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वक्त बीतता जाता है, दुख और सुख, किसी के लिए नहीं ठहरता परंतु, हमारे अपने, जो हम सबको छोड़ कर महाप्रयाण के लिए आगे कूच कर जाते हैं उनकी प्रेरणा, उनकी दी हुई सीखें, उनकी छत्रछाया, हमेशा एक अटल पर्वत की तरह हमें हर मुश्किल में सर उठा कर, आसमान की बुलंदी को छूते रहने की प्रेरणा देते रहते हैं। (Pramod Kumar Bajaj Mayapuri editor tribute)
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मायापुरी पत्रिका के संस्थापक, मालिक, संपादक और सर्वे सर्वा श्री पी के बजाज सर के आकस्मिक निधन से दुनिया स्तब्ध है, उनके मार्गदर्शन पर चलने वाले हम सब, किंगकर्तव्यविमूढ़ हैं , परंतु स्मरण रहे, जिन्हे हम सबने खोया है, वे स्वयं ही वो हस्ती रहे हैं जो कभी रुकना नहीं जानते थे, बड़े बड़े दुखों के आगे कभी झुकना नहीं जानते थे। वे हमेशा से, हर परिस्थिति में चलते रहना जानते थे।
प्रमोद कुमार बजाज सर के इस कर्तव्यबोध की इंतिहा इसी बात से समझी जा सकती है कि पिछले दिनों जब वे अस्वस्थता के कारण अस्पताल में भर्ती हुए थे, तब भी वे हम सबको काम छोड़कर अस्पताल में उनके हाल चाल पूछने के लिए आने से मना करते रहे थे । और फिर जब अस्पताल से डिस्चार्ज होकर वे घर लौटे तो उन्हे एक ही फिक्र रहती थी, कि मायापुरी पब्लिकेशन का कोई काम किसी परिस्थिति में ढीला ना पड़े। (Pramod Kumar Bajaj contribution to Bollywood journalism)
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बेड रेस्ट करते हुए भी वे हम लेखकों को फ़ोन करके निर्देश दिए जा रहे थे कि कोई काम ना रुकने पाए। उन्नीस फरवरी को उन्होने मुझे फोन किया था। यानी निधन के सात दिन पहले, जिस तरह हमेशा आने वाले अंकों के बारे में हमें सलाह देते रहें हैं, उसी सख्त टोन में उन्होने कहा था कि भले ही वे अभी बेड रेस्ट कर रहें हैं और ऑफिस नहीं आ पा रहे हैं लेकिन हमें बदस्तूर काम करते रहना है, कोई ढीलापन नहीं चलेगा। और फिर उन्होने जो कहा, वो सिर्फ एक कर्म योगी ही कह सकते हैं। उन्होने कहा था , " मेरी तबीयत ठीक नहीं है यह सच है, परिस्थिति कुछ भी हो सकता है लेकिन मायापुरी पब्लिकेशन का काम एक भी दिन के लिए नहीं रुकना चाहिए, द शो मस्ट गो ऑन।" प्रमोद सर ने आगे कहा था कि उन्होंने अपने सुपुत्र श्री अमन बजाज जी को भी यही कहा है कि चाहे कारण कोई भी हो, उनकी अस्वस्थता हो या मृत्यु, लेकिन काम और कर्मठता को एक दिन के लिए भी ना रोका जाय। यही उनकी इच्छा है।"
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इस बातचीत के सात दिन पश्चात प्रमोद जी इस दुनिया से चले गए और जैसा उन्होंने चाहा था ठीक वैसा ही किया गया। भला उनके जैसे कर्मनिष्ठ युग पुरुष के निर्देश को कौन अमान्य कर सकता था? उस पुण्यात्मा के अन्त्येष्टि के दिन भी मायापुरी पब्लिकेशन ऑफिस खुली रही, बदस्तूर काम चलता रहा, सारे स्टाफ बिल्कुल उसी तरह अपने अपने काम में व्यस्त रहे जैसे हमेशा रहते थे, होली अंक की तैयारी जो महीने भर से चल रही थी उसे सम्पूर्ण किया जा रहा था, कोई ढील नहीं, कोई ब्रेक नहीं, हाँ, एक खामोशी जरूर छाई हुई थी मगर जैसा बजाज सर ने कहा था, द शो मस्ट गो ऑन, तो हाँ,कारवाँ यूँ ही चलता रहा, कारवाँ यूँ ही चलता रहेगा। " (tribute to Mayapuri editor Pramod Kumar Bajaj)
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प्रमोद जी से अंतिम बार उस दिन की बातचीत और उनके निर्देश ने मुझे बहुत सालों पहले, बिल्कुल इन्हीं परिस्थितियों में प्रमोद कुमार बजाज सर के पिताश्री, स्वर्गीय ए. पी. बजाज जी (आनंद प्रकाश बजाज जिन्हे मैं दादू पुकारा करती थी) की कही बात याद करा दी। एक दिन सुबह छह बजे, ए पी बजाज दादू का फोन आ गया। वे मुंबई आए हुए थे, उन्होने पूछा "दीदी नाश्ता हो गया?" मैंने हैरानी से जवाब दिया, "दादू, अभी छह भी नहीं बजे, मैं तो सो रही थी, नाश्ता तो नौ बजे करूंगी।" दादू ने हंसते हुए कहा था , "जल्दी उठने की आदत डालो। सोना तो एक दिन है ही, लेकिन कर्म करने का वक्त यही है। मैं अपने बच्चों को, और नाती पोतों को भी यही कहता रहता हूँ कि जब तक सांस है तब तक कर्म करते चलो और साँस जब उखड़ने लगे तो अपने बच्चों को भी यह गुरु मंत्र दे कर जाना कि परिस्थिति चाहे कुछ भी हो, एक दिन के लिए भी कर्म करना बंद नहीं होना चाहिए, चाहे घर में किसी अपने का निधन ही क्यों ना हो जाय।"
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प्रमोद सर जी ने भी अपने पिता ए. पी. बजाज दादू की जीवन कहानी सुनाते हुए एक दिन बताया था कि निधन से कुछ दिनों पहले उनके बाबुजी ने सबको अपने पास बुलाकर इशारों से बताया था कि शायद अब उनके पास ज्यादा दिन नहीं बचे हैं, कभी भी, किसी दिन भी कुछ हो सकता है, लेकिन इस वज़ह से मायापुरी प्रकाशन का काम एक दिन के लिए भी नहीं रुकना चाहिए। जिस पत्रिका को उन्होंने अपने और अपने परिवार के खून पसीने से सींचा था, दुनिया के जिस बुलंद मुकाम पर मायापुरी और बाल पत्रिका लोटपोट को पहुंचाने के लिए उन्होंने और उनके बेटे प्रमोद कुमार बजाज तथा पोते श्री अमन कुमार बजाज ने दिन रात एक कर दिए थे, और जिस पत्रिकाओं ने हिंदी सिनेमा जगत की दुनिया में अपनी उपस्थिति तथा कामयाबी का डंका बजाया था, उन पत्रिकाओं का शो पूरे आन बान और शान से चलते रहना चाहिए। और सचमुच जिस दिन ए पी बजाज दादू का निधन हुआ, ठीक वैसा ही किया गया जैसा वे चाहते थे। (inspiring journey of Pramod Kumar Bajaj Mayapuri editor)
आज जब प्रमोद बजाज सर नहीं रहे तो वही इतिहास फिर से दोहराया गया। द शो मस्ट गो ऑन।
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