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सुप्रसिद्ध गीतकार, फिल्म निर्माता और शायर गुलज़ार साहब (अब 91 बरस के) फिर से बच्चों की फ़िल्म के लिए गाना लिखने जा रहे हैं। यह जानकारी गुलज़ार साहब के एक ताज़ा इंटरव्यू में सामने आई है जिसमें उन्होंने अपनी भावनाएँ, अपने फ़ैसले और अपनी ज़िंदगी से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें भी शेयर की हैं। (Gulzar latest interview revelations)
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बॉलीवुड का चेहरा गुलज़ार साहब जिनका नाम सुनते ही हमारे ज़हन में गीतों की मिठास, शायरी की दिल धड़काने वाली गहराई और कविताओं का दिलकश ज़ज़्बा घूमने लगता है — अब 91 बरस की उम्र में भी बच्चों के लिए गीत लिखने के लिए वापस लौट रहे हैं। वह भी खास वजह से। हाल ही में अपने बांद्रा वाले बंगले में बात करते हुए गुलज़ार साहब ने बताया कि बच्चों के लिए लिखना उनके लिये केवल इच्छा नहीं बल्कि एक ज़िम्मेदारी है, क्योंकि आजकल बच्चों के खेल-कूद और बचपन के लम्हें कहीं खोते जा रहे हैं।
उनका नया प्रोजेक्ट 'मसाब टैंक' है, जो हैदराबाद के एक ऐसे हिस्से का नाम भी है जहाँ बच्चों का खेल का मैदान इमारतों में बदल दिया गया है। इस कहानी ने गुलज़ार साहब को बहुत प्रभावित किया, और उन्हे झकझोरा भी। इसलिए वे अपनी भावनाओं को गीतों के ज़रिये और गहराई देना चाहते हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि लिखना बच्चों के लिए सिर्फ चाहत नहीं बल्कि फ़र्ज़ है क्योंकि बचपन की खुशी, बचपन की बेफिक्री, कल्पनाओं की दुनिया तथा खेल की आवाज़ को बचाना आज ज़रूरी है।
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गुलज़ार का बचपन से बच्चों से गहरा नाता रहा है। उन्होंने 'लकड़ी की काठी' (फिल्म 'मासूम, 1983), जैसे ना जाने कितने बच्चों के गीत लिखकर बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी खुशी और आनंद से भर दिया। उन्होने विश्व प्रसिध्द बालपत्रिका' लोटपोट ' के जगत प्रसिद्ध टून कैरेक्टर्स मोटू पतलू सीरीज़ अनिमेशन फिल्मों के लिए दिल खुश करने वाले गीत लिखे हैं जो आज भी हर छोटे-बड़े की जुबान पर है। इसी तरह' जंगल जंगल पता चला है' ने कई बच्चों की दुनिया को रंगीन बनाया है। इसीलिए, जब उनसे पूछा गया कि क्या वे अपनी बेटी मेघना गुलज़ार की अगली फ़िल्म 'दायरा' में भी साथ काम करेंगे — तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि फिलहाल उस फ़िल्म में कोई गीत नहीं हैं, इसलिए वे फिलहाल गीत न लिख पाने को लेकर थोड़ा दुःख ज़ाहिर कर रहे हैं।
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गुलज़ार साहब कहते हैं कि वे 'बच्चों के लिए लिखना तभी तक जारी रखेंगे जब तक वे ख़ुद फिर से बच्चे बनने का हुनर सीख सकें' यह पंक्ति कितनी प्यारी और दिल को छूने वाली सोच है उस महान शायर की, जिन्होने अपने जीवन के लगभग हर हिस्से में बच्चों से खेलने, उन्हे खिलाने और कलम से एक अलग दुनिया, एक अलग सोच रचने का आनंद लिया है। (Gulzar 91 years age creative journey)
वर्तमान समय में जब बहुत से गीतकार कहानी से दूर हटकर सिर्फ फ़ैशन योग्य गाने लिख रहे हैं, गुलज़ार साहब की यह सोच और भी मायने रखती है। वे चाहते हैं कि विशाल भारद्वाज जैसे और भी जवान फ़िल्म निर्माता–संगीतकार बच्चों की फ़िल्में बनाते रहें, क्योंकि उनके अंदर वह खास टैलेंट है जो बच्चों को सीधा अपने दिल तक जोड़ सके।
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रोचक बात यह है कि गुलज़ार साहब सिर्फ गीतकार ही नहीं, बल्कि एक मज़बूत सोच वाले इंसान भी हैं, जिन्होंने लगभग 40 बरस से 'विशेष ज़रूरत वाले बच्चों' के लिए काम किया है। वे बताते हैं कि वे ‘अरूषि’ नाम की संस्था के साथ लंबे समय से जुड़े हैं, जहां बच्चे हर साल मैराथन में भाग लेते हैं और वे उनके साथ चलते हैं। यह उनकी इंसानियत की जुस्तजू और बच्चों के प्रति सच्ची मोहब्बत को दर्शाता है।
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आज के जमाने में बच्चों की ज़िंदगी पर कई तरह के दबाव भरे हुए है। स्कूल, पढ़ाई, कोचिंग, मोबाइल, स्क्रीन, प्रतियोगिता, तमाम ज़िम्मेदारियाँ। इन सबने बचपन को कहीं दबा दिया है। ऐसे में कोई महान कलाकार अपनी लेखनी से बच्चों के लिए फिर गीत लिखे, ये उम्मीद की एक किरण है। बच्चों की खुशी, खेल का मज़ा, गीतों की दुनिया — ये सब वापस लौटने की ओर बढ़ रहे हैं। (Gulzar emotional interview insights)
गुलज़ार साहब के जीवन की बात करें तो उन्होंने अपने लम्बे करियर में 22 से ज़्यादा फिल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स जीते हैं — जो कि अब तक के गीतकार, संगीतकार, इंडस्ट्री में किसी भी अभिनेता या निर्देशक से ज़्यादा है। गाने, डायलॉग, कहानी — हर फ़ील्ड में उनका नाम इतिहास बन चुका है।
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गुलजार साहब द्वारा बच्चों के लिए लिखना सिर्फ फिल्मों तक के लिए सीमित नहीं है। गुलज़ार साहब कहते हैं कि यही वह तरीका है जिससे हम बच्चों को स्वभाव, संवेदना, कल्पना और भाषा की ख़ूबसूरती सिखा सकते हैं। यह वही चीज़ें हैं जो आज के डिजिटल ज़माने में खोती जा रही हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि इन गीतों में सरल बोल हों, दिल को छूने वाले अल्फाज़ हों और बच्चों की सोच और उनकी दुनिया को समझने वाली कहानी हो।
और अगर भविष्य की बात करें, तो गुलज़ार साहब की यह सोच कि बच्चों के लिए लिखे गीत संगीत की दुनिया में एक मिसाल बने, बच्चों के लिए लिखना सिर्फ एक कहानी नहीं रहा, बल्कि एक मिशन बन चुका है, उनके गीत, उनकी शायरी, उनकी सोच — यह सब आज भी नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश में हैं, जिससे बच्चे भी अपनी आवाज़ समझें, अपनी कल्पना की उड़ान देखें और अपनी दुनिया को और सुंदर बनाएँ। (Children film songs by Gulzar)
इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि गुलज़ार जैसे शायर का यह कदम सिर्फ फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक प्यारा तोहफ़ा है। बच्चों के लिए गीत लिखना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें फिर उस मासूम दुनिया से जोड़ना — यह शायद गुलज़ार साहब की सबसे बड़ी विरासत है।
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गुलज़ार साहब आज भी बच्चों की दुनिया को उसी मासूम नज़र से देखते हैं।
उन्होंने कहा था, "खेलने का वक्त कभी उधार मत रखना, ये लौटकर नहीं आता"
उनकी यह पंक्ति, उनकी सोच और संवेदनशीलता का वो आकाश है जिसे छू पाना आम इंसान के लिए एक आशीर्वाद है ।
Legendary Lyricist- Music Composer Prem Dhawan | Legendary Lyricist Gulzar at Dil Pareshan Karta Hai | Indian Poet not present in content
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