर रंगों से ज्यादा वह पागलपन पसंद है जो सड़कों पर दिखता है। सिनेमा ने इस त्योहार को वाकई ‘लार्जर दैन लाइफ’ बना दिया है।
दीपिका पादुकोणः होली अब केवल गुलाल तक सीमित नहीं है, यह दोस्तों के साथ पुराने गिले-शिकवे मिटाकर नाचने का नाम है। (iconic Holi songs and their cultural impact)

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