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फ़िल्मों और टीवी की दुनिया में हम अक्सर ऐसे कलाकार देखते हैं जो परदे पर किरदार निभाते हैं, तालियाँ बटोरते हैं और फिर अगले प्रोजेक्ट की ओर बढ़ जाते हैं। लेकिन कभी-कभी इस चकाचौंध भरी दुनिया में कोई ऐसा चेहरा भी दिख जाता है, जो परदे के बाहर ज़िंदगी का सबसे बड़ा और सबसे कठिन रोल निभा रहा होता है। बिना मेकअप, बिना कैमरे और बिना तालियों की अभिलाषा के ।
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डॉ. उदय मोदी उन्हीं चंद लोगों में से एक हैं। टीवी दर्शकों के लिए वे एक जाना-पहचाना अभिनेता हैं। कलर्स चैनल के ‘मेरी आशिकी तुमसे ही’, ‘उतरन’, ‘इश्क़ का रंग सफ़ेद’ से लेकर स्टार प्लस के ‘मेरे अंगने में’, ज़ी टीवी के ‘एक था राजा एक थी रानी’, ‘वो अपना सा’, ‘सपने सुहाने लड़कपन के’, सोनी के ‘सीआईडी’, ‘ये जो मोह मोह के धागे’, सोनीसब टीवी के ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’, ‘यम हैं हम’, लाइफ ओके के ‘बदतमीज़ दिल’, ‘लौट आओ तृषा’, ‘टशन-ए-इश्क़’ और दूरदर्शन के ‘पवित्र बंधन’ जैसे कई शोज़ में वे अलग-अलग किरदारों में नज़र आ चुके हैं। गुजराती और बंगाली फिल्मों में भी उन्होंने काम किया है।
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लेकिन हैरानी की बात यह है कि डॉ. उदय मोदी खुद को पहले अभिनेता नहीं बल्कि पहले डॉक्टर मानते हैं। उससे भी पहले वे अपने को साढ़े तीन सौ माता पिता का बेटा मानते हैं। एक ऐसा बेटा, जो उन माँ-बाप का सहारा बना, जिनके अपने बच्चों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। डॉक्टर उदय उन गरीब, अकेले, बीमार, दिव्यांग बुजुर्गों के सहारा हैं जिन्हे वे रोज भर पेट भोजन, दवाइयां और सर्जरी के खर्च मुहैया कराते हैं।
नेट की दुनिया इस गुड समारिटन के सतकर्मों की खबरों और उनके इंटरव्यू से भरी पड़ी है। जब मैंने उनसे इंटरव्यू का वक्त तय करके बात शुरू की, तो पहला सवाल वही था, जो शायद हर फ़िल्म पत्रकार के मन में आता है। मैंने पूछा — “आप इतने सालों से टीवी और फिल्मों में काम कर रहे हैं। क्या एक्टिंग आपके लिए आपका करियर है?”
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डॉ. उदय मोदी बोले, “एक्टिंग मेरा करियर नहीं है। एक्टिंग मेरा ज़रिया है।”
मैंने उनसे कहा कि आम तौर पर लोग एक्टिंग इसलिए करते हैं ताकि नाम बने, पैसा बने, पहचान बने। वे बोले, “मैं एक्टिंग इसलिए करता हूँ ताकि कोई बुज़ुर्ग भूखा ना सोए।”
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यहीं से यह बातचीत एक इंटरव्यू नहीं रही, इंसानियत की कहानी बन गई।
डॉ. उदय मोदी पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं। मुंबई के मीरा-भायंदर इलाके में उनका छोटा-सा क्लिनिक है। यहीं एक दिन एक बुज़ुर्ग, जो अक्सर उनसे दवाई लेने आते थे, उनके पास आए। उम्र करीब अठहत्तर साल। बुजुर्ग की पत्नी लकवे से बिस्तर पर थीं।
डॉ. उदय मोदी उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, “वो दवा लेने आए थे। जाते-जाते वे रोने लगे। जब कारण पूछा तो वे बोले, "डॉक्टर साहब, आज घर में खाना नहीं है। मेरी पत्नी को लकवा हो गया, इलाज में पैसे खर्च हो गए, अब तो ये हाल है कि कोई अनाज दे कर भी जाए, तो हम खाना नहीं बना पाएंगे। हम दोनों बीमार है। ” यह सुनते ही डॉक्टर उदय सकते में आ गए और उन्होने वादा कर दिया, "अंकल आप घर जाइए, आज रात से रोज़ आपके घर पंहुच जाएगा।"
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मैंने प्रश्न किया “उस एक वाक्य ने आपको इतना बदल दिया?”
वे थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले, “जब माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं, तो वो बच्चों जैसे हो जाते हैं और जब बच्चा भूखा होता है, तो बेटा चैन से नहीं सो सकता।”
उसी रात से उन्होंने उस बुज़ुर्ग दंपति के लिए खाना भिजवाया। घर आकर पत्नी से बात की। दोनों के मन में एक ही सवाल था — क्या यह बस एक ही बुजुर्ग की कहानी है? अगले कुछ दिनों में जवाब मिल गया।
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डॉ. उदय मोदी और उनकी पत्नी ने मन में कुछ ठान लिया। उन्होने आसपास पर्चे बाँटे कि "अगर कहीं ऐसे बूढ़े माँ-बाप हों, जिनका कोई सहारा नहीं, तो बताइए। पहले एक टिफिन बना , फिर ग्यारह और आज, हर महीने सैकड़ों टिफिन, साढ़े तीन सौ से ज्यादा ।
इस सेवा का नाम रखा गया ‘श्रवण टिफिन सेवा’।
मैंने उनसे पूछा, “इस नाम के पीछे क्या सोच थी?”
उन्होंने कहा, “श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कंधे पर बैठाया था। मैं उन्हें कंधे पर नहीं बैठा सकता, लेकिन उन्हें भूखा भी नहीं छोड़ सकता।”
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डॉ. उदय मोदी सिर्फ़ खाना नहीं देते। वे दवा देते हैं, बीमारियों का इलाज करते हैं, डायबिटीज़ वालों के लिए अलग खाना बनवाते हैं और खुद हर दिन खाना भेजने से पहले उन्हे चखते हैं। वे कहते हैं, “अगर खाना मैं खुद नहीं खा सकता तो किसी और को कैसे खिला दूँ?”
इस पूरी सेवा का खर्च आसान नहीं है। हर महीने हजारों रुपये लगते हैं। मैंने उनसे पूछा, “इतना पैसा कहाँ से आता है?” वे सीधे बोले, “ कुछ टीवी और फिल्मों में एक्टिंग करने से और कुछ अच्छे लोगों से, जो खुद मेरे टिफिन सेवा से जुड़कर दान देते हैं। मेरे श्रवण सेवा ग्रुप में ऐसे खाना बनाने वाले और टिफिन डिलीवरी करने वाले लोग हैं जिन्हे मैंने हायर किया है लेकिन कई ऐसे सेवाभावी लोग भी हैं जो अपना फ्री टाइम मेरे टिफिन सेवा में मदद करने के लिए दे देते हैं, यह भी तो दान है, श्रम दान ।”
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"फ़िल्म इंडस्ट्री या टीवी इंडस्ट्री से किसी ने आपकी मदद की या कर रहे हैं?"
"मिथुन चक्रवर्ती जी ने मुझे मदद की और यह भी कहा कि जब भी जरूरत हो, मुझे कहना। मिथुन चक्रवर्ती ने मुझे इस सेवा कर्म के लिए अवार्ड भी प्रदान किया है। टीवी जगत में भी सभी मेरे इस काम की तारीफ करते हैं। रियालिटी शोज में मुझे इन्वाइट करके मेरे काम के बारे में दुनिया को बताया। शिल्पा शेट्टी जी, सुप्रसिध्द निर्देशक अनुराग बसु, और भी बहुत से स्टार्स ने मेरा सम्मान किया।
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"आप टीवी जगत और फ़िल्म जगत में पंद्रह वर्षों से ज्यादा काम कर रहें हैं, इन इंडस्ट्रीज़ के इमोशन के बारे में क्या कहेंगे?"
इस पर डॉक्टर उदय बोले, " मैं बचपन से अभिनय जगत में हूं। जब मैं गुजरात में रहता था तो मेरे पिता जी के एक मित्र, जो गुजराती फिल्मों से जुड़े थे, ने मुझे एक फ़िल्म में एक किरदार निभाने के लिए कहा। वहीं से अभिनय जगत में मेरी शुरुआत हुई और फिर मुंबई शिफ्ट होने के बाद भी मैं अभिनय से जुड़ा रहा। ये इंडस्ट्री इमोशन पर नहीं चलती। यह बात आप भी जानती है सुलेना मैम। यहां सब अपने अपने काम में बिजी रहते हैं, किसी के पास किसी के लिए समय नहीं। इंडस्ट्री में भी बहुत से लोग मानव सेवा करते तो हैं, लेकिन कम पड़ जाता है। और भी सेवा के हाथ उठने चाहिए क्योंकि यहां दुखी, बेसहारा बुजुर्गों की कमी नहीं। मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं कि आंधी आए या तूफान, मैं जीवन भर गरीब, बेसहारा, बीमार बुजुर्गों को भोजन, दवाई, प्यार और सम्मान देता रहूं, एक बेटे की तरह। मेरे बाद मेरे बच्चे यह जिम्मेदारी उठाएंगे यह मैं जानता हूं। ईश्वर की गोद में बैठ कर मैं श्रवण सेवा करने का साहस कर रहा हूं। मुझे पैसों की कभी कमी ना आए, यह प्रार्थना है। मैं मेहनत करके पैसा कमाने से कभी पीछे नहीं हटता।
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यही वजह है कि डॉ. उदय मोदी आज भी सीरियल्स और फिल्में करते हैं। यही वजह है कि वे छोटे-बड़े रोल की परवाह नहीं करते, उन्हे यहां से जो कमाई होती है, वो टिफिन सेवा में लगा देते हैं। क्योंकि उनके लिए असली रोल परदे के बाहर है।
उनके बच्चे भी इस जिम्मेदारी को समझते हैं। बचपन से उन्होने खिलौने नहीं मांगे, जो जेब खर्च उन्हे दिया जाता था , वो भी वे पिगी बैंक में जमा करते थे और फिर एक दिन, वो सब पैसे पापा को दे देते थे टिफिन सेवा के लिए। आज भी वे हर तरह से मदद करते हैं।
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आज डॉक्टर उदय मोदी का सपना है कि वे एक ऐसा बड़ा सा घर बनाए जहां उन बुजुर्गों को घर जैसे वातावरण में बसाया जा सके जो बिस्तर से उठ नहीं सकते और खुद कुछ नहीं कर सकते। डॉक्टर उदय बोले, "यह घर वृद्धाश्रम नहीं होगा , बल्कि ‘बेटे का घर’ होगा । एक ऐसी जगह, जहाँ बुज़ुर्ग सिर्फ़ ज़िंदा ना रहें, बल्कि सम्मान से जी सकें।" डॉक्टर मोदी ने बताया कि उन्होने उत्तन में पच्चीस हज़ार स्क्वेयर फीट की एक जमीन खरीद ली है और उसपर आश्रम भी बन चुका है, फर्नीचर बन रहा है। मई महीने में आश्रम शुरू हो जाएगा जो उन बीमार, आश्रयहीन बुजुर्गों का घर होगा जो बिस्तर से उठ नहीं सकते। जब पूछा कि इतना खर्चा कैसे उठाते हैं, तो वे बोले, "मैं जो भी कमाता हूँ सब इस सेवा में डाल देता हूं और सच कहूं तो अच्छे काम करने वालों को कमी नहीं होती। दूर दूर से लोग मुझे ढूंढते हुए आते हैं और दान में हाथ बंटाते हैं। ईश्वर की दया से अब तक कोई परेशानी नहीं आई। कोरोना के समय थोड़ी परेशानी हुई थी, लेकिन उस दौर में भी दूर दूर से दानवीर लोग मुझे ढूंढते हुए आकर अनाज दान करते थे। सब लोग अच्छे कर्म में मेरे साथ है। कोई धन दान करते हैं। कोई श्रम दान करते हैं। मायापुरी जैसी लोकप्रिय पत्रिका भी तो अपने तरीके से हमारी मदद कर रही हैं, मेरे बारे में छाप कर, लाखों लोगों तक मेरे बारे में बता कर। अब और लोग जुड़ते रहेंगे। "
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इस बातचीत के बाद जब मैं उनसे विदा ले रही थी, तो मुझे एहसास हुआ, डॉ. उदय मोदी अभिनेता ज़रूर हैं, लेकिन जो असली काम जीवन के रंग मंच पर वे रोज़ करते हैं उसका कोई जवाब नहीं। इस रंगमंच में कोई स्क्रिप्ट नहीं, कोई कट नहीं लेकिन फिर भी हर दिन दिल से निभाया जाने वाला एक ही किरदार होता है, वो है बेटे का किरदार।
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