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फिल्म: इक्कीस
भाषा: हिंदी
जॉनर: ड्रामा, एक्शन, वॉर
ड्यूरेशन: 2 घंटे 27 मिनट
डायरेक्टर: श्रीराम राघवन
कास्ट: धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, अगस्त्य नंदा, सिकंदर खेर, सिमर भाटिया, एकावली खन्ना
रेटिंग: 3.5 स्टार
Ikkis movie Review: धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म 'इक्कीस' नए साल की शाम को थिएटर में रिलीज़ हो गई है' इसमें अगस्त्य नंदा और सिमर भाटिया ने डेब्यू किया है. ऐसे में अगर आप इस फिल्म को देखने का प्लान बना रहे हैं तो आज हम आपको बताएंगे कि यह फिल्म कैसी है. आइए जानते हैं कैसा हैं इस फिल्म (Ikkis movie review) का रिव्यू.
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कहानी (Ikkis Plot)
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इक्कीस 1971 के फ्लैशबैक से शुरू होती है. अरुण (अगस्त्य नंदा), एक टैंक कमांडर, पाकिस्तान के साथ युद्ध में जा रहा है. ‘इक्कीस’ दो पैरेलल कहानियों के ज़रिए आगे बढ़ती है जो आखिर में एक-दूसरे से मिलती हैं. एक सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) के बारे में है, जिनकी 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बसंतर की लड़ाई के दौरान बहादुरी की वजह से उन्हें पहचान मिली और मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला. दूसरी कहानी उनके पिता, रिटायर्ड ब्रिगेडियर एमएल खेत्रपाल (धर्मेंद्र) पर केंद्रित है, जो तीन दशक बाद कॉलेज रीयूनियन के लिए पाकिस्तान जाते हैं और लाहौर में पाकिस्तानी आर्मी के ब्रिगेडियर नसीर (जयदीप अहलावत) के मेहमान बने रहते हैं. फिल्म में अरुण को एक बहुत अच्छा स्टूडेंट दिखाया गया है, जो डिसिप्लिन और आगे बढ़ने की पक्की चाहत से चलता है. दिल्ली में अपनी स्कूलिंग के बाद, वह 1967 में NDA में शामिल हो जाते हैं, और जल्द ही फॉक्सट्रॉट स्क्वाड्रन के कैडेट कैप्टन बन जाते हैं. शुरुआती हिस्से उनकी एकेडमी लाइफ, ट्रेनिंग की मुश्किलों और उस पल पर फोकस करते हैं जब तैयारी युद्ध की असलियत के सामने हार जाती है.
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एक्टिंग
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'इक्कीस' में लीड रोल अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने निभाया है, जिन्होंने अपने लुक और परफॉर्मेंस पर साफ तौर पर खूब मेहनत की है और स्क्रीन पर आते ही दर्शकों से एक सहज जुड़ाव बना लेते हैं. अरुण के साथ अक्षय कुमार की भांजी सिमर भाटिया ने इस फिल्म से अपना डेब्यू किया है और कम स्क्रीन टाइम के बावजूद उनका काम उम्मीद जगाने वाला नजर आता है. ‘इक्कीस’ की भावनात्मक रीढ़ धर्मेंद्र हैं, जो अपनी आखिरी फिल्म में अरुण के पिता के किरदार में बेहद संयमित और प्रभावशाली अभिनय करते हैं. बिना किसी बनावटी भावुकता के वह खामोशी, नजरों और सूक्ष्म हाव-भाव से गहरी छाप छोड़ते हैं. जयदीप अहलावत के साथ उनके दृश्य फिल्म की जान बन जाते हैं, जहां उनकी बातचीत दो किरदारों तक सीमित न रहकर दो पीढ़ियों, अलग सोच और एक साझा पीड़ा की अभिव्यक्ति बन जाती है.
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डायरेक्शन (Ikkis Direction)
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श्रीराम राघवन, अरिजीत बिस्वास और पूजा लाधा सुरती का स्क्रीनप्ले भावनात्मक रूप से ईमानदार महसूस होता है. फिल्म बहादुरी को शब्दों में नहीं बांधती, बल्कि दर्शकों को उसे महसूस करने का मौका देती है. हालांकि 143 मिनट की अवधि के चलते कहानी कहीं-कहीं धीमी पड़ती है. सेकंड हाफ में इमोशन पर ज्यादा निर्भरता के कारण कुछ सीन रिपीटेटिव लगते हैं, जिन्हें बेहतर एडिटिंग से और प्रभावी बनाया जा सकता था.
म्यूजिक (Ikkis Music)
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बेहद सधा हुआ और सुकून देने वाला है, जो खुद पर ध्यान खींचने के बजाय कहानी और दृश्यों के साथ स्वाभाविक रूप से बहता है. जंग के दृश्यों में टैंकों की गूंज, कमांड की आवाज़ें और धमाकों का शोर ही माहौल रच देता है, जबकि 2001 के हिस्सों में संगीत बेहद हल्का और शांत रखा गया है, जो बीती यादों, भावनाओं और अनकहे सवालों को और गहराई से उभारता है.
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देखे या नहीं
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दिवंगत कलाकार धर्मेंद्र और देश के वीर शहीद अरुण खेत्रपाल को समर्पित यह फिल्म एक सच्ची श्रद्धांजलि की तरह देखी जा सकती है. फौजियों के जीवन, उनके संघर्ष और भावनात्मक पहलुओं को समझने के लिए यह फिल्म खास है. संभव है कि यह ओटीटी पर ज़्यादा पसंद की जाए, लेकिन थिएटर में एक बार इसे देखना भी एक अलग अनुभव देता है. खासतौर पर फिल्म के अंत में दिखाया गया डिस्क्लेमर जरूर देखा जाना चाहिए. हालांकि, अगर आप इमोशनल और शांत रफ्तार वाली फिल्में देखना पसंद नहीं करते, तो यह फिल्म शायद आपके लिए न हो.
Tags : IKKIS full movie | Jaideep Ahlawat
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