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Valentine's Day पर याद करते हैं बॉलीवुड के उन अधूरी कहानियों को जो प्यार में खिल ना पाए

वैलेंटाइन के मौके पर जानिए बॉलीवुड की उन अधूरी प्रेम कहानियों के बारे में, जो इज़हार और इंतज़ार से भरी रहीं, मगर मुकम्मल न हो सकीं—फिर भी आज तक यादों में ज़िंदा हैं।

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वैलेंटाइन का मौसम आते ही प्यार की कहानियाँ अपने आप अतीत के दरवाज़े  खटखटाने लगती हैं। हम अक्सर उन रिश्तों की बात करते हैं जो मुकम्मल हो गए, लेकिन भारतीय सिनेमा का इतिहास ऐसे प्रेम से भी भरा पड़ा है जो अधूरा रह गया। ये वो कहानियाँ हैं, जिनमें इज़हार था, इंतज़ार था, तकरार थी, लेकिन अंत नहीं था। इन कहानियों में फूल भी थे और चॉकलेट भी लेकिन ये प्यार ऐसे थे जो अधूरे रह गए, फिर भी समय की धूल उन्हें मिटा नहीं पाई।
भारतीय सिनेमा के लगभग 113 वर्षों के इतिहास में ऐसी कई प्रेम कहानियाँ दर्ज हैं, जो परदे के पीछे पनपीं, चर्चा में रहीं, लेकिन एक मोड़ पर आकर थम गईं।
वैलेंटाइन के इस खास मौके पर आइए नज़र डालते हैं बॉलीवुड की कुछ ऐसी प्रेम कहानियों पर, जो अधूरी रह गईं, लेकिन आज भी यादों में ज़िंदा हैं।

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दिलीप कुमार और मधुबाला

दिलीप कुमार और मधुबाला का रिश्ता उस दौर का सबसे चर्चित और सबसे उलझा समझा गया प्रेम था। दोनों अपने रिश्ते को छुपाने वालों में से नहीं थे। फिल्म ‘इंसानियत’ के प्रीमियर पर जब दोनों हाथों में हाथ डाले नज़र आए, तो किसी को भी सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उनका रिश्ता सार्वजनिक था और लोग मान चुके थे कि शादी की घोषणा होने में बस कुछ समय की देर है।

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लेकिन यह कहानी उतनी आसान नहीं थी, जितनी बाहर से दिखती थी। साल 2014 में अपनी आत्मकथा में दिलीप कुमार ने पहली बार इस रिश्ते पर खुलकर लिखा था । उन्होंने स्वीकार किया कि मधुबाला उन्हें सिर्फ़ एक खूबसूरत सह-कलाकार नहीं लगी थीं, बल्कि उनमें वे गुण मिलते जुलते थे, जो वे उस उम्र में अपने जीवनसाथी में ढूँढते थे।

इस रिश्ते में एक दिलचस्प मोड़ तब आया, जब  मधुबाला के पिता ने बेटी को सलाह दी कि दिलीप कुमार जैसे उसूलों पर चलने वाले इंसान से प्रतिबद्धता पाने का रास्ता उनके प्यार को ढाल बनाकर पाया जा सकता है। यह सलाह उस दौर की सोच को भी रेखांकित करती है।

When Dilip Kumar allegedly told Madhubala to leave her father and marry  him, latter cried and said 'Humari zindagi barbaad ho jayegi...'

आम धारणा के उलट, मधुबाला के पिता इस शादी के खिलाफ़ नहीं थे। उनकी अपनी सोच और योजनाएँ थीं। वे चाहते थे कि क्योंकि दिलीप कुमार मधुबाला को  प्यार करते थे तो वे वचन दे कि वे सिर्फ मधुबाला के ही हर फिल्म को साइन करेंगे। लेकिन ये शर्त दिलीप कुमार के काम को लेकर कड़े उसूलों से टकरा गईं। यही टकराव धीरे-धीरे इस प्रेम कहानी को ऐसे मोड़ पर ले गया, जहाँ से लौटना मुमकिन नहीं रहा। दिलीप कुमार प्यार में कोई शर्त नहीं चाहते थे। दिलीप कुमार को आश्चर्य हुआ कि मधुबाला ने पिता के इस अनुचित मांग का विरोध नहीं किया। ऐसे में दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई। मधुबाला से पिता का विरोध करते ना बना और दिलीप कुमार ने अपने उसूलों को नहीं तोड़ा। दोनों अलग हो गए सदा के लिए। लेकिन दिलीप कुमार और मधुबाला का नाम आज भी प्रेम की सबसे गहरी मिसालों में लिया जाता है।

देव आनंद और सुरैया

देव आनंद और सुरैया की प्रेम कहानी उस समय शुरू हुई, जब सुरैया बहुत कम उम्र में शोहरत की बुलंदियों पर पहुँच चुकी थीं। देव आनंद तब नए-नए इंडस्ट्री में आए थे। करियर, उम्र और हालात में फ़र्क था, लेकिन दिलों में नहीं। दोनों के बीच प्यार पनपा और यह रिश्ता भी किसी से छुपा नहीं रहा। लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ी दीवार बनी सुरैया की दादी, जिनका असर उनके जीवन के हर फ़ैसले पर था। परिवार का दबाव इतना गहरा था कि सुरैया अपने प्यार के लिए खड़ी नहीं हो सकीं। देव आनंद और सुरैया एक दूसरे को दिलों जान से चाहते थे, देव जी ने सुरैया की उंगली में अपनी प्यार की निशानी भी पहनाई थी लेकिन सुरैया अपनी दादी के खिलाफ जाकर देव आनंद से शादी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। वो बहुत रोई, देव साहब भी खूब रोये लेकिन दादी के जिद पर सुरैया ने वो अंगुठी समुन्दर में फेंक दी। इसके बाद फिर कभी देव आनंद ने सुरैया से मुलाकात नहीं की।

Dev Anand Death Anniversary His Love Story With Suraiya And Marriage  Kalpana Kartik - Entertainment News: Amar Ujala - मजहब की वजह से टूटा था  देव आनंद और सुरैया का रिश्ता, लंच

ब्रेकअप के बाद देव आनंद ने उन्हें कायर तक कह दिया था। यह शब्द उनके टूटे दिल की गवाही देता है। सालों बाद सुरैया ने एक इंटरव्यू में बताया कि देव आनंद उनसे कहा करते थे कि प्यार से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और समाज या परिवार को दिल के फ़ैसले के बीच नहीं आना चाहिए।

लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद सुरैया शादी के लिए तैयार नहीं हुईं। यह फ़ैसला उन्हें ज़िंदगी भर कचोटता रहा। उन्होंने कभी शादी नहीं की और देव आनंद के लिए यह रिश्ता हमेशा एक अधूरी कसक बनकर रह गया।

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राज कपूर और नरगिस

राज कपूर और नरगिस की प्रेम कहानी परदे पर भी उतनी ही सच्ची थी, जितनी असल ज़िंदगी में। फिल्म ‘बरसात’ से शुरू हुआ उनका रिश्ता फ़िल्मों के साथ-साथ उन दोनों प्यार से भरे दिलों में भी गहराता चला गया। दोनों ने साथ कई यादगार फ़िल्में कीं और ‘श्री 420’ का गीत ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ आज भी उनके रिश्ते की पहचान माना जाता है।

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लेकिन इस प्रेम की सबसे बड़ी सच्चाई यह थी कि राज कपूर पहले से शादीशुदा थे। नरगिस इस रिश्ते को एक इज्जत वाला नाम देना चाहती थीं, मगर राज कपूर अपनी पत्नी कृष्णा को छोड़ने का फ़ैसला नहीं कर पाए।

नरगिस ने लगभग दस साल तक राज कपूर का इंतज़ार किया कि वे लीगल तरीके से उनसे शादी करेंगे लेकिन राज कपूर ने ऐसा नहीं किया और खामोश रहे। अंततः नरगिस जी ने यह स्वीकार किया कि यह रिश्ता कभी पूरा नहीं होगा। उन्होंने अपने जीवन में राज कपूर के साथ अपने इस रिश्ते को छोड़ कर आगे बढ़ने का साहस किया और ‘मदर इंडिया’ में अपने सह-कलाकार सुनील दत्त से विवाह कर लिया।

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फिर भी, राज कपूर और नरगिस की प्रेम कहानी भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे यादगार और भावनात्मक कहानियों में गिनी जाती है।

भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में चिर कुँवारे संजीव कुमार का हेमा मालिनी के प्रति आसक्ति आज भी अमर और अंकित है।

संजीव कुमार का प्यार बेहद गहरा लेकिन एकतरफ़ा था। वे उस दौर के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं में से एक थे और निजी जीवन में बेहद संजीदा इंसान भी थे । हेमा मालिनी के प्रति उनका लगाव सिर्फ़ आकर्षण नहीं था, बल्कि सच्चा भावनात्मक जुड़ाव था।
कहा जाता है कि उन्होंने हेमा मालिनी से अपने दिल की बात कही और शादी का प्रस्ताव भी रखा। लेकिन हेमा मालिनी ने यह रिश्ता स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे धर्मेंद्र से प्यार करती थी और बाद में धर्मेंद्र से विवाह भी कर लिया।

Dhoop Chhaon (1977)

यह अस्वीकृति संजीव कुमार को भीतर तक तोड़ गई। उन्होंने कभी इस दर्द को सार्वजनिक मंच पर नहीं रखा, लेकिन उनके जीवन का अकेलापन साफ़ झलकता रहा। कई लोगों का मानना है कि इसी अधूरे प्रेम ने उन्हें जीवन भर अविवाहित रहने का रास्ता चुनने पर मजबूर कर दिया। अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित मन ही मन संजीव कुमार से दिलों जान से प्यार करती थी, वो संजीव से शादी करना चाहती थी लेकिन संजीव कुमार तो हेमा मालिनी पर दिल हार चुके थे। और वे मरते दम तक हेमा मालिनी को ही चाहते रहे और दिल का रोग लगा बैठे। एक दिन वे सदा के लिए दुनिया से विदा लेकर चले गए।

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मीना कुमारी और कमाल अमरोही

मीना कुमारी और कमाल अमरोही की कहानी प्यार से शुरू होकर दर्द में बदल गई। मीना कुमारी बेहद संवेदनशील थीं और वे कमाल अमरोही की गहरी सोच और प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित थीं। दोनों ने विवाह किया, लेकिन यह रिश्ता बराबरी और सुकून से भरा कभी नहीं रहा।

Meena Kumari Secret Wedding: Valentine's Day 1952, Meena Kumari & Kamal  Amrohi's Secret Wedding

कमाल अमरोही मीना कुमारी को प्यार तो करते थे लेकिन उन्हें समझ कभी नहीं पाए। काम का बोझ, शक और भावनात्मक दूरी ने इस रिश्ते को धीरे-धीरे तोड़ दिया। मीना कुमारी ने अपने निजी दर्द को अपनी अदाकारी में ढाल दिया। उनकी ज़िंदगी इस बात की मिसाल बन गई कि कभी-कभी प्रेम मिल भी जाए, तो उसे निभा पाना सबसे कठिन होता है। मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग हो गए। मीना जी ने शराब और शायरी को अपना जीवन सौंप दिया और कम उम्र में चली गई दुनिया छोड़ कर।

गुरुदत्त और गीतादत्त

गुरुदत्त और गीता दत्त की प्रेम कहानी जितनी रचनात्मक थी, उतनी ही पीड़ादायक भी। गीता दत्त सिर्फ़ उनकी पत्नी नहीं थीं, बल्कि उनकी फिल्मों की आवाज़ और भावनात्मक ताक़त भी थीं। ‘प्यासा’, ‘काग़ज़ के फूल’ और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्मों में गीता की गायकी ने गुरुदत्त की सिनेमाई सोच को एक आत्मा दी।

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शादी के शुरुआती सालों में दोनों के बीच गहरा लगाव था, लेकिन जैसे-जैसे गुरुदत्त की संवेदनशीलता और अकेलापन बढ़ता गया, उनके रिश्ते में दरारें आने लगीं। गुरुदत्त भीतर से बेहद बेहद भावुक, सम्वेदनशील और आत्मसंघर्ष से भरे हुए इंसान थे। कामयाबी के बावजूद वे संतुष्ट नहीं थे और यह बेचैनी उनके निजी जीवन में भी उतरने लगी।

कहा जाता है कि गुरुदत्त का अपनी फिल्मों की अभिनेत्री वहीदा रहमान की ओर भावनात्मक झुकाव, गीता दत्त के लिए गहरा आघात था। शायद वहीदा से गुरुदत्त का रिश्ता कोई सचमुच का प्रेम नहीं था, लेकिन पति पत्नी का आपसी संवादहीनता और अहम की वज़ह से बढ़ी दूरी और चुप्पी ने हालात और बिगाड़ दिए। गीता दत्त धीरे-धीरे अपने ही संसार में सिमटती चली गईं। उनका करियर प्रभावित हुआ, उनकी आवाज़ में पहले जैसी चमक नहीं रही और निजी जीवन में वे टूटती चली गईं।

Sulakshana Pandit - IMDb

गुरुदत्त ने भी इस रिश्ते को कभी संभालने की पूरी कोशिश नहीं की। उनका अकेलापन बढ़ता गया और यही अकेलापन उनकी फिल्मों में झलकने लगा। ‘काग़ज़ के फूल’ को अक्सर उनकी निजी ज़िंदगी का आईना माना जाता है, जहाँ कामयाबी के बीच इंसान पूरी तरह बिखर जाता है। आखिर गुरुदत्त ने भरी जवानी में जीवन से मुँह मोड़ लिया और फिर गीता दत्त ने भी जीवन से थक हार कर आंखें मूँद ली।

यह प्रेम कहानी साबित करती है कि रचनात्मक लोग अक्सर अपने ही भीतर की लड़ाइयों में हार जाते हैं। गुरुदत्त और गीता दत्त साथ होते हुए भी अलग-अलग दर्द जीते रहे। उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ, बस टूटकर ख़ामोश हो गया।

वैलेंटाइन के इस मौके पर ये अधूरी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि कुछ प्रेम रिश्तों में बदल जाते हैं, और कुछ रिश्तों को सम्भाल नहीं पाते। फिर भी जो प्यार सच्चा होता है, वह अधूरा होकर भी समय से परे हो जाता है।

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FAQ

1. यह लेख किस बारे में है?

यह लेख बॉलीवुड की उन अधूरी प्रेम कहानियों पर आधारित है, जो परदे के पीछे पनपीं लेकिन मुकम्मल नहीं हो सकीं।

2. इन प्रेम कहानियों को खास क्यों माना जाता है?

क्योंकि ये रिश्ते भले ही अपने अंजाम तक नहीं पहुंचे, लेकिन इन्होंने सिनेमा और दर्शकों की यादों पर गहरी छाप छोड़ी।

3. क्या ये कहानियाँ फिल्मों से जुड़ी हैं या असल ज़िंदगी से?

यह फीचर मुख्य रूप से बॉलीवुड सितारों की असल ज़िंदगी की चर्चित लेकिन अधूरी प्रेम कहानियों पर केंद्रित है।

4. वैलेंटाइन डे के मौके पर इन कहानियों को क्यों याद किया जाता है?

वैलेंटाइन डे प्यार का प्रतीक है, और अधूरी प्रेम कहानियाँ यह याद दिलाती हैं कि हर प्यार का अंत शादी या साथ में होना नहीं होता, फिर भी वह खास रहता है।

5. क्या ये प्रेम कहानियाँ आज भी चर्चा में रहती हैं?

हाँ, समय बीत जाने के बावजूद ये रिश्ते आज भी फैंस और फिल्म इतिहास में अक्सर याद किए जाते हैं।

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