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लखनऊ के Dr. Anil Kumar रस्तोगी: 83वें जन्मदिन से पहले मिला पद्मश्री का तोहफा!

64 वर्षों से रंगमंच से जुड़े वैज्ञानिक, वरिष्ठ रंगकर्मी और अभिनेता डॉ. अनिल रस्तोगी 82 वर्ष की उम्र के बाद भी सक्रिय हैं। थिएटर, टीवी और सिनेमा में 62 वर्षों के लंबे करियर में उन्होंने 96 नाटकों के हज़ारों मंचन, 15 टीवी धारावाहिकों.....

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64 वर्षों से थिएटर से जुड़े हुए मशहूर वैज्ञानिक, रंगकर्मी, फिल्म व टीवी कलाकार डॉ. अनिल रस्तोगी उम्र के 82वें पड़ाव के बाद भी उतने ही सक्रिय हैं। उनके अभिनय से सजी फिल्म ‘‘बारह सिंगा’’ जल्द रिलीज़ होने वाली है। इससे पहले वह फिल्म ‘‘बंगाल 1947’’ में आज़ादी से पहले बंगाल की एक रियासत के राजा के किरदार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। उससे पहले वह अक्षय कुमार की फिल्म ‘‘मिशन रानीगंज’’ में रवि किशन के पिता के किरदार में नज़र आए थे। 62 वर्ष के अभिनय करियर में 96 नाटकों के हज़ारों शो के अलावा ‘उड़ान’ और ‘ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा’ सहित 15 टीवी सीरियल तथा ‘मुक्ति भवन’, ‘मैं मेरी पत्नी और वह’, ‘इश्कजादे’, ‘जेड प्लस’, ‘रेड’, ‘मुल्क’, ‘नक्काश’ सहित साठ फिल्मों में अभिनय कर डॉ. अनिल रस्तोगी अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। डॉ. अनिल रस्तोगी ने अभिनय जगत में इतना काम लखनऊ, उत्तर प्रदेश में रहते हुए किया है। 62 वर्षों से अभिनय से जुड़े हुए डॉ. अनिल रस्तोगी को अब तक ‘यश भारती’, ‘उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी’, ‘कालीदास अवार्ड’, ‘अवध सम्मान’ और राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित ढेरों पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। लेकिन वह अपनी उम्र का 83वाँ पड़ाव पार कर 84वें पड़ाव में कदम रखते उससे चंद महीने पहले गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार के एक आदेश ने उन्हें बहुत बड़ा सम्मान देने का ऐलान कर दिया, जो कि सिर्फ उनके लिए ही नहीं बल्कि उनकी जन्मभूमि व कर्मभूमि लखनऊ के लिए भी गर्व की बात है। जी हाँ! भारत सरकार ने ‘पद्म अवॉर्ड्स 2026’ की घोषणा करते हुए डॉक्टर अनिल कुमार रस्तोगी को पद्मश्री से नवाज़ने की घोषणा की है। इस खबर से हर कलाप्रेमी का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।

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ANIL RASTO

ANIL RASOGI AND AKSHAY KUMAR IN FILM-MISSION RANIGANJ-0

कहते हैं किस्मत भी उन्हीं पर मेहरबान होती है जो मेहनत से समझौता नहीं करते। आगामी 4 अप्रैल को डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी की उम्र एक साल बढ़ जाएगी और उससे पहले ही यह खबर उनके जीवन में बहुत बड़ी खुशी लेकर आई है। 4 अप्रैल 2026 को वह 83 साल के हो जाएँगे। इस पड़ाव पर भारत सरकार का यह सम्मान उनके लिए किसी अनमोल तोहफे से कम नहीं है। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि लखनऊ की उस समृद्ध ‘रंगमंच-परंपरा’ का है जिसे उन्होंने जीवित रखा है।

ANIL RASTOGI AND akashditya lama

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डॉ. अनिल रस्तोगी की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी दिलचस्प है। पेशे से वह एक वैज्ञानिक थे! जी हाँ, ‘सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट’ में सीनियर साइंटिस्ट के पद पर रहते हुए उन्होंने दवाओं पर शोध किया। लेकिन उनका दिल हमेशा लखनऊ के ‘रंगमंच’ के लिए धड़कता रहा। दिन में लैब की टेस्ट ट्यूब और रात में थिएटर की लाइटें... यही उनकी ज़िंदगी का संतुलन था। दिन भर ‘सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की लैब में सूक्ष्मजीवों और रसायनों के बीच दवाओं की खोज करते और शाम होते ही मंच पर ग़ालिब या शेक्सपियर की रूह में उतर जाते। डॉ. रस्तोगी ने साबित किया कि विज्ञान बुद्धि देता है, तो कला संवेदना। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि वैज्ञानिक होने ने उन्हें ‘अनुशासन’ सिखाया, जिसने उनके अभिनय को और भी सटीक बनाया। डॉक्टर अनिल रस्तोगी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने विज्ञान के साथ खिलवाड़ नहीं किया। खुद अनिल रस्तोगी कह चुके हैं – ‘‘मैंने अपनी तरफ से कभी भी विज्ञान के कार्य में कोई कमी नहीं आने दी। विज्ञान के प्रति मेरा पूरा समर्पण था। कई बार ऐसा हुआ कि मैं रात में दो बजे भी साइंस के प्रयोग करने गया और रात भर काम कर सुबह पाँच बजे घर आया। पुनः दस बजे ऑफिस पहुँच गया। विज्ञान के साथ ही नाटक में अभिनय करने में मुझे जुनून रहा है। मगर मैंने दोनों को एक-दूसरे के आड़े नहीं आने दिया।’’

ANIL RASTOGI AND PRIYADARSHAN
ANIL RASTOGI AND PRIYADARSHAN

डॉक्टर अनिल रस्तोगी को तो थिएटर का भीष्म पितामह माना जाता है। डॉ. रस्तोगी ने 96 से अधिक नाटकों में अभिनय किया है। हम यहाँ याद दिला दें कि 1960 से 1990 तक कानपुर शहर का स्वरूप नगर क्षेत्र थिएटर का मैनचेस्टर माना जाता था। लेकिन नौकरी से अवकाश लेने के बाद लखनऊ में डॉक्टर अनिल रस्तोगी की थिएटर पर जब सक्रियता बढ़ी तो थिएटर की चमक कानपुर से उठकर लखनऊ पहुँच गई। नाट्य संस्था ‘दर्पण’ के माध्यम से उन्होंने ‘खामोश अदालत जारी है’, ‘मुद्राराक्षस’ और ‘अंधा युग’ जैसे कालजयी नाटकों को मंच पर जीवंत किया। उन्होंने सबसे ज़्यादा नाटक उर्मिल कुमार थपलियाल के निर्देशन में किए हैं। राजेश्वर बच्चन के साथ कुछ नाटक किए। दो नाटक राज बिसारिया के साथ किए। दीनानाथ के साथ चार नाटक किए। सबसे ज़्यादा शो नाटक ‘पक्षी जा पक्षी आ’ के किए, जो कि फिल्म ‘बोइंग बोइंग’ पर आधारित था। इस नाटक के शो पूरे बीस वर्ष 1976 से 1996 तक किए। लखनऊ के अलावा दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता, कानपुर, भोपाल सहित देश के लगभग हर शहर में उनके नाटकों के शो हुए।

ANIL RASTOGI IN FILM- KATAAN-00

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यह कितना कठिन रहा होगा, इसका अहसास आज करना मुश्किल है। पर सच यह है कि 60 और 70 के दशक में लखनऊ में थिएटर करना आसान नहीं था। डॉ. रस्तोगी और उनके साथियों ने कई बार अपनी जेब से पैसे मिलाकर नाटकों के पोस्टर छपवाए और खुद सड़कों पर जाकर उन्हें चिपकाया। आज के दौर में जब एक्टर्स को वैनिटी वैन मिलती है, तब पद्मश्री रस्तोगी जी साइकिल पर सवार होकर रिहर्सल के लिए जाते थे। यह सम्मान उस ‘साइकिल’ से लेकर ‘राष्ट्रपति भवन’ तक के सफर का है।

लखनऊ रंगमंच और डॉ. अनिल रस्तोगी का नाम एक-दूसरे के पर्याय सा बने हुए है। डॉ. अनिल रस्तोगी का ज़िक्र छिड़ने पर स्वाभाविक तौर पर ‘दर्पण’ नाट्य संस्था का ज़िक्र अनिवार्य हो जाता है। उन्होंने लखनऊ में रंगमंच की एक ऐसी पौध तैयार की, जिससे निकले कलाकार आज बॉलीवुड और पूरी दुनिया में नाम कमा रहे हैं। वह केवल खुद नहीं चमके, उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को रोशनी दी।

सिर्फ थिएटर ही नहीं, अनिल कुमार रस्तोगी ने बड़े पर्दे पर भी अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। चाहे वह फिल्म ‘इश्कजादे’ हो या ‘मुल्क’ हो या नक्काश हो या ‘जेड प्लस’ हो। उन्होंने दिग्गज कलाकारों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी सहजता और संवाद अदायगी का ऐसा जादू है कि दर्शक उन्हें देखते ही उनसे जुड़ जाते हैं। उन्होंने सिखाया कि अभिनय केवल चेहरा दिखाना नहीं, बल्कि चरित्र को जीना है। डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी ने छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक अपनी अदाकारी की छाप छोड़ी है।

दूरदर्शन के दौर में उन्होंने ‘नीव’, ‘तहरीर मुंशी प्रेमचंद की’ और ‘हकीकत’ जैसे धारावाहिकों से अपनी पहचान बनाई। लेकिन अनिल रस्तोगी को सबसे पहले सीरियल ‘उड़ान’ में एसएसपी बशीर अहमद का किरदार निभाने से अभिनेता के तौर पर राष्ट्रीय पहचान मिली थी। तो वहीं सब टीवी के शो ‘लापतागंज’ और ‘चिड़िया घर’ जैसे शोज़ में उनके संजीदा और प्रभावशाली किरदारों ने उन्हें हर घर तक पहुँचा दिया।

तो वहीं फिल्मों में उन्होंने अक्सर सत्ता और शासन से जुड़े मज़बूत किरदार निभाए। फिल्म ‘इश्कजादे’ में ‘चैहान’ का किरदार हो, या ‘मुल्क’ में जज की भूमिका, उन्होंने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से सीन में जान फूंक दी। इसके अलावा उन्होंने ‘रेड’ और ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्मों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। ‘‘बंगाल 1947’’ में वह आज़ादी से पहले बंगाल की एक रियासत के राजा के किरदार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। इससे पहले वह अक्षय कुमार की फिल्म ‘‘मिशन रानीगंज’’ में रवि किशन के पिता के किरदार में नज़र आए थे।

मज़ेदार बात यह है कि डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी कभी फिल्मों में अभिनय करने के बारे में सोचा ही नहीं था। कुछ समय पहले हमसे बातचीत करते हुए डॉक्टर अनिल रस्तोगी ने कहा था – ‘‘फिल्म में अभिनय करना तो मेरे लिए बहुत दूर की कौड़ी थी। मैंने इस दिशा में कभी सोचा भी नहीं था। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि मुंबई मायानगरी में कलाकार कैसे पहुँचता है और फिल्मों के लिए कलाकार का चयन किस तरह से होता है। इत्तफाक की बात है कि 1984 में सुधीर मिश्रा जी के पिता प्रोफेसर डी एन मिश्रा ने मुझे फ्रेंच भाषा पढ़ाई थी। जब मैंने पीएचडी की थी, तब हमारे लिए एक भाषा का कोर्स करना अनिवार्य था, तो मैंने फ्रेंच भाषा की पढ़ाई की थी। उस वक्त प्रोफेसर डी एन मिश्रा मेरे शिक्षक थे। मुझे किसी ने बताया कि प्रोफेसर डी एन मिश्रा के बेटे सुधीर मिश्रा अच्छी फिल्में बनाते हैं। मेरे थिएटर के एक मित्र आलोपी वर्मा एक दिन मेरे पास सुधीर मिश्रा की फिल्म में अभिनय करने का ऑफर लेकर आए, मगर बताया कि सुधीर मिश्रा इसके लिए मेहनताना नहीं देंगे। उन दिनों मेरे लिए फिल्म में अभिनय करना बड़ी बात थी, तो मैंने हामी भर दी। मैंने इस फिल्म में अभिनय किया। इसमें मनोहर सिंह व हबीब तनवीर साहब भी थे। मनोहर सिंह के बचपन का किरदार राज जुट्शी कर रहे थे और उनके पिता का किरदार मैंने किया था। यह मेरी पहली फिल्म थी, जिसकी शूटिंग लखनऊ में काजल होटल में हुई थी। पैसे नहीं मिले, मगर खुद को सिनेमा के परदे पर देखकर काफी अच्छा लगा था। फिर लखनऊ के ही एक बिल्डर जैन साहब ने एक फिल्म ‘खून बहा गंगा में’ का निर्माण किया। इसमें मैंने ठाकुर का किरदार निभाया। मूलतः तो मैं ठहरा थिएटर का कलाकार। पर फिल्म ‘खून बहा गंगा में’ के दौरान निर्देशक ने मुझे समझाया कि थिएटर और फिल्म के अभिनय में अंतर होता है। तो मैं धीरे-धीरे नई-नई तकनीक सीखता आ रहा हूँ।’’

थिएटर से सिनेमा तक: 62 वर्षों की कला यात्रा के लिए डॉ. अनिल रस्तोगी को पद्मश्री 2026 सम्मान

ANIL RASTOGI

ANIL RASTOGI

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इतनी शोहरत और अब ‘पद्मश्री’ जैसा बड़ा सम्मान मिलने के बाद भी, डॉ. रस्तोगी आज भी वही सरल और सहज ‘लखनवी’ इंसान हैं। लखनऊ की तहजीब उनकी बातों में झलकती है। उन्होंने कभी भी ग्लैमर की चकाचौंध के लिए अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। आज भी वह नए कलाकारों के लिए एक मार्गदर्शक और प्रेरणापुंज हैं। अनिल रस्तोगी जी को पद्मश्री मिलना केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह लखनऊ की उस ‘नफासत’ और ‘अदब’ को मिला सम्मान है जो अब धीरे-धीरे कम हो रही है। जब वह मंच पर संवाद बोलते हैं, तो उसमें अमीनाबाद की गलियों की सोंधी महक और गोमती के किनारों का ठहराव सुनाई देता है।

ANIL RASTOGI - IN PLAY- SWAHA

ANIL RASTOGI AND OTHER IN PLAY- SWAHA

एक दिलचस्प तथ्य यह है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं, कि डॉ. रस्तोगी ने अभिनय की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली थी। वो एक ‘सेल्फ-टॉट’ कलाकार हैं जिन्होंने मंच पर काम करते-करते ही अभिनय की बारीकियों को सीखा और आज वो खुद नए कलाकारों के लिए एक चलते-फिरते संस्थान बन चुके हैं।

डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी को ‘पद्मश्री’ मिलना हर उस कलाकार की जीत है जो अपनी कला के प्रति ईमानदार है। पद्मश्री डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी हमें सिखाते हैं कि अगर आपके भीतर कुछ कर गुज़रने की आग है, तो आपकी प्रयोगशाला और आपका मंच, दोनों ही दुनिया बदलने की ताकत रखते हैं।

ANIL RASTOGI AND OTHERS

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Anil Rastogi | Padma Shri 2026 | Indian Theatre Legend | Veteran Actor | hindi cinema | Indian Theatre 2025 | Padma Awards not present in content

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