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जब किसी फिल्म को “सच्ची घटनाओं से प्रेरित” कहा जाता है, तो दर्शक स्वाभाविक रूप से कहानी के पीछे छिपे वास्तविक संदर्भ तलाशने लगते हैं। ‘O Romeo’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। फिल्म के ट्रेलर और प्रचार सामग्री में अब तक यह संकेत दिया गया है कि कथा केवल रोमांस तक सीमित नहीं, बल्कि अपराध और भावनात्मक प्रतिशोध की जमीन पर खड़ी है। ऐसे में Triptii Dimri का किरदार विशेष रूप से ध्यान खींचता है।
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निर्देशक Vishal Bhardwaj की फिल्मों में स्त्री पात्र अक्सर सतही नहीं होते। वे कहानी की गति तय करते हैं, नैतिक द्वंद्व को सामने लाते हैं और कई बार पुरुष नायक से अधिक जटिल दिखाई देते हैं। ‘O Romeo’ में तृप्ति का प्रस्तुतिकरण भी कुछ वैसा ही है। उनका किरदार केवल प्रेमिका की परंपरागत छवि में सीमित नजर नहीं आता, बल्कि उसके भीतर एक दबा हुआ संघर्ष और कठोरता की झलक मिलती है।
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फिल्म के कुछ दृश्यों में उनका चेहरा शांत है, लेकिन परिस्थितियाँ अशांत। यह विरोधाभास फिल्म के स्वर को समझने की कुंजी हो सकता है। यदि कहानी सचमुच किसी वास्तविक घटना से प्रेरित है, तो उसका भावनात्मक भार केवल घटनाओं में नहीं, बल्कि किरदारों की आंतरिक टूटन में दिखाई देगा। तृप्ति का अभिनय इसी बारीकी पर टिका दिखाई देता है।
क्या ‘O Romeo’ में तृप्ति डिमरी का किरदार केवल प्रेम कहानी का हिस्सा है, या वह उसके भीतर छिपी अंधेरी परतों की आवाज़ है? ये दर्शक तय करे।
फिल्म में उनके साथ Shahid Kapoor हैं, जिनका किरदार भी एक नए संघर्ष और भावनात्मक उथल-पुथल से गुजरता है। दोनों के बीच का संबंध केवल रोमांटिक आकर्षण तक सीमित नहीं दिखता। उसमें अविश्वास, खतरा और प्रतिशोध की छाया भी है। यही परतें फिल्म को साधारण प्रेम कहानी से अलग बनाती हैं।
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पिछले कुछ वर्षों में तृप्ति डिमरी ने अपने किरदारों के चयन में एक स्पष्ट परिपक्वता दिखाई है। उन्होंने ऐसी भूमिकाएँ चुनी हैं जिनमें भावनात्मक विस्तार और मनोवैज्ञानिक गहराई हो। ‘O Romeo’ उसी क्रम की अगली कड़ी हो सकती है। यदि उनका किरदार वास्तव में किसी वास्तविक स्त्री की कहानी से प्रेरित है, तो यह प्रस्तुति और भी जिम्मेदारी लेकर आती है। वास्तविकता से जुड़ी कथा में अभिनय केवल प्रदर्शन नहीं रहता, बल्कि संवेदनशीलता की परीक्षा बन जाता है।
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यह भी उल्लेखनीय है कि हिंदी सिनेमा में हाल के वर्षों में महिला किरदारों को शो पीस वाली सहायक नहीं, बल्कि कथा के नैतिक केंद्र के रूप में गढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐसे समय में ‘O Romeo’ जैसी फिल्म, जो प्रेम और अपराध के द्वंद्व को साथ लेकर चलती है, अपनी नायिका से अतिरिक्त गहराई की मांग करती है। तृप्ति के लिए यह अवसर है कि वह इस भावनात्मक तीव्रता को संयम के साथ निभाएं बिना अतिनाटकीयता के, बिना दिखावटी तीखेपन के।
जब फिल्म प्रतिशोध और निजी क्षति की पृष्ठभूमि पर खड़ी है, तो तृप्ति का किरदार केवल प्रतिक्रिया देने वाला नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाला भी होना चाहिए। दर्शक अब उस स्त्री को देखना चाहते हैं जो परिस्थिति की शिकार भर न हो, बल्कि अपनी कहानी खुद लिखने का साहस रखती हो।
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हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फिल्म को प्रेरित कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि किसी जीवनी के रूप में। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि वास्तविक घटनाओं से कुछ तत्व लेकर कहानी को काल्पनिक रूप दिया गया हो। ऐसे में तृप्ति का किरदार प्रतीक भी हो सकता है — उस स्त्री का प्रतीक, जो प्रेम, हानि और प्रतिशोध के बीच अपनी पहचान खोजती है।
सवाल बॉक्स ऑफिस से आगे का है। क्या दर्शक थिएटर से निकलते समय कहानी से अधिक उस स्त्री को याद रखेंगे? क्या तृप्ति डिमरी इस भूमिका के माध्यम से अपनी छवि में एक नया आयाम जोड़ पाएँगी?
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‘O Romeo’ उनके करियर में सिर्फ एक और फिल्म नहीं, बल्कि एक संभावित मोड़ की तरह देखी जा रही है। अब यह फिल्म तय करेगी कि यह मोड़ एक गहरी रेखा बनता है या केवल एक गुजरता हुआ पड़ाव।
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