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Who was Mr. P.K. Bajaj? कागज़, स्याही और सपनों का साम्राज्य लोटपोट और मायापुरी के युगपुरुष श्री पी. के. बजाज को श्रद्धांजलि

लाहौर की मिट्टी से शुरू हुई वह कहानी किसी साधारण जीवन की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसे सफ़र की शुरुआत थी जो आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता, कार्टून और फिल्म पत्रिकाओं के इतिहास में एक अमिट अध्याय बन गया...

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A tribute to Mr P K Bajaj the great man of Lotpot and Mayapuri the kingdom of paper ink and dreams
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लाहौर की मिट्टी से शुरू हुई वह कहानी किसी साधारण जीवन की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसे सफ़र की शुरुआत थी जो आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता, कार्टून और फिल्म पत्रिकाओं के इतिहास में एक अमिट अध्याय बन गया. भारत-पाकिस्तान के बँटवारे का वह समय था जब सरहदें खिंच रही थीं, लोग अपने घरों से उजड़ रहे थे और अनगिनत परिवार अपने अतीत को पीछे छोड़कर एक अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ रहे थे. उसी उथल-पुथल के बीच एक नन्हा बालक अपने दादा के साथ लाहौर से चलकर हिंदुस्तान की धरती पर आ पहुँचा. उस छोटे से बच्चे के मन में शायद उस समय कोई सपना स्पष्ट नहीं था, पर इतिहास चुपचाप उसके लिए एक बड़ी भूमिका तैयार कर रहा था. अपने पीछे छूटी गलियों और यादों को दिल में सँजोए वह बच्चा धीरे-धीरे दिल्ली की नई ज़मीन पर जीवन के नए अध्याय लिखने लगा.

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दिल्ली के हाथीख़ाना इलाके में जब उनके पिता श्री ए. पी. बजाज ने एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की, तब वह बालक अक्सर चुपचाप उस प्रेस के आसपास मंडराता रहता था. उस उम्र में जहाँ दूसरे बच्चे खेल में खोए रहते हैं, वह बच्चा मशीनों की आवाज़ में जैसे कोई संगीत सुनता था. कागज़ के बड़े-बड़े रोल मशीनों पर चढ़ते, स्याही की महक हवा में घुलती और धीरे-धीरे वही सफ़ेद कागज़ कैलेंडर, डायरियों और छपी हुई दुनिया में बदल जाते. वह बालक कोने में खड़ा होकर यह सब बड़े ध्यान से देखता—कभी मशीनों की गति को, कभी स्याही से रंगते अक्षरों को. शायद उसी समय उसके मन में यह एहसास जन्म ले रहा था कि कागज़ और स्याही केवल छपाई के औज़ार नहीं हैं, बल्कि विचारों और कल्पनाओं को अमर बनाने की शक्ति रखते हैं. वही नन्हा दर्शक आगे चलकर इस संसार का एक महत्वपूर्ण शिल्पकार बनने वाला था.

समय की धारा आगे बढ़ी और परिवार तिहाड़ एक्सटेंशन के उस क्षेत्र में आकर बस गया जिसे आज पूरी दुनिया मायापुरी के नाम से जानती है. दिलचस्प बात यह है कि उस इलाके की पहचान भी आगे चलकर “मायापुरी” फिल्म पत्रिका के कारण ही बनी. धीरे-धीरे यह स्थान हिंदी फिल्म पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया. यहाँ से निकलने वाली खबरें, इंटरव्यू और फिल्मी दुनिया की कहानियाँ देशभर के पाठकों तक पहुँचने लगीं. इसी वातावरण में वह बालक बड़ा हुआ, जिसने बचपन में कागज़ के रोलों को घूमते देखा था. अब वही दुनिया उसके सामने नए रूप में खुल रही थी—पत्रकारिता, संपादन और रचनात्मकता की दुनिया.

PK BAJAJ

जब श्री पी. के. बजाज ने लोटपोट और मायापुरी जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन अपने हाथों में लिया, तब लोगों ने उनकी असली प्रतिभा को पहचाना. यह केवल पत्रिकाएँ निकालने का काम नहीं था, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक धारा को दिशा देना था जो लाखों पाठकों के जीवन का हिस्सा बनने वाली थी. लगभग 56 वर्षों तक लोटपोट और 52 वर्षों तक मायापुरी को उन्होंने जिस ऊँचाई पर पहुँचाया, वह अपने-आप में एक मिसाल है. इन पत्रिकाओं के पन्नों में केवल खबरें या कार्टून नहीं होते थे, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की हँसी, कल्पना और सपने बसते थे. बच्चे लोटपोट का इंतज़ार करते थे, और फिल्म प्रेमी मायापुरी के अगले अंक की प्रतीक्षा में रहते थे.

लोटपोट की दुनिया में न जाने कितने अमर पात्र जन्मे. मोटू-पतलू, चेला राम और अनगिनत कार्टून चरित्रों ने बच्चों की दुनिया में एक नया जादू पैदा किया. इन पात्रों ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि हिंदी कॉमिक्स की संस्कृति को एक मजबूत पहचान दी. यह सब केवल संयोग नहीं था—इसके पीछे एक संपादक की दृष्टि, धैर्य और रचनात्मकता को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी. उनकी मेज़ पर अक्सर नए-नए कलाकारों और लेखकों की रचनाएँ आतीं, और उनमें से कई को वह पहचान लेते जो आगे चलकर इतिहास बन जाते.

प्रतिभा को पहचानने की उनकी दृष्टि सचमुच विलक्षण थी. के. एस. भारद्वाज, माणिक पांडे, मजूमदार, ज़ेड. ए. ज़ोहर, के. पी. सक्सेना, महान कार्टूनिस्ट प्राण और आशा प्राण जैसे अनेक रचनाकारों को उन्होंने मंच दिया. उनके लिए संपादक होना केवल प्रूफ पढ़ना या पन्ने सजाना नहीं था; वह एक गुरु की तरह थे जो नए कलाकारों को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते थे. पिछले लगभग 47 वर्षों से डॉ. हरविंदर मांकड़, जो मोटू-पतलू की रचनात्मक यात्रा को आगे बढ़ा रहे हैं, उन्हें भी उन्होंने परखा, समझा और अवसर दिया. यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—वह प्रतिभा को पहचानते थे और उसे सही समय पर सही मंच प्रदान करते थे.

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मायापुरी को उन्होंने जिस मुकाम पर पहुँचाया, वह हिंदी फिल्म पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज है. एक समय ऐसा था जब बॉलीवुड में यह कहा जाता था कि जब तक किसी अभिनेता या अभिनेत्री का इंटरव्यू मायापुरी में न छपे, तब तक वह असली “स्टार” नहीं माना जाता. यह केवल एक पत्रिका की लोकप्रियता नहीं थी, बल्कि उस विश्वास और प्रतिष्ठा का प्रतीक था जो पाठकों और फिल्म जगत ने उस मंच को दिया था. मायापुरी के पन्नों में सिनेमा की दुनिया धड़कती थी—सितारों की कहानियाँ, संघर्ष, सपने और पर्दे के पीछे की अनकही दास्तानें.

आज जब हम उस पूरे सफ़र को याद करते हैं तो महसूस होता है कि यह केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि एक पूरे युग की कहानी थी. एक ऐसा युग जिसमें कागज़, स्याही और कल्पना ने मिलकर लाखों लोगों के दिलों में जगह बनाई. श्री पी. के. बजाज केवल एक संपादक नहीं थे; वह एक दूरदर्शी मार्गदर्शक, एक सृजनकर्ता और एक सांस्कृतिक धरोहर थे.

लोटपोट और मायापुरी परिवार की ओर से इस महान विभूति को शत-शत नमन. उनकी कमी शायद कभी पूरी नहीं हो सकेगी, क्योंकि कुछ लोग केवल अपने समय के लिए नहीं जीते—वे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी रास्ते छोड़ जाते हैं. उनकी स्मृतियाँ, उनके बनाए किरदार, उनके संपादकीय निर्णय और उनकी दृष्टि आज भी उतनी ही जीवित हैं जितनी उस समय थीं जब प्रेस की मशीनें चलती थीं और कागज़ पर नई दुनिया जन्म लेती थी.

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और शायद हर बार जब लोटपोट का कोई पन्ना पलटा जाएगा या मायापुरी का कोई पुराना अंक हाथ में आएगा, तो ऐसा लगेगा जैसे वह आत्मा अब भी वहीं कहीं मौजूद है—कागज़ों के ढेर के बीच, स्याही की खुशबू में, एक नई कहानी को जन्म देने की तैयारी करते हुए.

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