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आज मन जैसे किसी गहरी खामोशी में डूब गया है।
कुछ लोग जीवन में केवल मिलते नहीं — वे एक युग रचते हैं।
श्री पी. के. बजाज जी उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में से एक थे।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि हिंदी पत्र-पत्रिका जगत के एक स्वर्णिम अध्याय का शांत हो जाना है।
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अपने पूज्य पिता श्रद्धेय श्री ए. पी. बजाज जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने लोटपोट और मायापुरी को केवल सफल पत्रिकाएँ नहीं बनाया — उन्होंने उन्हें एक परंपरा, एक पहचान और एक सांस्कृतिक धरोहर बना दिया।
उनके नेतृत्व में पत्रिका केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही; वह एक ऐसा विद्यालय बन गई जहाँ बच्चे हँसते-हँसते सीखते थे, जहाँ रचनाकार अपने सपनों को आकार देते थे, और जहाँ कल्पना को पंख मिलते थे।
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उन्हें स्नेह से सब “छोटे बाउजी” कहा करते थे।
यह नाम अपने आप में एक भाव था।
उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत संतुलन था — अनुशासन और अपनत्व का, दृढ़ता और संवेदनशीलता का।
वे निर्णय कठोर ले सकते थे, पर हृदय कोमल रखते थे।
वे व्यापार की बारीकियों को समझते थे, पर सृजनशीलता को सर्वोपरि मानते थे।
उनके लिए लेखक, चित्रकार और कर्मचारी केवल संसाधन नहीं थे — वे परिवार का हिस्सा थे।
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एक समय ऐसा आया जब चित्रकथाओं का संसार मानो ढलान पर था।
नई तकनीकें, बदलती आदतें, बाज़ार की चुनौतियाँ — सब मिलकर संकेत दे रही थीं कि अब यह दौर समाप्ति की ओर है।
एक-एक कर पत्रिकाएँ बंद हो रही थीं।
कई प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने हाथ खड़े कर दिए।
वातावरण में निराशा थी।
रचनाकारों के मन में असमंजस था।
भविष्य अनिश्चित दिखाई दे रहा था।
पर उसी कठिन समय में “छोटे बाउजी” अडिग खड़े रहे।
उन्होंने कहा —
“मेरे जीते-जी लोटपोट और मायापुरी कभी बंद नहीं होंगी।”
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यह वाक्य केवल आत्मविश्वास नहीं था, यह उनके भीतर की ज्वाला थी।
उन्हें पता था कि बच्चों की हँसी कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकती।
उन्हें विश्वास था कि कल्पना कभी पुरानी नहीं होती।
उन्हें यकीन था कि जिस साहित्य ने पीढ़ियाँ गढ़ी हैं, वह समय के साथ रूप बदल सकता है, पर समाप्त नहीं हो सकता।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है —
अगर उस समय उन्होंने हार मान ली होती,
अगर उन्होंने भी भीड़ का अनुसरण किया होता,
तो शायद ‘लोटपोट’ का वह इतिहास कभी न बनता
जिसने आगे चलकर मोटू पतलू जैसे पात्रों को जन्म दिया,
जो बाद में दूरदर्शन और अन्य बाल प्रसारण माध्यमों पर नई ऊँचाइयाँ छू सके।
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मेरा उनसे सैंतालीस वर्षों का रिश्ता केवल पेशेवर सहयोग का रिश्ता नहीं था।
वह विश्वास का, मार्गदर्शन का और आत्मीयता का संबंध था।
मेरे जीवन की पहली बड़ी पहचान — ‘मोटू पतलू’ को प्रकाशित करने का साहस — उन्होंने ही दिखाया।
जब मैं संघर्ष के प्रारंभिक दौर में था,
जब नाम से अधिक परिश्रम था,
जब सपनों से अधिक प्रश्न थे —
तब उन्होंने मुझमें संभावना देखी।
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कई बार मनुष्य स्वयं को लेकर आश्वस्त नहीं होता,
पर कोई और उसके भीतर छिपी क्षमता को पहचान ले —
तो वही क्षण जीवन की दिशा बदल देता है।
मेरे जीवन में वह क्षण “छोटे बाउजी” के विश्वास के रूप में आया।
उन्होंने मुझे कभी केवल एक रचनाकार नहीं माना,
बल्कि एक साथी, एक परिवारजन की तरह अपनाया।
उनके हर सुख-दुख में मैंने स्वयं को उनका अपना महसूस किया।
कई निर्णयों में उनकी सलाह, कई कठिन घड़ियों में उनका धैर्य,
और कई उपलब्धियों में उनकी मुस्कान —
ये सब मेरी स्मृतियों का अमूल्य खजाना हैं।
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आज जब ‘लोटपोट’ का कोई अंक हाथ में आता है,
जब किसी बच्चे की आँखों में मोटू पतलू की चमक दिखाई देती है,
जब कोई पुरानी स्मृति अचानक मन में कौंध जाती है —
तो ऐसा लगता है जैसे हर पन्ना, हर चित्र, हर संवाद
उन्हें मौन नमन कर रहा है।
उन्होंने केवल एक प्रकाशन को जीवित नहीं रखा —
उन्होंने एक पूरी पीढ़ी की कल्पना को जीवित रखा।
उन्होंने केवल व्यापार नहीं किया —
उन्होंने विश्वास को निभाया।
उन्होंने केवल सफलता नहीं पाई —
उन्होंने विरासत बनाई।
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आज उनका शारीरिक रूप हमारे बीच नहीं है,
पर उनका साहस, उनकी दूरदृष्टि, उनका स्नेह
और उनका अटूट विश्वास
हमेशा हमारे साथ रहेगा।
ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी पावन आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें
और हमें यह शक्ति दें कि हम उनकी बनाई विरासत को उसी निष्ठा, उसी साहस और उसी समर्पण से आगे बढ़ा सकें।
एक युग को प्रणाम।
एक मार्गदर्शक को नमन।
एक संरक्षक को कृतज्ञ श्रद्धांजलि।
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