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मायापुरी एंटरटेनमेंट वर्ल्ड की धड़कन रहे दिग्गज हस्ती स्वर्गीय श्री पी. के. बजाज जी के आकस्मिक निधन से जितने बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ स्तंभित है उतने ही कई विदेशी कलाकार भी स्तब्ध हैं। उन्हीं में से एक हैं विश्व प्रसिद्ध ऑपेरा क्वीन और BollywoOpera की इन्वेंटर जियोकोंडा वेसिचेली, जो एक विदेशी होने के बावजूद बॉलीवुड एंटरटेनमेंट की दुनिया से जुड़ी हुई है और मायापुरी पत्रिका के प्रभाव से प्रभावित है। प्रमोद जी से अक्सर उनकी बात हुआ करती थी और जियोकोंडा उन्हें भारत की टॉप मोस्ट हिन्दी वीकली मायापुरी के जहीन सम्पादक के रूप में श्रद्धा करती थी।
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पिछले दिनों जब मैंने उन्हें मायापुरी के सम्पादक पी के बजाज (प्रमोद कुमार बजाज) जी के आकस्मिक निधन हो जाने की खबर दी तो कुछ पलों तक वे स्तब्ध और खामोश रही। फिर अपने को सम्भालते हुए वे बोली, "जब मैं भारतीय सिनेमा और यहाँ की पत्रकारिता के बारे में सोचती हूँ तो मेरे मन में 'मायापुरी' और स्वर्गीय श्री पी. के. बजाज जी का नाम सबसे पहले आता है। एक कलाकार के तौर पर मैंने हमेशा उन लोगों की कद्र की है जो कला की इज्जत करना जानते हैं और बजाज जी सच में एक ऐसे ही इंसान थे। वे मेरे लिए सिर्फ एक संपादक नहीं थे बल्कि वे सिनेमा की उस विरासत के रक्षक थे जिसे उन्होंने दशकों तक अपने हाथों से सींचा था।
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मैं हमेशा दिल से यह मानती हूँ कि 'श्री पी. के. बजाज' एक ऐसे विजनरी इंसान थे जिन्होंने यह गहराई से समझा कि फिल्म पत्रकारिता का मतलब सिर्फ ग्लैमर या चमक-धमक नहीं होता। यह तो हमारी संस्कृति और कला के प्रति एक गहरा समर्पण है।" प्रमोद कुमार बजाज जी के नेतृत्व में 'मायापुरी' सिर्फ एक मैगजीन बनकर नहीं रही बल्कि वह एक ऐसा भरोसा बन गया जिसे लाखों पाठकों ने अपने परिवार का हिस्सा माना। यह उन करोड़ों पाठकों के लिए एक सच्चे साथी की तरह रही जो सिनेमा को अपनी रूह में बसाते हैं।
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मेरे मन में उनके लिए बहुत गहरा आदर है क्योंकि उन्होंने हमेशा कलाकारों के असली हुनर को मान दिया और बहुत ही ईमानदारी से नई सोच को बढ़ावा दिया। उनकी संपादकीय नजर ने न केवल बड़े सितारों को चमकने का मौका दिया बल्कि उन छोटी कहानियों को भी दुनिया के सामने रखा जो संघर्ष और मेहनत की कहानी थीं। मैं खुद पश्चिमी ओपेरा और भारतीय संगीत को जोड़कर 'BollywoOpera' के जरिए अपनी एक अलग राह बना रही हूँ और मैं जानती हूँ कि बजाज जी जैसे पारखी लोगों की कितनी जरूरत है जो परंपरा का सम्मान करते हुए नए प्रयोगों को पहचान देते हैं।
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मैं जानती हूं कि बजाज जी के मार्गदर्शन में 'मायापुरी' ने बॉलीवुड के उस सुनहरे दौर की हर याद को पन्नों पर उतारा और बदलते हुए वक्त को भी बहुत ही शालीनता से गले लगाया। पत्रकारिता की दुनिया में उनका योगदान इतना बड़ा है कि उसे शब्दों में बाँधना नामुमकिन है। उन्होंने लेखकों और फोटोग्राफरों की कई पीढ़ियों को तैयार किया और उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया। वे जानते थे कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं है बल्कि यह हमारी भावनाएं और हमारी यादें हैं। ऐसा बड़ा नजरिया सिर्फ उसी का हो सकता है जो पूरी तरह कला की भक्ति में डूबा हो।
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आज जब मैं उन्हें याद करती हूँ तो मुझे लगता है कि हमने सिर्फ एक संपादक को नहीं खोया है बल्कि हमने सिनेमा के इतिहास के एक सच्चे पहरेदार को खो दिया है। उनके काम और उनकी मेहनत लगन ने इंडस्ट्री पर एक ऐसी छाप छोड़ी है जिसे वक्त कभी धुंधला नहीं कर सकेगा। उनकी विरासत आज भी हम जैसे कलाकारों को रास्ता दिखाती है जो कला को सहेजने में यकीन रखते हैं।
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मैं पूरे कलाकार समाज की तरफ से और अपने दिल की गहराई से उनके विजन और उनकी उम्र भर की सेवा के लिए शुक्रिया अदा करती हूँ। मेरा मानना है कि "बजाज जी की विरासत आने वाली हर पीढ़ी का रास्ता हमेशा रौशन करती रहेगी और हमें कुछ अच्छा करने की प्रेरणा देती रहेगी।" उनका जाना वाकई एक युग का अंत है लेकिन उनके विचार हमेशा हमारे साथ रहेंगे।
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सच तो यही है कि बजाज जी ने सिनेमा को कभी सिर्फ एक खबर की तरह नहीं देखा बल्कि उन्होंने उसे एक इतिहास की तरह संभालकर रखा। इसी वजह से आज भी जब मैं 'मायापुरी' का नाम सुनती हूँ तो मेरे मन में उनके प्रति एक अलग ही श्रद्धा जाग जाती है। मैं उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करती हूँ और यह कहना चाहती हूँ कि एक संपादक और कलाकार का रिश्ता कितना गहरा हो सकता है यह उन्होंने दुनिया को दिखाया।
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