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इस समय जब पूरे देश मे यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) के नए नियमों के खिलाफ 'सवर्ण' जाति का तीखा आंदोलन पसरा हुआ है, ध्यान जाता है कि क्या सिनेमा के पर्दे पर भी ऐसा होता है? हम पाते है पर्दे पर उलटा है। साउथ की फिल्मों का नायक प्रायः दलित, पीड़ित समाज का लड़का होता है जबकि हिंदी फिल्मों में किसी जमींदार या बाहुबली का बेटा सामाजिक खोखलेपन से लड़ाई लेता है।
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कुछ समय पहले साउथ की एक फिल्म डब होकर पूरे देश मे अच्छा बिजनेस की थी। फिल्म थी 'जय भीम' - तमिल में बनी यह फिल्म डॉ. भीम राव अम्बेडकर के सिद्धांतों पर आधारित थी। जबकि हिंदी में बनाई गई ऐसी फिल्में हमेशा निर्माता का पैसा डूबा देती हैं। कभी सोचा आपने ऐसा क्यों होता है? साउथ के सुपर स्टार सूर्या के प्रोडक्शन की फिल्म 'जय भीम' का नायक (राज कन्नू ) दलित समाज का लड़का है और एक ट्राइबल- दलित गर्भवती स्त्री (सिंग्गिनी) के लिए बड़े समाज के उच्च तबके वालों से टकरा जाता है। बॉलीवुड में ऐसी कोई फिल्म आती नही, 'सैराट' जैसी कोई फिल्म आती है तो 'लव बर्ड' यानि- प्यार और रोमांस के इर्द गिर्द ही रह जाती है। वहां सामाजिक न्याय की बात पीछे छूट जाती है। ऐसी कोई फ़िल्म अबतक हिंदी भाषा मे नही आयी जिसमे कोई दलित लड़का अपने समाज के हक की लड़ाई के लिए खड़ा होता दिखे और रसूख वालों से टकरा जाए।
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दरअसल हिंदी में तकरीबन ऐसी फिल्में ही नही बनाई जाती जिनमे दलित या पिछड़े वर्ग का कोई लड़का फिल्म का हीरो दिखाया जाता हो। जबकि साउथ में उनकी लगभग हर फिल्म का हीरो फिल्म की कहानी में दलित और पिछड़ी जाति का लड़का ही हीरो का पात्र जीता है। दक्षिण के कई फिल्मकार तो ऐसे विषय को ही उठाते हैं जहां दलित लड़का बिना हीन भावना का शिकार हुए अपनी लड़ाई लड़ता है। दक्षिण के फिल्मकार - पी. रंजीत, ज्ञानवेल, मारी सल्वाराज, बेत्री रमन आदि की फिल्मों में नायक दलित समाज का ही बहुधा हुआ करता है। जबकि बॉलीवुड के बड़े बड़े बजट की फिल्में बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों में ऐसा नही होता। यहां का हीरो कोई ब्राह्मण या किसी राय बहादुर या किसी चौधरी का बेटा होता है, जो जमींदार या बड़े रसूख वाले होते हैं। वह दलित लड़की से प्यार की लड़ाई भले लड़ले, दलित कौम की लड़ाई नहीं लड़ता। (Jai Bhim movie story and social message)
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हिंदी में कुछ फिल्में बनी हैं जिनमे दलित लड़की नायिका के रूपमे दिखाई गई है। सबसे चर्चित फिल्म रही है "अछूत कन्या"। 1936 में बनी अशोक कुमार-देविका रानी की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म सबको पसंद आई थी जिसमे दलित उद्धार का संदेश था। हालांकि इससे पहले 1934 में नितिन बोस ने एक फिल्म "चंडीदास"बनाया था उसमें भी नायिका छोटी जाति की थी। नायक उच्च जाति का हो और नायिका दलित जाति की हो, तो ऐसी प्रेम कथा से समाज के उद्धार का संदेश दिया जा सकता था। उनदिनों में ऐसी कई फिल्में बननी शुरू हो गई थी जो "अछूत कन्या' तर्ज की थी। ऐसी ही एक और फिल्म "चार दिल चार राहें"(1959) थी- जिसकी हीरोइन दलित की लड़कीं थी। इस रोल को मीना कुमारी ने पर्दे पर जीया था। कभी कभार ही- हीरो भी दलित लड़के के रूप में कहानी का नायक हो जाता था। ऐसी एक फिल्म थी- "चा"(1964), जिसके हीरो थे चंद्र शेखर। इस फिल्म का एक गाना था- 'चा चा चा' जो खूब बजा था।
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आज़ादी के बाद जब समांतर सिनेमा का चलन हुआ श्याम बेनेगल, मणि कौल, प्रकाश झा, केतन मेहता जैसे मेकरों ने गरीबी और पिछड़े वर्ग की कहानियों पर फिल्म बनाना शुरू किया तब दलित-शोषित को स्क्रीन पर जगह दी जाने लगी। लेकिन, हिंदी सिनेमा के कमर्शियल पर्दे पर इनकी फिल्मों को यथोचित महत्व नही मिल सका। यहां कमर्सियल सिनेमा का ही राज रहा है।
यह दुर्भाग्य है कि हिंदी सिनेमा जगत जिसे आजकल बॉलीवुड कहा जाने लगा है, पर्दे की कहानी में नायक को किसी सेठ या 'सवर्ण' जाति के युवा के रूप में ही पेश किए जाने का प्रचलन बना हुआ है। लड़की भी कालेज गोइंग होती है जो किसी दलित या शोषित की लड़की हो ही नहीं सकती, ऐसा मान लिया जाता है। (Tamil film Jai Bhim Dalit hero)
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एक बात और है कि बॉलीवुड के फिल्म मेकर भी बड़ी जाति से ही ज्यादा आते हैं जिनके बेटे पर्दे पर आते हैं तो रुआब लेकर आते हैं। कहानी और कलात्मकता छूट जाती है उनकी ग्रेंजर लॉन्चिंग के समय। दलित निर्माता आगे आएं तब तो वे अपने समाज की कहानी लाएंगे। दक्षिण के निर्माता और बॉलीवुड के निर्माताओं में यह भी एक बुनियादी अंतर है। आजकल ओटीटी का दौर है जहां सिर्फ ग्रेंजर है, सेक्स है, कालेज लाइफ है और भागती दुनिया मे विदेश की लोकेशन हैं। वहां तो सिर्फ पैसे की जाति है। ऊंच नीच पैसे से तय होता है। यही वजह है दक्षिण की फिल्मों में "जय भीम" बन पाती है और हिंदी सिनेमा के पर्दे पर दलित या शोषित समाज का लड़का हीरो के पात्र में दिखाई नही दे पाता।
अगर समाज को जाति पाती के भेद से मुक्ति देना है तो बॉलीवुड में ऐसी फिल्में बनाए जाने की जरूरत है जहां रियल में भी हीरो दलित समाज का लड़का हो और पर्दे पर भी हीरो दलित समाज के युवा का नेतृत्व करे। अबतक बॉलीवुड में पिछड़ी जाति से हीरो बनने के लिए चिराग पासवान जैसे कम ही लड़कों के आने की बात सामने आई है (जो स्व. केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के पुत्र थे ) किंतु फिर वे भी बिना हीरो बने वापस चले गए थे। (Social justice in Hindi vs South cinema)
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सिनेमा वो माध्यम है जो विवेक पूर्ण ढंग से बनाया जाए तो देश मे क्रांति ला सकता है। सिनेमा का पर्दा फिर भी बदलाव लाया है।अब पर्दे की कहानियां 'सवर्ण' और दलित (एस सी, एस टी, ओबीसी) के बीच रेखा नहीं खींचती। पर्दे का वर्ग- भेद जाति-पाति से ऊपर उठकर अमीर-गरीब का हो गया है। पर्दे पर समानता का भाव (यूजीसी की 'एक्वीटी' सोच) यथार्थ का रूप ले रही है। यहां की नारी मर्दानी बन चुकी है और पर्दे का विकलांग लोगो के लिए सबक बन रहा है। सच कहें तो पर्दे पर अगड़ी और पिछड़ी जाति की अवधारणा दम तोड़ चुकी है। (Jai Bhim Surya production film)
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FAQ
Q1. फिल्म जय भीम किस बारे में है?
जय भीम एक तमिल फिल्म है, जो डॉ. भीम राव अंबेडकर के सिद्धांतों पर आधारित है और इसमें दलित नायक एक ट्राइबल-दलित गर्भवती महिला के लिए न्याय की लड़ाई लड़ता है।
Q2. भारतीय सिनेमा में जय भीम का महत्व क्या है?
यह फिल्म जातिगत उत्पीड़न और सामाजिक न्याय को दिखाती है और यह आम हिंदी फिल्मों में कम दिखाई देने वाले विषय को उजागर करती है।
Q3. साउथ इंडियन सिनेमा और बॉलीवुड में सामाजिक मुद्दों की प्रस्तुति में क्या अंतर है?
साउथ की फिल्मों में अक्सर नायक उत्पीड़ित समाज से होते हैं और सामाजिक अन्याय का सामना करते हैं, जबकि बॉलीवुड में नायक आमतौर पर अमीर या बाहुबली होते हैं और संघर्ष रोमांस या व्यक्तिगत समस्याओं तक सीमित रहता है।
Q4. क्या बॉलीवुड में कभी इसी तरह की सामाजिक सचेत फिल्म बनी है?
बहुत कम। हिंदी फिल्मों में ज्यादातर रोमांस या मनोरंजन पर ध्यान रहता है और दलित नायक के समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली फिल्में बेहद सीमित हैं।
Q5. जय भीम में नायक का रोल किसने निभाया?
नायक राजकन्नू का रोल अभिनेता सूर्या ने निभाया है, जिनकी प्रोडक्शन कंपनी ने फिल्म को सपोर्ट भी किया।
Social Justice Film | social justice in India | south indian cinema not present in content
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