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आज सिनेमा के पर्दे पर एक ऐसी फिल्म ने दस्तक दी है जो सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारे समाज के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा है। फिल्म का नाम है 'अस्सी' (Assi)। यह नाम सुनते ही शायद आपके मन में अस्सी को लेकर प्रश्न उठे तो बता दूँ इसका सीधा संबंध एक ऐसी कड़वी सच्चाई से है जिसे हम हर दिन अखबारों में पढ़ते हैं और अगले ही पल भूल जाते हैं।
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80 के आंकड़े पर समाज का सन्नाटा इस फिल्म के प्रश्नों का एक हिस्सा नजर आता है।
फिल्म का टाइटल 'अस्सी' दरअसल भारत में हर दिन रिपोर्ट होने वाले औसतन 80 रेप केसों की संख्या को दर्शाता है। निर्देशक अनुभव सिन्हा, जो इससे पहले 'मुल्क', 'आर्टिकल 15', 'भीड़' और 'थप्पड़' जैसी सेंसिटिव फिल्में दे चुके हैं, इस बार फिर एक ऐसा विषय लेकर आए हैं जो हमारे समाज का आइना है। फिल्म की कहानी 'परिमा' (कानी कुसरुति) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक रात घर लौटते समय दरिंदगी का शिकार होती है। इसके बाद शुरू होती है इंसाफ की वह जंग, जिसमें वकील 'रावी' (तापसी पन्नू) सिस्टम के सड़े हुए पुर्जों से लोहा लेती है।
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अनुभव सिन्हा ने इस फिल्म को लेकर एक बहुत ही गहरी बात कही है। उन्होंने बताया "जब हम फिल्म लिख रहे थे, तो मैंने महसूस किया कि हमारे देश में हर 18 से 20 मिनट में एक महिला का शोषण होता है। यह आंकड़ा डराने वाला है, लेकिन उससे भी ज्यादा डरावनी है हमारी खामोशी।" निर्देशक ने यह भी स्वीकार किया कि एक पुरुष होकर एक महिला के दर्द को लिखना उनके लिए सबसे कठिन काम था। उन्होंने कहा "मुझे और लेखक गौरव सोलंकी को हर सीन लिखते वक्त एक महिला की तरह सोचना पड़ा। हमें यह समझना था कि उस ट्रॉमा के बाद एक औरत का दुनिया को देखने का नजरिया कैसे बदल जाता है।"
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इस फिल्म में नारी सशक्तिकरण का एक नया नजरिया देखने को मिला।
जब हम नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो अक्सर फिल्मों में हीरोइन द्वारा गुंडों को पीटते हुए दिखाया जाता है। लेकिन 'अस्सी' इस मायने में अलग है। यहाँ सशक्तिकरण उस हिम्मत में है जो परिमा दिखाती है—इतने बड़े दिल दहलाने वाले हादसे के बाद भी अदालत में खड़े होकर अपनी बात कहना, यह है सही मायने में नारी सशक्तिकरण । और साथ ही नारी सशक्तिकरण उस मजबूत सोच और मजबूत शक्ति की धनी रावी (तापसी पन्नू) में भी है, जो कानून की बारीकियों का इस्तेमाल करके अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुँचाने की कोशिश करती है।
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फिल्म में तापसी पन्नू का एक डायलॉग है जो बहुत चर्चा में है। वह कहती हैं "हम उस प्रजाति के लोग बनने की कगार पर हैं जो विलुप्त होने वाली है, मेरा मतलब ऐसी फिल्मों से है जो सच कहने की हिम्मत रखती हैं।" तापसी ने साफ किया कि 'अस्सी' कोई परंपरागत कमर्शियल फिल्म नहीं है। यह एक 'अर्जेंट वॉच' है, जिसे आज के दौर में देखा जाना बहुत जरूरी है।
एक और डायलॉग," मैम इस अपराध वाले दिन देश भर में अस्सी रेप कंप्लेंट हुई थी, जिनमें से 76 का ट्रायल तक शुरू नहीं हुआ " यह हमारे ढीले कानून व्यवस्था पर प्रहार है, और साथ ही एक शिक्षिका के गैंग रेप होने की खबर पर उसके ही एक छात्र का WhatsApp ग्रुप मे मस्ती से लिखना, "मुझे इनवाईट क्यों नहीं किया गया" हमारे समाज के संवेदनहीनता और नैतिक मूल्यों के पतन का आईना है।
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ताज़ा खबरें और स्टार्स का अनुभव इस फिल्म के मेकिंग को रेखांकित करती है।
फिल्म को लेकर एक दिलचस्प और ताज़ा खबर यह भी है कि इसके प्रमोशन के लिए कोई बड़े स्टार्स के पोस्टर नहीं लगाए गए। शुरुआत में सिर्फ एक नंबर '80' और 'अस्सी' नाम का इस्तेमाल हुआ। मेकर्स चाहते थे कि फिल्म की स्टार पावर से ज्यादा उसकी कहानी और उसके पीछे का मकसद लोगों तक पहुँचे।
फिल्म में कनी कुसरुति ने परिमा का रोल निभाया है और उनकी परफॉरमेंस रोंगटे खड़े कर देने वाली है। उनके साथ मोहम्मद जीशान अय्यूब ने उनके पति का किरदार निभाया है, जो समाज के दबाव और अपनी पत्नी के सम्मान के बीच फंसा हुआ है। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, सुप्रिया पाठक और मनोज पाहवा जैसे दिग्गज कलाकारों के होने से कहानी में जो वजन आया है, वो इसे एक मास्टरपीस की श्रेणी में ले जाता है।
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क्यों देखनी चाहिए आपको यह फिल्म?
आज के दौर में जहाँ हर तरफ बोल बचन का शोर है, हर फिल्म में मनोरंजन और एक्शन पर जोर दिया गया है वहां 'अस्सी' जैसी फिल्में हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। यह फिल्म हमें बताती है कि समस्या सिर्फ पुलिस या न्याय व्यवस्था में नहीं है, बल्कि समस्या हमारी सोच में है। अनुभव सिन्हा कहते हैं "हम अपनी बेटियों को 13 साल की उम्र में ही बता देते हैं कि बाहर खतरा है और उन्हें कैसे बचना है, लेकिन हम अपने बेटों को यह नहीं सिखाते कि किसी के शरीर पर अधिकार जताना गलत है। हम उन्हें जेंडर इक्वालिटी नहीं सिखाते।"
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'अस्सी' को सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा कहना गलत होगा। यह एक ऐसी फिल्म है जो पितृसत्ता (Patriarchy) की जड़ों पर प्रहार करती है। यह सवाल करती है कि आखिर अपराधी कुकर्म करने के बाद भी उतनी ही हिम्मत से समाज में कैसे घूम लेते हैं? क्यों एक पीड़ित महिला को ही 'इज्जत' का हवाला देकर चुप कराया जाता है?
जो दर्शक ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो उनके दिल और दिमाग, दोनों को झकझोर दें, तो 'अस्सी' उनके लिए ही है। इस फिल्म का हिस्सा बनना सिर्फ एक दर्शक के तौर पर नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक के तौर पर जरूरी है।
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वो मंजर जिसे शूट करते वक्त पूरी यूनिट रो पड़ी थी:
फिल्म 'अस्सी' को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उस एक सीन की हो रही है जिसे अनुभव सिन्हा ने फिल्म की 'आत्मा' कहा है। यह सीन है अस्पताल का, जहाँ हादसे के ठीक बाद परिमा (कानी कुसरुति) का मेडिकल चेकअप होना है। अनुभव सिन्हा ने एक इंटरव्यू में बताया कि इस सीन को लिखना उनके जीवन का सबसे मुश्किल काम था। उन्होंने कहा "एक पुरुष के तौर पर आप कभी उस शारीरिक और मानसिक वेदना को महसूस नहीं कर सकते जिससे एक महिला गुजरती है।" बताया जाता है कि उन्होंने तय किया था कि कैमरे को परिमा के चेहरे पर रखेंगे, ताकि दर्शक उसकी आँखों में वो खौफ और शून्य देख सकें।"
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ख़बरों के अनुसर इस सीन की शूटिंग के दौरान सेट पर सन्नाटा पसरा हुआ था। उस दिन सेट पर कोई भी आपस में ज्यादा बात नहीं कर रहा था। ख़बरों के अनुसार अनुभव सिन्हा ने अभिनेत्री कनी से बस इतना कहा कि कुछ भी एक्ट नहीं करना है, बस उस सन्नाटे को महसूस करना है। जब शॉट खत्म हुआ, तो क्रू की कई महिला सदस्य और यहाँ तक कि खुद अनुभव सिन्हा भी इमोशनल हो गए थे ।" यह सीन फिल्म में यह सवाल उठाता है कि इंसाफ की प्रक्रिया खुद कितनी दर्दनाक हो सकती है, जहाँ एक महिला को बार-बार अपने जख्मों को कुरेदना पड़ता है।
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सिस्टम की सड़ांध और कड़वा सच को उजागर करती है यह फिल्म।
फिल्म में एक और दमदार एंगल वो है जो असल खबरों से प्रेरित है। अनुभव सिन्हा ने अपनी रिसर्च के दौरान पाया कि कई मामलों में सबूतों के साथ इसलिए छेड़छाड़ हो जाती है क्योंकि फोरेंसिक रिपोर्ट आने में महीनों लग जाते हैं। फिल्म में इसी 'सिस्टम की सुस्ती' को विलेन के तौर पर दिखाया गया है। मनोज पाहवा ने इसमें एक ऐसे व्यक्ति का रोल किया है जो सिस्टम का हिस्सा बनकर संवेदनहीन हो चुका है। मनोज कहते हैं "मेरा किरदार यह दर्शाता है कि कैसे एक आम इंसान धीरे-धीरे फाइलों और आंकड़ों के बीच अपनी इंसानियत खो देता है।"
फिल्म को लेकर विवाद और सेंसर बोर्ड
खबर यह भी है कि फिल्म के कुछ दृश्यों को लेकर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जताई थी, खासकर उस सीन पर जहाँ कोर्ट के अंदर वकील रावी (तापसी पन्नू) पितृसत्तात्मक सोच पर तीखी टिप्पणी करती हैं। लेकिन अनुभव सिन्हा अपनी बात पर अड़े रहे। उनका कहना था "अगर हम कड़वे सच को मीठा करके दिखाएंगे, तो फिल्म का मकसद ही खत्म हो जाएगा।" अंततः फिल्म को 'A' सर्टिफिकेट के साथ बिना किसी बड़े कट के पास किया गया।
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सोशल मीडिया पर भी फिल्म को लेकर दो फाड़ देखने को मिल रहे हैं। जहाँ एक तरफ लोग इसे 'मस्ट वॉच' बता रहे हैं, वहीं कुछ का मानना है कि ऐसी फिल्में क्या बताना चाहती है? लेकिन जैसा कि नसीरुद्दीन शाह ने फिल्म के एक सीन में कहा है "सच्चाई नकारात्मक नहीं होती, वो बस सच होती है। उसे नजरअंदाज करना सबसे बड़ी बुराई है।"
एक गंभीर और विचारोत्तेजक सिनेमा:
'अस्सी' सिर्फ एक फिल्म नहीं है, यह हर उस भारतीय के लिए एक सबक है जो सोचता है कि ये सब सिर्फ खबरों तक सीमित है। फिल्म का अंत कोई सुखांत नहीं है, बल्कि यह एक खुला सवाल छोड़ता है—कि क्या 80 का यह आंकड़ा कभी कम होगा? नारी सशक्तिकरण का असली मतलब सिर्फ कानून बनाना नहीं, बल्कि एक ऐसा सुरक्षित माहौल बनाना है जहाँ किसी 'परिमा' को रात में घर लौटते वक्त डर न लगे।
जो दर्शक ऐसा देखना चाहते हैं जो आपको झकझोर दे और आपको बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा दे, तो 'अस्सी' देखने जरूर जाइये।
फिल्म 'अस्सी' गुलशन कुमार और टी-सीरीज़ पेश करते हैं, जो बनारस मीडिया वर्क्स का प्रोडक्शन है तथा भूषण कुमार, कृष्ण कुमार और अनुभव सिन्हा ने प्रोड्यूस किया है।
यह फिल्म सिर्फ थिएटर में रिलीज़ होगी।
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