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दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह (Naseeruddin Shah) के बेटे और अपने अभिनय से अलग पहचान बना चुके विवान शाह (Vivaan Shah) इन दिनों अपनी नई फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) को लेकर चर्चा में हैं. हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में 1971 के युद्ध पर आधारित फिल्म ‘इक्कीस’ में निभाए अपने किरदार कैप्टन विजेंद्र मल्होत्रा से जुड़ी कई दिलचस्प और अनसुनी बातें भी साझा कीं. इसके साथ ही उन्होंने सुपरस्टार धर्मेन्द्र (Dharmendra) आइये जानते हैं उन्होंने अपने इंटरव्यू में क्या कुछ कहा....
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जब ‘इक्कीस’ आपको ऑफर की गई, तो आपको क्या बताया गया?
मुझे बताया गया कि यह फिल्म 1971 के युद्ध और अरुण खेत्रपाल की बहादुरी से प्रेरित है. इसमें मैं कैप्टन विजेंद्र मल्होत्रा (Captain Vijender Malhotra) की भूमिका निभा रहा हूं—एक ऐसे अधिकारी की, जो अपने तरीकों और सोच में थोड़ा अलग थे. वह अपने डॉग को भी युद्ध के मैदान में साथ रखते थे और अपनी सूझ-बूझ व अनोखी रणनीतियों से दुश्मन को चकमा देते थे.
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आपने इस किरदार की तैयारी कैसे की?
मैंने कैप्टन मल्होत्रा की तस्वीरों, किस्सों और सैन्य प्रशिक्षण से बहुत कुछ सीखा. इसके अलावा, मैंने अपने चाचा जनरल ज़मीरुद्दीन शाह (Zameer Udin Shah) से भी प्रेरणा ली, जो 1971 के युद्ध में शामिल थे. सबसे पहले मुझे अपनी बॉडी लैंग्वेज और पॉश्चर पर काम करना पड़ा, क्योंकि कैप्टन मल्होत्रा बेहद अनुशासित और मजबूत व्यक्तित्व के इंसान थे.
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इस किरदार का कौन-सा पहलू आपको सबसे ज़्यादा छू गया?
उनका अपने डॉग के साथ रिश्ता. यह बहुत भावुक और खूबसूरत है. हाल ही में मैं खुद डॉग पेरेंट बना हूं, तो अब समझ आया कि वह रिश्ता कितना गहरा और बिना शर्त होता है. इसके अलावा, उनकी रणनीतिक सोच और नैतिक मजबूती ने मुझे बहुत प्रभावित किया.
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किसी असली किरदार को निभाने की ज़िम्मेदारी कितनी बड़ी होती है?
यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, खासकर तब जब उस व्यक्ति का परिवार आज भी मौजूद हो. मेरे लिए यह ज़रूरी था कि मैं अपनी कल्पना को तथ्यों से आगे न जाने दूं और उनकी आत्मा को ईमानदारी से पर्दे पर उतारूं.
क्या ऐसे रोल आपके पास अक्सर आते हैं?
सच कहूं तो नहीं. मेरी बॉयिश लुक की वजह से पुलिस या आर्मी ऑफिसर जैसे किरदार आमतौर पर मुझे ऑफर नहीं होते. इसलिए यह मौका मेरे लिए बेहद खास और सौभाग्यपूर्ण रहा.
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धर्मेंद्र जी की आखिरी फिल्म का हिस्सा होना आपके लिए क्या मायने रखता है?
धर्मजी मेरे पिता के बचपन के हीरो रहे हैं. वह हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा हैं और बहादुरी, संवेदनशीलता और करिश्मे की पहचान माने जाते हैं. भले ही फिल्म में उनके साथ मेरे सीन नहीं थे, लेकिन उनका इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होना ही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है.
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आज के दौर में क्या एक अभिनेता के लिए आर्ट और कमर्शियल सिनेमा दोनों में काम करना मुश्किल हो गया है?
हां, आज यह थोड़ा मुश्किल हो गया है. पहले की पीढ़ी के अभिनेता दोनों तरह की फिल्मों में सहजता से काम कर लेते थे. आज अगर कोई अभिनेता ‘सीरियस’ माना जाता है, तो लोग उसे एक्शन या कमर्शियल रोल में देखकर चौंक जाते हैं. यह एक तरह का पूर्वाग्रह है.
आप अपने करियर को आज किस मुकाम पर देखते हैं?
मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूं. मैंने कई ऐसी फिल्में की हैं, जिनमें मैंने पूरी दिल-जान लगा दी, लेकिन वे अपने समय में ज़्यादा लोगों तक नहीं पहुंच पाई. अब ओटीटी के ज़रिए उन फिल्मों को नया जीवन मिल रहा है. इससे मैंने यही सीखा है कि नतीजों से ज़्यादा ज़रूरी है ईमानदारी से की गई प्रक्रिया.
आगे क्या सीख सबसे अहम रही?
यही कि कोई भी अनुभव बेकार नहीं जाता. निराशाएं इस पेशे का हिस्सा हैं, लेकिन हर काम आपको कुछ न कुछ सिखाता है. सफर को जीना सीखना ही सबसे ज़रूरी है.
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