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सत्तर, अस्सी और नब्बे का दशक… जब न मोबाइल थे, न सोशल मीडिया। खबरें मेहनत से जुटाई जाती थीं। शब्दों को तराशा जाता था तब दिल्ली से छपने वाली फिल्म पत्रिका मायापुरी, बॉलीवुड दुनिया की धड़कन मानी जाती थी। उन्हीं दिनों ए. पी. बजाज (आनंद प्रकाश बजाज) और उनके सुपुत्र प्रमोद कुमार बजाज (पी के बजाज) जी अक्सर दिल्ली से मुंबई आया करते थे। यह लंबी यात्राएँ, साथ में फाइलों से भरा बैग और मन में सिर्फ एक उद्देश्य – सिनेमा को करीब से समझना, उसे पाठकों तक सच्चाई और गरिमा के साथ पहुंचाना।
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धीरे धीरे बॉलीवुड की दुनिया में मायापुरी की धाक जम गई। जब ए पी बजाज जी उम्र के चलते ज्यादा ट्रैवल नहीं कर पाते तो पी के बजाज जी ने मुंबई आकर बॉलीवुड में अपनी पकड़ मजबूत करने की जिम्मेदारी उठा ली। (PK Bajaj)
नब्बे के दशक में जब भी प्रमोद जी मुंबई आते तो जैसे उनके साथ एक छोटा-सा कारवां बन जाता था । उनके प्रिय लेखक मित्र श्री पन्नालाल व्यास जी, जेड ए जौहर जी और कई बार मैं भी अपना कॉलेज बंक करके उनके साथ चलती थी। हम सब कार से सुबह-सुबह स्टूडियो की ओर निकल पड़ते थे । कभी महबूब स्टूडियो, कभी फिल्म सिटी, कभी नटराज स्टूडियो, कभी सेठ स्टूडियो, कभी फिल्मीस्तान स्टूडियो तो कभी फ़िल्माया, जुहू के कई बंगलों में भी खूब शूटिंग होते थे।
सेट पर पहुँचते ही फिल्म के निर्माता निर्देशक प्रमोद जी को अपने बीच देखकर फूले नहीं समाते थे , उन्हें और हम सबको आदर से बैठा कर हमारी खूब आवभगत की जाती थी, मायापुरी का वो जलवा था कि बड़े बड़े कलाकार अपनी कुर्सी खींचकर प्रमोद जी के करीब बैठने के होड़ में लग जाते थे।
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लाइटों की चकाचौंध, कैमरे की हलचल, और कलाकारों की तैयारियों के बीच प्रमोद जी का शांत चेहरा अलग ही नजर आता। वे शोर में भी ठहराव ढूंढ लेते थे।
फिल्म 'चांद का टुकड़ा' के सेट पर जब हमारा काफिला पहुंचा तो प्रमोद जी को देखते ही सावन कुमार टाक ने उन्हें गले से लगाकर कहा था, “बजाज जी, आपके बिना सेट सूना लगता है।” सावन कुमार टाक का मायापुरी से बेहद घनिष्ट रिश्ता था। कई बार प्रमोद जी उनके जुहू स्थित रेसीडेंस दक्षिणा मूर्ति अपार्टमेंट में निमंत्रित होते तो दोनों घंटों बैठकर फिल्मों की बात करते, गानों की बात करते, और कभी-कभी जीवन की भी। एक बार सावन कुमार टाक ने कहा था, “अगर बजाज जी ने फिल्म की तारीफ कर दी तो समझो आधी जीत वहीं हो गई।” प्रमोद जी उनकी फिल्म की कमियों पर भी खुलकर मायापुरी में छापते थे, लेकिन शब्दों में ऐसा संतुलन रखते कि सामने वाला आहत नहीं, प्रेरित होता। सावन कुमार टाक कहा करते थे कि “आप जैसे संपादक इंडस्ट्री को आईना दिखाते हैं, और आईना जरूरी होता है।” एक बार सेठ स्टूडियो में सावन जी के फिल्म की शूटिंग चल रही थी। लंच ब्रेक में सावन कुमार टाक खुद कुर्सी खींचकर उनके पास बैठे और बोले, “आप दिल्ली से सिर्फ खबर लेने नहीं आते, आप हमें याद दिलाने आते हैं कि हम क्या बना रहे हैं।” उस दिन घंटों कहानी, संगीत और दर्शकों की नब्ज पर बात हुई। प्रमोद जी ने अगले अंक में फिल्म के बारे में जो लिखा, उसमें सिर्फ तारीफ नहीं थी, दिशा भी थी। सावन कुमार टाक ने फोन कर कहा, “आपने मुझे फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया ।”
प्रमोद जी के साथ धर्मेंद्र जी का रिश्ता तो जैसे भाईचारे का था। जब भी मिलते, कंधे पर हाथ रखकर पंजाबी में कहते, “बजाज जी, आज किसकी खटिया खड़ी होगी, लेकिन सच कहूँ तो आप दिल के बड़े साफ हो।” एक बार जब दोनों महबूब स्टूडियो में बैठे थे तो ब्रेक आवर में उन्होंने प्रमोद जी से अपने गांव की यादें सुनाईं, और प्रमोद जी तल्लीन होकर सुनते रहे। बाद में उस बातचीत पर जो लेख छपा, उसे पढ़कर धर्मेंद्र की आंखें नम हो गईं। बोले, “आपने मेरे दिल की बात पकड़ ली।”
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सुप्रसिद्ध निर्माता निर्देशक डॉक्टर रामानंद सागर जी के साथ प्रमोद जी का रिश्ता तो आध्यात्मिक सा था। डॉ. रामानंद सागर जब अपने फ़िल्मों और टीवी पर इतिहास रच चुके धारावाहिक रामायण की सफलता के बाद बेहद व्यस्त हो गए, तब भी प्रमोद जी के एक फोन कॉल पर वे अपने ऑफिस में, उनके साथ घर से आए लंच की तैयारी करते हुए इंतजार करते थे। एक बार उन्होंने प्रमोद जी से बातचीत के दौरान भावुकता से कहा था , “आपके शब्दों में कितना ठहराव है, और ठहराव ही सबसे बड़ी शांति है।” दोनों के बीच अध्यात्म और सिनेमा पर लंबी चर्चाएँ होती थीं। प्रमोद जी उनकी रचनात्मकता का सम्मान करते थे, और वे उनकी स्पष्ट सोच का। एक बार जब उनके धारावाहिक की शूटिंग चल रही थी, प्रमोद जी सेट पर पहुंचे। रामानंद सागर ने दूर से हाथ जोड़कर स्वागत किया। बोले, “मायापुरी शब्दों के साधक हैं और वो साधक आप हैं ।” शाम को चाय के दौरान धर्म, संस्कृति और सिनेमा पर लंबी चर्चा हुई। रामानंद जी के पुत्र प्रेम जी भी साथ थे। प्रमोद जी ने जब उनके काम पर लेख छापा , तो उसमें भक्ति के साथ विश्लेषण भी था। रामानंद सागर ने मुस्कुराकर कहा था, “ऐसा हिन्दी पत्रिका में पहली बार हुआ ।” (PK Bajaj leadership in Mayapuri magazine)
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नटराज स्टूडियो में ही शक्ति सामंत जी का भी ऑफिस था। मुलाकात होने पर शक्ति सामंत प्रमोद जी से अक्सर कहते थे, “बजाज साहब, आप फिल्म को सिर्फ देखते हैं या पढ़ते हैं?” एक बार शूटिंग के दौरान हल्की बारिश हो गई। सब लोग भाग-दौड़ में थे, पर प्रमोद जी छत्री के नीचे खड़े दृश्य को ध्यान से देख रहे थे। बोले, “यह बारिश दृश्य को और भी सजीव बना देगी।” शक्ति सामंत हंस पड़े, “आप तो निर्देशक निकलेंगे।” दोनों की वह हंसी आज भी याद आती है।
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नटराज स्टूडियो के एक और हिस्सेदार निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती जी का स्वभाव बहुत गर्मजोशी भरा था। वे प्रमोद जी को देखते ही गले लगा लेते थे । कहते, “ प्रमोद टू प्रमोद स्वागतम। आप आए हैं तो फिल्म को सही नजर मिलेगी।” एक बार उन्होंने मजाक में कहा, “आपकी एडिटोरियल कलम से डर लगता है।” क्योंकि वे जानते थे कि प्रमोद जी ईमानदारी से लिखेंगे।
रमेश सिप्पी जी से उनकी मुलाकातें हमेशा गंभीर चर्चा में बदल जाती थीं। सिनेमा के बदलते दौर पर बात होती। एक बार रमेश सिप्पी ने कहा, “ पत्रकारिता अगर समझदारी से हो तो सिनेमा की दिशा सुधरती है, जैसे मायापुरी करती है ।” प्रमोद जी ने उस दिन सिर्फ मुस्कुरा कर कहा, “हम तो आईना दिखाते हैं, राह आप लोग बनाते हैं।” (Sawan Kumar Tak interaction with PK Bajaj)
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पहलाज निहलानी और राकेश रोशन भी उन्हें आदर से अपने शूटिंग सेट पर निमंत्रित करते थे। । राकेश रोशन ने एक बार कहा था, “आपकी मौजूदगी से हमें लगता है कि कोई सच्चा दर्शक हमारे बीच बैठा है।”
स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी से प्रमोद जी की मुलाकात सावन कुमार टाक ने कराई थी। एक बार नहीं कई बार, उनकी मुलाकात हमेशा बहुत संयमित और गरिमामयी होती थी। लता मंगेशकर जी प्रमोद जी की गंभीरता और ईमानदारी को बहुत महत्व देती थीं। पन्नालाल व्यास जी और प्रमोद जी के साथ एक पुराने इंटरव्यू के दौरान जब उनसे प्रमोद जी ने पुछा था कि वे विवादों से दूर कैसे रहती हैं, तो लता जी ने मुस्कुराकर कहा था, “क्योंकि आप की तरह कुछ सम्पादक हमारे बारे में सच छापते हैं।” वे जानती थीं कि प्रमोद जी कभी भी सनसनी के लिए शब्दों का दुरुपयोग नहीं करेंगे। एक बार उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा था, “आपकी कलम में शालीनता है, उसे बनाए रखिए।” प्रमोद जी ने सिर झुकाकर उनसे आशीर्वाद लिया था । बाद में उन्होंने लता जी के संघर्ष और अनुशासन पर एक लंबा लेख भी छापा था । लता जी ने उसे पढ़कर कहा था , “बजाज जी ने मेरे जीवन के उस हिस्से को भी समझा, जिसे मैं शब्दों में नहीं कह पाती।”
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आशा भोंसले जी के साथ तो बातचीत में चंचलता भी होती थी। आशा भोंसले जी को प्रमोद जी की सादगी बहुत भाती थी। एक कार्यक्रम के बाद जब सब लोग औपचारिक बातें कर रहे थे, तब प्रमोद जी ने आशा जी के साथ बिना किसी औपचारिकता के बातचीत शुरू कर दी तो वे बोलीं, “आपसे बात करके लगता है जैसे घर में बैठी हूँ।” एक बार उन्होंने हंसते हुए कहा था, " आपकी ट्रेनिंग से सुलेना मेरे गानों पर जितनी बारीकी से लिखती हैं, उतनी बारीकी से तो मैं भी नहीं सोचती।” एक बार उन्होंने महबूब स्टूडियो के रिकॉर्डिंग थिएटर में बातचीत के दौरान हंसते हुए कहा था , “बजाज जी, आप इंटरव्यू लेने नहीं, दिल जीतने आते हैं।” वे उनकी सादगी से बेहद प्रभावित थीं। जब भी प्रमोद जी मुंबई आते, आशा जी पूछतीं, “इतनी जल्दी वापस दिल्ली लौटेंगे? थोड़ा और रुक जाइए।” (Mayapuri editor mentorship in Hindi film journalism)
मनोज कुमार को प्रमोद जी की देशभक्ति से भरी विशेषांक बहुत पसंद थी। एक बार उन्होंने कहा था, “ छब्बीस जनवरी और पंद्रह अगस्त को जो देशभक्ति वाले लेख आप छापते हैं तो महसूस होता है कि आपकी कलम में भी वही भावना है जो मेरी फिल्मों में है।” जब एक बार मनोज कुमार जी कि एक फिल्म को लेकर आलोचना हुई, तब उस बारे में प्रमोद जी ने मायापुरी में एक बहुत संतुलित लेख छापा। मनोज कुमार ने उनसे कहा, “आपने आलोचना भी की, लेकिन सम्मान के साथ। यही असली पत्रकारिता है।”
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राजेश खन्ना के जीवन में उतार-चढ़ाव बहुत आए। जब लोग उनसे दूरी बनाने लगे, तब प्रमोद जी ने उनके संघर्ष और संवेदनशीलता पर एक विस्तृत लेख छापा था । उसके कुछ महीने बाद जब सावन कुमार के ऑफिस में प्रमोद कुमार जी की मुलाकात राजेश खन्ना से हुई तो उन्होंने प्रमोद जी का हाथ पकड़ कर कहा था , “आपने मुझे गिरते हुए नहीं, संभलते हुए दिखाया।” यह उनके लिए भावनात्मक सहारा था।
वाकई राजेश खन्ना के जीवन के उतार-चढ़ाव के दिनों में प्रमोद जी ने उनका साथ शब्दों से दिया। एक शाम, 'नागी विला' जुहू में एक शूटिंग के दौरान प्रमोद जी की मुलाकात राजेश खन्ना से हो गई । राजेश जी थोड़े चुप थे। प्रमोद जी ने उनसे कहा, “सुपरस्टार होना अलग बात है, इंसान होना अलग।” अगले अंक में जो लेख छपा, उसने राजेश खन्ना की संवेदनशीलता को सामने रखा। तब राजेश खन्ना ने मुझसे कहा था , “ बजाज जी से कहना उन्होंने मुझे फिर से याद दिलाया कि मैं सिर्फ एक सितारा नहीं, एक कलाकार हूँ।”/mayapuri/media/post_attachments/sites/visualstory/wp/2023/07/reehes-567955.jpg?size=*:900)
मिथुन चक्रवर्ती ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए एक बार कहा था, “जब मैं नया था, तब मायापुरी ने मुझे भी उतनी ही जगह दी जितनी बड़े सितारों को देती थी, बजाज जी जैसे इंसान बॉलीवुड पत्रिका जगत में बहुत कम है ।” मिथुन दा कहते थे कि प्रमोद जी कलाकार की मेहनत देखते हैं , सिर्फ उसकी चमक दमक नहीं।
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अभिनेत्री नूतन जी बहुत संकोची स्वभाव की थीं। लेकिन प्रमोद जी से बात करते हुए खुल जाती थीं। एक बार नूतन जी बेहद भावुक थीं। बातचीत में उन्होंने अपने निजी संघर्ष साझा किए। प्रमोद जी ने उन्हें पूरा समय दिया, पन्नालाल अंकल और मैं भी उनके साथ थे । नूतन जी ने अपनी निजी पीड़ा साझा की थी , जब लेख छपा, नूतन जी ने पन्नालाल जी से कहा, “एडिटर साहब ने मेरी आत्मा को चोट नहीं पहुंचाई, उन्होंने मेरी भावनाओं को सुरक्षित रखा। मायापुरी के सवालों में जिज्ञासा के साथ संवेदना भी होती है।” (Hindi film magazine reporting in 70s 80s 90s)
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राज कुमार अपनी विशिष्ट शैली के लिए प्रसिद्ध थे। फिल्म 'जवाब' के सेट पर एक मुलाकात के दौरान प्रमोद जी के साथ राज कुमार बड़े ख़ुलूस के साथ मिले थे। दरअसल वे बड़े बजाज दादू यानी ए पी बजाज जी को खूब पसंद करते थे, उस दिन उन्होंने मुस्कुराकर प्रमोद जी से कहा था , “ आप बजाज साहब के बेटे हो? जानी, आपके एडिटिंग में भी दम है।” यह उनका अनोखा अंदाज था तारीफ करने का। प्रमोद जी ने हमेशा उन्हें उसी शाही अंदाज में प्रस्तुत किया, जिससे उनका व्यक्तित्व और निखर कर सामने आया।
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अभिनेत्री श्रीदेवी बहुत कम बोलती थीं। लेकिन प्रमोद जी से बातचीत के लिए वे सावन कुमार टाक के कहने पर राजी हो गई थी। शुरू शुरू में वे सहज नहीं हो पा रही थी। प्रमोद जी ने हल्के स्वर में पूछा था , “आप इतने किरदारों में खुद को कहाँ ढूंढती हैं?” इस प्रश्न पर वे कन्फ्यूज्ड हो गई थी। फिर जब प्रमोद जी ने बेहद कैजुअल तरीके से उनसे बात की तो बातचीत खत्म होने पर प्रमोद जी ने उन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण दिया और तब श्रीदेवी रिलैक्स्ड हो कर खिलखिला कर बोली थी ,“आप बात ऐसे करते हैं जैसे कोई अपना पूछ रहा हो।” श्रीदेवी के करियर के एक कठिन दौर में प्रमोद जी ने उन्हें लेकर तब एक बेहद सकारात्मक लेख प्रकाशित किया था जब तमाम पत्र पत्रिकाओं में उनके बारे में बेहद संसानाती विवादस्पद बातें छ्प रही थी। जिसे पढ़कर श्रीदेवी ने धन्यवाद संदेश भेजा था
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कपूर परिवार के द्वितीय पीढ़ी के साथ बजाज परिवार का खूब अपनापन रहा है। ऋषि कपूर की शादी पर पूरे बजाज परिवार को विशेष निमंत्रण मिला था। ऋषि कपूर अपनी साफगोई के लिए जाने जाते थे। ऋषि कपूर प्रमोद जी को बेहद पसंद करते थे। जब भी मिलते, कहते “ पत्रकारिता के बनावटी दुनिया में कम से कम आप बनावटी नहीं हैं।” एक बार ऋषि जी को लेकर उठे एक विवाद पर प्रमोद जी ने संतुलित लेख छापा था । ऋषि जी ने इसपर कहा था , “आपने बिना पक्षपात के लिखा, यही बड़ी बात है।”
ऋषि कपूर जी अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे। एक बार मजाक में बोले, “आपकी कलम से बचना मुश्किल है।” फिर गंभीर होकर बोले थे , “लेकिन आप न्याय करते हैं।”
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राज कपूर जी को लेकर एक पुरानी याद, प्रमोद जी अक्सर हम सबको सुनाया करते थे। प्रमोद जी ने बताया था, "आर.के. स्टूडियो में राज जी से पहली मुलाकात हुई थी। प्रमोद जी ने उन्हें मायापुरी का ताजा अंक भेंट की तो राज कपूर ने मायापुरी हाथ में लेकर बड़े चाव देखना शुरू किया फिर कुछ देर बाद बोले, “सिनेमा पर लिखना आसान नहीं, पर आप जिम्मेदारी से लिखते हैं।” वह वाक्य प्रमोद जी के लिए जैसे पुरस्कार बन गया था।
स्वर्गीय गुलशन कुमार के साथ उनका रिश्ता विश्वास का था। जब संगीत जगत में नए प्रयोग हो रहे थे, प्रमोद जी ने खुलकर उनका समर्थन किया। एक बार गुलशन कुमार ने कहा, “आपकी कलम से मिला विश्वास मेरे लिए किसी अवॉर्ड से कम नहीं।”
गुलशन कुमार से उनकी मुलाकातें हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से भरी होती थीं। संगीत के नए दौर पर चर्चा होती। गुलशन कुमार ने एक बार कहा, “आप जैसे लोग साथ हों तो नए प्रयोग करने का हौसला मिलता है।”
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शाहरुख खान ने खुद एक कार्यक्रम में कहा था कि बचपन में वे मायापुरी और उसकी बाल पत्रिका लोटपोट पढ़ा करते थे। बोले, “दिल्ली में बड़ा होते हुए मैंने फिल्मों को सबसे पहले मायापुरी के जरिए जाना। फिल्मों के सपने वहीं से शुरू हुए। और लोटपोट पढ़ने के लिए तो मैं अपना पॉकेट मनी जमा किया करता था और साइकल पर दूर दूर तक लोटपोट खरीदने जाता था ” जब वे सुपरस्टार बने और प्रमोद जी से मिले, तो मुस्कुराकर कहा, “मैं आपको पहले से जानता हूँ, आपकी पत्रिका से।” वह पल प्रमोद जी के लिए बेहद भावुक था।
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अमिताभ बच्चनने एक बार मायापुरी के वरिष्ठ पत्रकार ज़ेड ए जौहर से कहा था, “पत्रकारिता में संयम और गरिमा बहुत दुर्लभ है और मायापुरी उसमें सफल रही, पी के बजाज जी को बधाई ।” एक कठिन दौर में जब मीडिया आलोचनात्मक था, प्रमोद जी ने अमिताभ जी को लेकर संतुलित आर्टिकल लिखकर अपना दृष्टिकोण साफ किया था जिसे बिग बी ने भी सराहा था।
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सलमान खान इंटरव्यू देने के मामले में बेहद चूज़ी रहे हैं, उनका मानना है कि अगर इंटरव्यू को तोड़ मरोड़ कर ही छापना है तो रूबरू बातचीत का क्या मतलब? वे एक ज़माने में शूटिंग के दौरान पत्रकारों को सेट से दूर ही रखते थे, लेकिन बात जब मायापुरी की आती है तो सलमान ने मायापुरी के पत्रकारों को हमेशा प्यार और सम्मान दिया। महबूब स्टूडियो के बाग में खड़े खड़े भी इंटरव्यू दिया था, उन्हें पता है कि पापा सलीम खान, बड़े बजाज सहाब यानी ए पी बजाज दादू के मित्र रहे हैं। प्रमोद जी के लिए भी उनका पूरा सम्मान रहा है।
आमिर खान का प्यार भी मायापुरी और उसके सम्पादक प्रमोद कुमार बजाज के लिए दिल खोलकर था। जब भी उनके सेट पर प्रमोद जी पहुंचते, जेंटलमैन आमिर तुरंत उन्हें कंफर्टेबल जगह में बिठाते और चाय या जूस मंगवाते थे। उन्हें लंच कराए बिना नहीं छोड़ते थे। फिल्म 'गजनी' में मायापुरी पत्रिका को फिल्म की कहानी में शामिल करना ये दिखाता है कि आमिर को मायापुरी परिवार से कितना लगाव है।
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इन सबके बीच प्रमोद कुमार बजाज जी हमेशा वैसे ही रहे। वे एक सेतु थे। कलाकार और दर्शक के बीच। निर्माता और पाठक के बीच। सिनेमा और समाज के बीच। न कोई घमंड, न कोई दिखावा। वे कहते, “हमारा काम है सिनेमा को समझना और उसे ईमानदारी से लिखना।”
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आज प्रमोद सर हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन वे हमारे लिए एक लिगेसी बना कर गए हैं।
वे मायापुरी के संस्थापक, सम्पादक ही नहीं, बल्कि वे एक युग थे। एक ऐसा युग जिसमें शब्दों की गरिमा थी, रिश्तों की सच्चाई थी और सिनेमा के प्रति प्रेम था।
और शायद यही किसी भी इंसान की सबसे बड़ी विरासत होती है।
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