Mayasabha review

ताजा खबर: जिस तरह तुम्बाड बारिश में भीगा हुआ एक प्राचीन मिथक रचता था, उसी तरह निर्देशक राही अनिल बारवे की फिल्म ‘मायासभा’ (Mayasabha movie) धुएं से भरी एक डरावनी और लगभग डिस्टोपियन दुनिया रचती है. फर्क बस इतना है कि यहां कहानी किसी काल्पनिक देवी-देवता की नहीं, बल्कि एक खस्ताहाल सिंगल स्क्रीन थिएटर और उसमें कैद इंसानी पागलपन की है. यह फिल्म अपने वातावरण के जरिए डर पैदा करती है — बिना किसी पारंपरिक हॉरर फॉर्मूले के.फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसका लोकेशन है. उजड़ा हुआ थिएटर, जिसकी दीवारें सड़ चुकी हैं, पर्दे धूल से भरे हैं और हर कोने में धुआं फैला रहता है — यह जगह खुद एक किरदार बन जाती है. थिएटर की यह स्थायी वीरानी समय के ठहराव जैसी लगती है, जैसे यहां जिंदगी नहीं, सिर्फ बीता हुआ कल कैद हो.

Read More: परिणीति चोपड़ा-साइना नेहवाल अनफॉलो ड्रामा पर टूटा सस्पेंस

कहानी: सोना, पागलपन और चार जिंदगियां (Mayasabha review)

कहानी (Mayasabha film story) केंद्रित है परमेश्वर खन्ना (जावेद जाफरी) पर, जो कभी फिल्म प्रोड्यूसर हुआ करता था और अब मानसिक रूप से टूट चुका है. वह अपने बेटे वासु (मोहम्मद समद) के साथ इसी उजड़े थिएटर में रहता है. थिएटर के अंदर कहीं 40 किलो सोना छिपा है — लेकिन परमेश्वर खुद भूल चुका है कि उसने उसे कहां रखा है.वासु यह बात रावणा (दीपक दामले) और उसकी चालाक बहन ज़ीनत (वीना जमकर) को बता देता है. लालच में दोनों थिएटर पहुंचते हैं. जो रात शुरू होती है पार्टी से, वही रात खत्म होती है मौत और तबाही के साथ.

जावेद जाफरी का अब तक का सबसे अलग अवतार (Javed Jaaferi Mayasabha)

जावेद जाफरी इस फिल्म की आत्मा हैं. उन्होंने ऐसा किरदार निभाया है जो डरावना भी है, दयनीय भी और रहस्यमयी भी. सफेद बाल, बिखरा हुआ शरीर, अनिश्चित हरकतें और आवाज में लगातार बदलता उतार-चढ़ाव — वह एक ऐसे इंसान लगते हैं जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खो चुका है.परमेश्वर हमेशा धुएं में रहता है, DDT स्प्रे मशीन से लगातार धुआं फैलाता रहता है — जैसे वह असलियत से भागकर किसी और दुनिया में जीना चाहता हो. उसकी यादें बिखरी हुई हैं, कहानियां भ्रम से भरी हैं और दिमाग अतीत में अटका हुआ.

Read More: मॉडलिंग से बॉलीवुड-हॉलीवुड तक, जानिए कैसे बनीं इंटरनेशनल स्टार

पिता-पुत्र का टूटा रिश्ता

फिल्म के केंद्र में सिर्फ सोना नहीं, बल्कि एक टूटता हुआ पिता और मजबूर बेटा है. मोहम्मद समद एक बार फिर ऐसे बच्चे के रूप में नजर आते हैं जो बहुत जल्दी बड़ा हो जाता है. हिंसा, डर और पागलपन के बीच उसकी मासूमियत धीरे-धीरे खत्म होती जाती है.यह रिश्ता भावनात्मक रूप से फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा है, लेकिन निर्देशक इसे सीधे नहीं, बल्कि प्रतीकों और वातावरण के जरिए दिखाते हैं.

सिनेमैटोग्राफी और टोन

फिल्म (Mayasabha Hindi movie) की सिनेमैटोग्राफी बेहद प्रभावशाली है. कैमरा हमेशा अंधेरे, धुएं और संकरी जगहों में घूमता रहता है. रोशनी और छाया का इस्तेमाल इस तरह किया गया है कि हर फ्रेम में बेचैनी महसूस होती है.‘मायासभा’ किसी एक जॉनर में नहीं बंधती — यह कभी थ्रिलर है, कभी ड्रामा, कभी साइकोलॉजिकल हॉरर. फिल्म की फिलॉसफी भी खुलकर सामने नहीं आती, बल्कि “hidden in plain sight” की तरह बिखरी रहती है.

Read More:  तलाक की अफवाहों पर आकांक्षा चमोला ने तोड़ी चुप्पी, बोलीं – ‘गौरव और मेरे बीच...’

FAQ

1. ‘मायासभा’ किस तरह की फिल्म है?

‘मायासभा’ एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर और ड्रामा फिल्म है, जिसमें हॉरर और रहस्य के तत्व भी शामिल हैं.

2. ‘मायासभा’ के निर्देशक कौन हैं?

फिल्म के निर्देशक राही अनिल बारवे हैं, जिन्होंने इससे पहले तुम्बाड बनाई थी.

3. ‘मायासभा’ के लीड एक्टर कौन हैं?

फिल्म में मुख्य भूमिका जावेद जाफरी ने निभाई है.

4. ‘मायासभा’ की कहानी किस बारे में है?

कहानी एक खस्ताहाल सिंगल स्क्रीन थिएटर में रहने वाले एक मानसिक रूप से टूट चुके प्रोड्यूसर और उसके बेटे की है, जहां 40 किलो सोना छिपा हुआ है.

5. फिल्म का मुख्य थीम क्या है?

फिल्म पागलपन, लालच, समय का ठहराव और पिता–पुत्र के रिश्ते को गहराई से दिखाती है.

Read More:जानिए बिग बॉस से कितना अलग है 'द 50' शो

Advertisment
Web Stories