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बड़े-बड़े स्टार कलाकारों को तो छोड़िए, अब तो छोटे कलाकार भी फिल्म निर्माता बन रहे हैं। मीरा चोपड़ा ने फिल्म ‘गांधी टॉक्स’ का निर्माण किया, जो 30 जनवरी 2026 को रिलीज़ हुई, पर इसकी हालत यह हुई कि हमें कहावत याद आ गई – ‘जंगल में मोर नाचा, किसने देखा...’। अब फिल्म ‘12वीं फेल’ के लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जीत चुके अभिनेता विक्रांत मैसी भी निर्माता बन गए हैं। (actors turning film producers in Bollywood)
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बॉलीवुड में इस वक्त दो एकदम अलग लहरें चल रही हैं। एक तरफ वे बड़े-बड़े फिल्म प्रोडक्शन हाउस हैं, जिनके पास अरबों की संपत्ति थी। लेकिन आज ये फिल्म प्रोडक्शन हाउस धीरे-धीरे बिक रहे हैं। करण जौहर के प्रोडक्शन हाउस ‘धर्मा प्रोडक्शन’ में आदार पूनावाला की हिस्सेदारी हो गई है। संजय लीला भंसाली की कंपनी के 29 प्रतिशत शेयर बिक चुके हैं। पाँच जनवरी 2026 को ही फरहान अख्तर और रितेश सिद्धवानी की प्रोडक्शन कंपनी ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ के 30 प्रतिशत शेयर यूनिवर्सल म्यूजिक इंडिया ने खरीदे। तो तीन फरवरी 2026 की सुबह-सुबह जियो स्टूडियोज़ द्वारा गुनीत मोंगा और अचित जैन की कंपनी सिख्या इंटरटेनमेंट के 50.01 प्रतिशत शेयर खरीदने की खबर आ चुकी है। इन प्रोडक्शन हाउसों के बिकने की खबरों के बीच बॉलीवुड के आर्थिक हालात खस्ताहाल होने की भी चर्चाएँ हैं। फिल्में बॉक्स ऑफिस पर लगातार असफल हो रही हैं।
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तो दूसरी तरफ मीरा चोपड़ा व विक्रांत मैसी जैसे कलाकारों की एक नई फौज तैयार हो रही है! मतलब यह कि वे कलाकार जो अब सिर्फ स्क्रिप्ट नहीं पढ़ते, बल्कि चेकबुक भी साइन कर रहे हैं। मीरा चोपड़ा के बाद अब विक्रांत मैसी भी को-प्रोड्यूसर के तौर पर मैदान में उतर चुके हैं। विक्रांत मैसी ने को-प्रोड्यूसर की हैसियत से फिल्म ‘‘मुसाफिर कैफे’’ का निर्माण किया है। क्या समझा जाए कि कलाकारों को निर्माता पर भरोसा नहीं रहा? क्या इनके पास अभिनय से इतना अधिक धन आ गया है कि अब वे भी फिल्म निर्माण में पैसा लगा रहे हैं? कुछ लोग तो इसे ‘क्रिमिनल वेस्टेज ऑफ मनी’ की संज्ञा तक दे रहे हैं। ऐसा कहने वाले अभिनेत्री से निर्माता बनी मीरा चोपड़ा की फिल्म ‘गांधी टॉक्स’ की दुर्गति की तरफ इशारा करते हैं। सवाल यह उठ रहा है कि ये कलाकार जो निर्माता बन रहे हैं, वे भी बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउसों की तरह अंधी दौड़ का हिस्सा बनते हुए फिल्म के कंटेंट यानी कि कहानी आदि पर ध्यान नहीं दे रहे हैं?? (Mira Chopra producer Gandhi Talks film)
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पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा कि बड़े स्टूडियोज़, जो कभी फिल्मों की रीढ़ हुआ करते थे, वह भारी नुकसान में हैं। कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर और बड़े बजट की फ्लॉप फिल्मों ने कमर तोड़ दी है।
2007 में टीवी सीरियल से करियर की शुरुआत करने वाले विक्रांत मैसी को ‘कलर्स’ के सीरियल ‘बालिका वधू’ में श्याम सिंह के किरदार से पॉपुलैरिटी मिली थी। 2013 में रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा के साथ विक्रांत मैसी ने फिल्म ‘लुटेरा’ से बॉलीवुड में कदम रखा था। उसके बाद ‘दिल धड़कने दो’, ‘हाफ गर्लफ्रेंड’, ‘कारगो’, ‘हसीन दिलरुबा’ सहित कई फिल्में कीं, पर बात बनी नहीं। लेकिन विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘12वीं फेल’ ने उन्हें स्टार बना दिया। इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड भी मिल गया। ‘12वीं फेल’ की भारी सफलता के बाद विक्रांत मैसी हवा में उड़ने लगे। उन्होंने फिल्मों से सन्यास लेने तक की घोषणा कर दी। पर फिर बहुत जल्द पलट गए। अब विक्रांत मैसी ने को-प्रोड्यूसर के तौर पर फिल्म ‘‘मुसाफिर कैफे’’ का निर्माण ही नहीं किया है, बल्कि इसमें वह वेदिका पिंटो और महिमा मकवाना के साथ अभिनय भी किया है। फिल्म का निर्देशन रूचिर अरुण ने किया है। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि विक्रांत का एक स्टेटमेंट है कि अब कंटेंट ही असली किंग है, और कलाकार खुद अपनी कहानी को प्रोटेक्ट करना चाहते हैं।
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दिव्या प्रकाश दुबे द्वारा लिखित कहानी ‘मुसाफिर कैफे’ एक ऐसी प्रेम कहानी है जो दिल को छू लेती है और अपने गर्मजोशी भरे, वास्तविक किरदारों – चंदर, सुधा और प्रीति – के साथ और भी गहरी होती जाती है। तीन मुसाफिर जिनके जीवन अप्रत्याशित तरीकों से आपस में जुड़ जाते हैं। चंदर और सुधा के बीच एक ऐसा अचानक जुड़ाव होता है जो चिंगारी की तरह लगता है, जिसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है। वहीं, प्रीति के साथ चंदर एक स्थिर रिश्ता बनाता है, एक ऐसा बंधन जो शांत समझ और साथ रहने के सुकून पर आधारित है। रोमांस, जुनून और संभावनाओं से भरी इस शाश्वत यात्रा में, कौन सा प्यार समय, महत्वाकांक्षा और जीवन के लंबे सफर में खरा उतरेगा? (Dharma Productions stake Adar Poonawalla)
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इस फिल्म को लेकर विक्रांत मैसी कहते हैं – ‘‘हम सभी प्रेम कहानियों से बने हैं। कुछ प्रेम कहानियाँ हम खोजते हैं, कुछ हमें मिल जाती हैं, कुछ हमें यात्रा पर ले जाती हैं, और कुछ हमें साहसी बनाती हैं। सबसे महान यात्राएँ हमें हमारी सच्ची इच्छाओं के करीब लाती हैं। मुसाफिर कैफे आपको पहाड़ों में ताज़ी बनी कॉफी के साथ रुकने, एक घूँट लेने और उस जादू का अनुभव करने का निमंत्रण देता है।’’
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फिल्म ‘मुसाफिर कैफे’ से फिल्म निर्माण में उतरने यानी को-प्रोड्यूसर बनने की बात करते हुए विक्रांत मैसी कहते हैं – ‘‘जब मैंने दिव्या प्रकाश दुबे की कहानी ‘मुसाफिर कैफे’ पढ़ी, तो यह तय कर लिया कि मुझे इसमें अभिनय करना है। उसके बाद विजय सुब्रमण्यम ने कुछ ऐसा कहा कि मैंने तय कर लिया कि मैं इस फिल्म का सह-निर्माण भी करूँगा। अब यह फिल्म बन चुकी है और जल्द ही दर्शक इसे देख सकेंगे।’’ (Bollywood box office failures 2026)
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मीरा चोपड़ा की बनिस्बत
विक्रांत मैसी ने बहुत ही ज़्यादा सुरक्षित गेम खेला है। उन्होंने अपनी फिल्म ‘मुसाफिर कैफे’ का सह-निर्माण ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स के लिए किया है। लेकिन दूसरे कलाकारों की ही तरह विक्रांत मैसी ने भी प्रोडक्शन में कदम रखकर ये साफ कर दिया है कि आज के कलाकार सिर्फ ‘हायर किए गए लेबर’ बनकर नहीं रहना चाहते। वे क्रिएटिव कंट्रोल चाहते हैं। जब आप सह-निर्माता बनते हैं, तो फिल्म के विज़न में आपकी बराबरी की हिस्सेदारी होती है। अब ‘‘मुसाफिर कैफे’’ देखकर ही पता चलेगा कि विक्रांत मैसी का क्रिएटिव कंट्रोल कितना रहा और वे कहानी को लेकर जितनी बातें कर रहे हैं, उन बातों को दर्शक भी समझ पा रहा है या नहीं। (content crisis in Hindi cinema)
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लेकिन बड़े प्रोडक्शन हाउसों का बिकना और कलाकारों का फिल्म निर्माण में उतरना, यह बताता है कि अब बॉलीवुड ‘स्टार पावर’ से हटकर ‘सब्सटेंस’ की तरफ बढ़ रहा है। अब छोटे बजट और मज़बूत कहानियों का जमाना है जहाँ रिस्क कम और इम्पैक्ट ज़्यादा है।
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