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टीवी की दुनिया में 11 सालों से दर्शकों का दिल जीत रहा सुपरहिट शो ‘भाबीजी घर पर हैं’ अब फिल्म ‘भाबीजी घर पर हैं फन ऑन द रन’ (Bhabiji Ghar Par Hain - Fun on the Run) के रूप में सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही है. इस खास मौके पर शो और फिल्म के क्रिएटिव हेड व प्रोड्यूसर संजय कोहली (Sanjay Kohli) से मायापुरी मैगजीन की पत्रकार प्रियंका यादव ने खास बातचीत की. इस बातचीत में उन्होंने फिल्म से लेकर निजी जीवन तक पर खुलकर बात की. आइये जानते हैं उन्होंने क्या कहा...
‘भाबीजी घर पर हैं फन ऑन द रन’ को टीवी से फिल्म के रूप में लाने का आइडिया कैसे आया?
ये शो पिछले 11 साल से लगातार चला है और अपने चैनल का नंबर वन शो है. हम बहुत उत्सुक थे कि इसे फिल्म में कैसे लाया जाए. टीवी पर हम वही चीज़ नहीं दिखा सकते जो रोजाना शो में होती है. फिल्म में पूरे लोकेशन और बड़े सेट्स हैं. हम रवि किशन (Ravi Kishan), मुकेश तिवारी (Mukesh Tiwari) और अन्य लोकप्रिय कलाकारों को एकसाथ लाए. पूरी टीम और सभी कलाकार देहरादून गए और फिल्म पर काम किया. हमारे शो के डायरेक्टर शशांक जी (Shashank) ने फिल्म डायरेक्शन किया. स्क्रिप्ट राइटर रघुवीर शिखावत (Raghuveer Shikhawat) ने कहानी लिखी. इस दौरान हमारे राइटर मनोज संतोषी (Manoj Santoshi) का निधन हो गया, इसलिए यह फिल्म उन्हें समर्पित है. उनकी कहानी का असली फ्लेवर और आत्मा हमने बरकरार रखा.
क्या रवि किशन (Ravi Kishan) की मौजूदगी से फिल्म की कॉमेडी और अपील को एक अलग स्तर पर ले जाने की कोशिश की गई है?
फिल्म में उनका किरदार बिल्कुल नए अंदाज़ में पेश किया गया है. कॉमेडी में सबसे ज़रूरी तत्व मजबूत, यादगार और ऑर्गेनिक किरदार होते हैं, जो कहानी के साथ गहराई से जुड़े हों और दर्शकों को तुरंत आकर्षित करें. रवि किशन का रोल फिल्म में उनकी एनर्जी, टाइमिंग और कॉमिक सेंस के साथ एक अलग लेवल की हँसी पेश करता है. उनके संवाद, उनके अंदाज़ और उनकी परफॉर्मेंस कहानी में न सिर्फ हल्कापन लाती है बल्कि दर्शकों को पात्रों के साथ जोड़ती भी है. इसके अलावा फिल्म में कोई भी किरदार छोटा नहीं है—हर कलाकार की अपनी अहमियत है और हर सीन में कॉमेडी का संतुलन बनाए रखा गया है. यह सुनिश्चित किया गया है कि दर्शक हर पल आनंद लें, हँसते रहें और फिल्म का अनुभव फ्रेश और इंटरटेनिंग लगे.
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कॉमेडी में मज़ाक गंदा या अपमानजनक नहीं होना चाहिए—आज के दौर में इस संतुलन को बनाए रखना कितना मुश्किल हो गया है?
कॉमेडी सबसे मुश्किल जॉनर है. इसमें किसी को ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए. ‘भाबीजी’ की कॉमेडी हमेशा इनोसेंट, क्यूट और फैमिली फ्रेंडली रही है. डबल मीनिंग भी सीमित और मासूम अंदाज़ में होती है, जिससे हँसी आए, न कि असहजता. उदाहरण के लिए, कभी भी ऐसा मज़ाक नहीं किया जाता जो डबल अर्थ वाला लगे; हर संवाद पूरी तरह सीधे और हल्के-फुल्के अंदाज़ में होता है, ताकि दर्शक हँसें लेकिन किसी को असहज महसूस न हो. इस फिल्म में भी यही कोशिश की गई है—किरदारों की हर हरकत और हर सीन में कॉमेडी का संतुलन बना रहे. कहानी को इस तरह लिखा गया है कि हँसी आती रहे, लेकिन किसी की भावनाओं का उल्लंघन न हो. यही कारण है कि ‘भाबीजी’ की कॉमेडी हर उम्र के दर्शकों के लिए मनोरंजक और सुरक्षित बनी रहती है. मनोज संतोषी (Manoj Santoshi) इस फिल्म से गहराई से जुड़े रहे. वे एक बेहद टैलेंटेड और यूनिक राइटर थे. दुर्भाग्यवश अब वे हमारे बीच नहीं हैं. यह फिल्म उन्हें समर्पित है.
आपकी जीवनसाथी बिनैफर कोहली का आपके करियर में बहुत बड़ा योगदान रहा है—वो आपको व्यक्तिगत और प्रोफेशनल तौर पर कैसे पूरा करती हैं?
हम दोनों पिछले 35 सालों से साथ हैं और यह समय न केवल व्यक्तिगत बल्कि पेशेवर रूप से भी हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है. ऑफिस में सिर्फ एक बॉस होता है—और वह मैं हूँ. हालांकि हम अपने-अपने विभाग और काम को संभालते हैं, लेकिन हर महत्वपूर्ण फैसला हम मिलकर लेते हैं. यही तरीका हमें व्यक्तिगत और प्रोफेशनल लाइफ में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है. बिनैफर मेरे करियर में सिर्फ एक पार्टनर नहीं हैं; वह मेरी सबसे बड़ी ताकत और सहारा भी हैं. वह न केवल ऑफिस में मेरे फैसलों को समझती हैं, बल्कि हर चुनौती में साथ देती हैं, सलाह देती हैं और जरूरत पड़ने पर जिम्मेदारियाँ संभालती हैं. इसी समझ और संतुलन की वजह से हमने हमेशा टीम को भी सही दिशा में ले जाकर काम किया. हमारा यही बैलेंस और आपसी समझ ही हमारी सबसे बड़ी ताकत रही है.
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जब आपने पहली बार एक प्रोड्यूसर के तौर पर खुद को इंडस्ट्री में साबित किया, उस समय की सबसे बड़ी सीख क्या रही?
सबसे बड़ी सीख है डिसिप्लिन और टाइमलाइन का महत्व. प्रोड्यूसर को हमेशा तैयार रहना पड़ता है—कभी लोकेशन बदलनी पड़ती है, कभी कलाकार बीमार हो जाते हैं. हर परिस्थिति में शांत रहकर, त्वरित निर्णय लेना और टीम को संभालना जरूरी है. इंडस्ट्री ने मुझे यह सिखाया कि केवल क्रिएटिविटी ही नहीं, बल्कि संगठन, समय प्रबंधन और फायरफाइटर जैसी तत्परता भी सफलता के लिए उतनी ही अहम है. यही सीख मुझे हर प्रोजेक्ट में अपने टीम और काम को बेहतर तरीके से संभालने में मदद करती है.
मायापुरी मैगज़ीन के साथ ऐसा कोई अनुभव या याद जो आज भी आपको खास लगती हो?
मायापुरी के साथ मेरा सफर बहुत पुराना और खास रहा है. कई बार हमारी मेहनत और शोज़ को उन्होंने कवर किया, कभी-कभी आलोचना भी की, लेकिन हर पल ने मुझे सिखाया कि मीडिया का सामना धैर्य और समझदारी से करना कितना जरूरी है. कुछ कटिंग्स आज भी मेरे पास हैं, जो मुझे याद दिलाती हैं कि इस इंडस्ट्री में सम्मान और मेहनत का मूल्य हमेशा बना रहता है.
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