Mohammed Rafi का वह गीत जिसके बगैर यार-दोस्तों की महफिल थी अधूरी...

मोहम्मद रफी ने साल 1966 में रिलीज हुई फिल्म 'सूरज' के लिए एक गीत गाया था‚ जिसके बोल हैं – बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है। इस गीत को गाने वाले मोहम्मद रफी की आवाज की खास खासियत है...

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That song of Mohammed Rafi without which the gathering of friends was incomplete

मोहम्मद रफी के कई गीतों ने वक्त और सरहद की दीवारों को लांघ कर पूरी दुनिया में लोकप्रियता हासिल की। प्रसिद्ध सिने लेखक विनोद कुमार मोहम्मद रफी के गाए उस गीत के बारे में बता रहे हैं जो आज भी लोगों की जुबान पर है। आज भी जब बारात दरवाजे लगती है तो बैंड वाले इस गाने को जरूर बजाते हैं और बारात में शामिल लोग खूब झूमते हैं। 

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मोहम्मद रफी ने साल 1966 में रिलीज हुई फिल्म 'सूरज' के लिए एक गीत गाया था‚ जिसके बोल हैं – बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है। इस गीत को गाने वाले मोहम्मद रफी की आवाज की खास खासियत है कि 56 साल से भी अधिक समय बाद भी इस गाने का क्रेज कम नहीं हुआ है। 

यह गीत गीतकार हसरत जयपुरी की कलम के कमाल और शंकर जयकिशन के संगीत का एक नायाब नमूना है। बीबीसी रेडियो की ओर से कराए गए एक सर्वे में इस गीत को इस सदी का सबसे अधिक लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत करार दिया गया। 

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विशाल कैनवास और भव्य सेटों वाली फिल्म सूरज 25 मार्च 1966 को सिनेमा घरों में रिलीज हुई थी। इसका निर्देशन टी प्रकाश राव ने किया था और निर्माण एस कृष्णमूर्ति ने टी गोविंद राजन के साथ मिलकर किया था। इस फिल्म ने पांच करोड़ का बिजनेस किया और ढाई करोड का मुनाफा कमाया और इस तरह से यह साल 1966 की दूसरी सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म बनी। आईबीओएस डॉट कॉम के अनुसार अगर आज के इंफ्लेशन के हिसाब से देखा जाए तो यह रकम पांच सौ करोड बैठती है। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट करार दी गई। 

फिल्म के हीरो थे राजेन्द्र कुमार और हीरोइन बनी थी‚वैजयंतीमाला। इस जोड़ी ने फिल्म सूरज के अलावा 'आस का पंक्षी'‚ 'संगम' और 'जिंदगी' जैसी फिल्मों में साथ काम किया। फिल्म सूरज राजेंद्र कुमार की अंतिम हिट फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में मुमताज‚ अजीत‚ जॉनी वाकर‚ ललिता पवार‚ नीतू सिंह आदि ने भी भूमिकाएं निभाई थी। 

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यह फिल्म जब बनी थी तब एक तरफ गायकी दुनिया में मोहम्मद रफी का जलवा था तो अदाकारी के मामले में राजेंद्र कुमार यानी कि जुबली कुमार का जलवा था। कहा जाता है कि सूरज बनाने का आइडिया राजेंद्र कुमार का ही था। उन्होंने ने ही फिल्म के निर्माता एस कृष्णमूर्ति को 1961 में मद्रास में हुई एक मुलाकात के दौरान दिया था इस फिल्म को बनाने का आइडिया दिया था।  

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फिल्म सूरज के पहले राजेंद्र कुमार की फिल्में रोमांस और मेलोड्रामा से भरी होती थीं। राजेंद्र कुमार ने एस कृष्णमूर्ति से कहा कि अगर बहुत ज्यादा पैसा कमाना है तो मुझे लेकर ऐसी फिल्म बनाओ जिसमें लड़ाई हो, तलवारबाजी हो, राजकुमार हो, राजकुमारी हो, राजकुमार को राजकुमारी से मोहब्बत हो। राजकुमारी ऐसी हो कि बस लोग देखते रह जाएं। कहा जाता है कि राजेंद्र कुमार ने सूरज की राजकुमारी अनुराधा के रोल के लिए वैजयंती माला का नाम सुझाया। उनके हिसाब से वैजयंती माला एक राजकुमारी की तरह दिखती थी। 

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राजेंद्र कुमार ने कृष्णमूर्ति की एक और सलाह दी और वो यह कि फिल्म रंगीन होनी चाहिए। उनका कहना था कि अगर ज्यादा पैसा कमाना है तो ज्यादा खर्च भी करना पड़ेगा। कहा जाता है कि प्रोड्यूसर कृष्णमूर्ति ने जुबली कुमार की हर बात मानी। कुछ सालों बाद इसपर काम शुरू हुआ। एस कृष्णमूर्ति ने टी गोविंद राजन के साथ मिलकर इस फिल्म को प्रोड्यूस किया। बड़े – बडे  भव्य सेटों और बड़े कैनवास पर बनी यह रंगीन फिल्म 1966 में रिलीज हुई। 

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इस फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन ने दिया था। फिल्‍म के गीतकार थे शैलेंद्र और हसरत जयपुरी। शैलेंद्र ने जहां 'देखो मेरा दिल मचल गया' और 'तितली उड़ी उड़ जो चली' गीत को कलमबद्ध किया था, वहीं हसरत जयपुरी ने 'कैसे समझाऊं बड़ी नासमझ हो, इतना है तुमसे प्यार मुझे, चेहरे पर गिरीं जुल्‍फें, बहारो फूल बरसाओ और ओ एक बार आता है दिन ऐसा' जैसे पांच गाने लिखे। 

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ये सभी गाने लोगों के दिलों पर खूब छाए और फिल्म जबरदस्त पसंद की गई। इस फिल्म के गाने बहारो फूल बरसाओ को उस दौर में तीन फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले। पहला अवार्ड सर्वश्रेष्ठ गीतकार का हसरत जयपुरी साहब को, दूसरा अवार्ड सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के लिए शंकर जयकिशन को और तीसरा अवार्ड इस गाने को आवाज देने वाले मोहम्मद रफी साहब को। इस तरह से संगीत के मामले में सूरज ने हर तरह से बाजी मार ली।

उस साल के फिल्म फेयर अवार्ड में पाश्र्व गायन कैटेगरी में लता मंगेशकर के दो गानों को भी नॉमिनेट किया गया था। लता मंगेशकर के गाए वे दो गानों में एक गाना फिल्म गाइड का गाना आज फिर जीने की तमन्ना है था तथा दूसरा गाना फिल्म दो बदन का गाना था – लो आ गई उनकी याद। लेकिन रफी साहब के गाए गाने बहारों फूल बरसाओ ने हर तरह से बाजी मार ली। 

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यही नहीं संगीतकारों की श्रेणी में सूरज के संगीतकार शंकर जयकिशन का मुकाबला गाइड के संगीतकार एस डी बर्मन और दो बदन के संगीतकार रवि के बीच था लेकिन अवार्ड शंकर जयकिशन ने जीता। गीतकारों के कैटेगरी में सूरज के गीतकार हसरत जयपुरी का मुकाबला दो बदन के संगीतकार शकील बदाउनी तथा तीसरी कसम के गीतकार शैलेन्द्र के बीच मुकाबला था। लेकिन हसरत जयपुरी को बहारों फूल बरसाओ के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया। ही। गौरतलब है कि सूरज के गीतकारों में शैलेन्द्र भी शामिल थे।

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साल 2013 में बीबीसी रेडियो ने सर्वे के आधार पर हिन्दी फिल्म इतिहास के अब तक के 100 सर्वश्रेष्ठ गीतों की जो सूची तैयार की उसमें सूरज का यह गाना पहले नम्बर पर रखा गया। यह गाना जब से आया तब से अब तक हर शादी में बजाया जाता है। 

बाद में बहारों फूल बरसाओ गीत की धुन के आधार पर एक अंग्रेजी गीत भी तैयार किया गया जिसे मोहम्मद रफी ने ही गाया था। इस गीत के बोल हैं ‘ऑल्दो वी हेल फ्रॉम डिफरेंट लैंड्स' मोहम्मद रफी ने यह अंग्रेजी गीत गाकर लोगों को हैरान कर दिया था। क्योंकि मोहम्मद रफी को अंग्रेजी नहीं आती थी।

कहा तो यहां तक जाता है कि रफी साहब ऑटोग्राफ की फरमाइश मुस्कुरा कर ठुकरा देते थे, क्योंकि उन्हें अंग्रेजी में खूबसूरत-सा हस्ताक्षर करना नहीं आता था। लेकिन रफी साहब ने अंग्रेजी में दो गीत गाए।  दूसरा गीत ‘द शी आई लव’ है जो ‘गुमनाम’ (1965) फिल्म के मशहूर ‘हम काले हैं तो क्या हुआ’ की तर्ज पर बनाया गया। इन दोनों ही गीतों को संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने इन गीतों को तैयार किया था। फिल्म सूरज शंकर जयकिशन की अंतिम सफलतम फिल्मों में प्रमुख थी। इस फिल्म में शंकर ने एक नई नवेली गायिका शारदा को मौका दिया था। कहा जाता है कि शारदा के गानों ने खासकर 'तितली उडी उड जो चली' गीत ने ऐसी धूम मचाई की स्वर कोकिला लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी स्थापित गायिकाओं का सिंहासन हिल गया था। 

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बहारों फूल बरसाओ गीत तब हिंदुस्तान के हर कस्बे, हर शहर और हर महानगर में बजा और खूब बजा। रेडियो बिनाका माला में तो लंबे समय तक बजा और उस साल पहले पायदान पर रहा। यह गीत लोगों के दिलों – दिमाग में बैठ गया। इस गीत की लोकप्रियता इस बात का सबूत है कि इस गीत के गायक गाते नहीं थे बल्कि शब्दों को जीते थे। उनके गीत युवाओं की धड़कन, उनके अहसास की अभिव्यक्ति का माध्यम थे। ये उनका जादू ही है जो ऐसे गीत वर्षों बाद भी हम सबके सिर चढ़कर बोलता है।

बीबीसी रेडियो के सर्वे में पहले नम्बर से 20 वें नम्बर तक आए गानों की सूची

1. 'बहारों फूल बरसाओ' - सूरज

2. 'आवारा हूं' - आवारा

3. 'तुझे देखा तो' - दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे

4. 'अजीब दास्तां है ये' - दिल अपना और प्रीत पराई

5. 'कभी कभी मेरे दिल' मैं' - कभी-कभी

6. 'तेरे लिए' - वीर-जारा

7. 'ये दोस्ती' - शोले

8. 'प्यार किया तो डरना क्या' - मुगल-ए-आजम

9. 'छैया छैया' - दिल से..

10 . 'चलते चलते' - पाकीज़ा

11. 'कल हो ना हो' - कल हो ना हो

12. 'आज फिर जीने की तमन्ना' - गाइड

13.'कुछ कुछ होता है' - कुछ कुछ होता है

14.'मौजा ही मौजा' - जब वी मेट

15. 'ऐ मेरे हमसफर' - कयामत से कयामत तक

16. 'चौदहवीं का चांद हो' - चौदहवीं का चांद

17. 'आजा सनम' - चोरी चोरी

18. 'पहला नशा' - जो जीता वही सिकंदर

19. 'धीरे-धीरे से' - आशिकी

20. 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' - यादों की बारात

लेखक के बारे में : 

विनोद कुमार मशहूर फिल्म लेखक और पत्रकार हैं जिन्होंने सिनेमा जगत की कई हस्तियों पर कई पुस्तकें लिखी हैं। इन पुस्तकों में ʺमेरी आवाज सुनोʺ‚ ʺसिनेमा के 150 सितारेʺ‚ ʺरफी की दुनियाʺ के अलावा देवानंद‚ दिलीप कुमार और राज कपूर की जीवनी आदि शामिल हैं।

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