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Republic Day की पूर्व संध्या पर हुई घोषणा: मरणोपरांत Dharmendra को मिलेगा सर्वोच्च सम्मान ‘पद्म विभूषण’

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने का ऐलान किया, जिसने भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम और भावुक सफर को सम्मानित किया।

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25 जनवरी की शाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक सुनहरा लेकिन भावुक पल दर्ज हो गया, जब गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने बॉलीवुड के ‘ही-मैन’ के नाम से मशहूर स्व. धर्मेंद्र सिंह देओल को देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ (मरणोपरांत) से नवाजने का फैसला किया। यह खबर हर उस भारतीय के दिल को छू गई, जिसने धर्मेंद्र को पर्दे पर मुस्कुराते, लड़ते और प्यार करते देखा है। धर्मेंद्र तो हमेशा हर भारतीय के दिलों के असली ‘विभूषण’ रहे हैं और रहेंगे।

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1960 में फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से शुरू हुआ धर्मेंद्र का अभिनय सफर उनकी मौत के कुछ समय बाद 1 जनवरी 2026 को रिलीज़ हुई उनकी अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’ पर आकर थमा। ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ में उनके साथ बलराज साहनी और कुमकुम भी थीं। तीन सौ फिल्मों में अभिनय करने वाले धर्मेंद्र के नाम ही सर्वाधिक सफल फिल्में देने का रिकॉर्ड दर्ज है। ऐसा रिकॉर्ड उनके अलावा किसी अन्य अभिनेता के नाम नहीं है। लेकिन धर्मेंद्र का यह 65 साल लंबा करियर साधारण नहीं था, बल्कि एक ऐसे कलाकार की कहानी थी, जिसने हमेशा अपने किरदारों के ज़रिए समाज को कोई न कोई संदेश दिया। धर्मेंद्र ने अपनी हर फिल्म के माध्यम से अपने प्रशंसकों को कुछ न कुछ प्रेरणा देने का ही काम किया।

Dil Bhi Tera Hum Bhi Tere (1960)

यह अलग बात है कि नब्बे के दशक के बाद धर्मेंद्र ने जे पी दत्ता व कुछ अन्य निर्देशकों के साथ कुछ ऐसी फिल्मों में अभिनय किया कि उनकी इमेज एक्शन स्टार की बनी। कुछ लोग उन्हें ‘कुत्ते... कमीने...’ जैसे संवादों के लिए भी याद करते हैं। पर सबसे बड़ा सच यह है कि धर्मेंद्र सिर्फ एक्शन हीरो नहीं थे। धर्मेंद्र उन गिने-चुने कलाकारों में से हैं, जिन्होंने बिना किसी खास विचारधारा वाली संस्था से जुड़े अपनी फिल्मों और किरदारों के ज़रिए सामाजिक सरोकार के मुद्दों को बखूबी उठाया। 1960 में रिलीज़ उनकी पहली फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ में गरीबी, वेश्यावृत्ति और समाज के हाशिए पर पड़े लोगों के जीवन संघर्षों की बात की गई है। फिल्म में पंचू (धर्मेंद्र) का किरदार संघर्ष और प्यार के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक बुराइयों के बीच फंसे किरदारों की त्रासदी को दर्शाता है। यह फिल्म गहरा सामाजिक संदेश देती है कि परिस्थितियाँ लोगों को गलत रास्ते पर धकेलती हैं, पर उनमें अच्छाई की उम्मीद बाकी रहती है।

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Dil Bhi Tera Hum Bhi Tere (1960) - IMDb

1962 की मोहन कुमार निर्देशित फिल्म ‘अनपढ़’ सामाजिक सरोकार के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करती है। 1969 की फिल्म ‘सत्यकाम’ भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ईमानदार व्यक्ति की जंग दिखाती है, जो आज भी प्रासंगिक है। 1968 की फिल्म ‘आँखें’ देशप्रेम और जासूसी के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश देती है। 1974 की फिल्म ‘दोस्त’ में धर्मेंद्र ने जेल से छूटने के बाद समाज सुधार की बात करने वाला किरदार निभाया। तो वहीं उनकी अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’ में उन्होंने 1971 के युद्ध के नायक अरुण खेत्रपाल के पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल की भूमिका निभाई, जो देशभक्ति और बलिदान की मार्मिक मिसाल है। धर्मेंद्र ने जीवन और करियर की अंतिम फिल्म में समाज, देश व मानवता का जो संदेश दिया, वही संदेश उन्होंने 1964 में चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘हकीकत’ में बहादुर सिंह के किरदार के ज़रिए 61 साल पहले भी दिया था। इससे साफ होता है कि धर्मेंद्र अनपढ़ नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर काम करने वाले इंसान थे, जिन्हें समाज, देश और हर नागरिक की चिंता सताती थी।

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Anpadh (1962) - IMDb

Ankhen (1968) - IMDb

Ikkis (2026) - IMDb

धर्मेंद्र ने अपनी फिल्मों में संवादों के ज़रिए भी सामाजिक सरोकारों की बात की। मसलन, फिल्म ‘सत्यकाम’ का संवाद ‘‘सच की राह पर चलने वाले को दुनिया पागल कहती है, लेकिन असली सुकून उसी पागलपन में है।’’ ईमानदारी का संदेश देता है। फिल्म ‘अनुपमा’ का संवाद ‘‘इंसान के पास शब्द कम पड़ जाते हैं जब संवेदनाएँ गहरी होती हैं।’’ उनकी संवेदनशीलता का प्रतीक है। फिल्म ‘फूल और पत्थर’ का संवाद ‘‘दुनिया को नफरत से नहीं, ममता और प्यार से जीता जा सकता है।’’ परिवर्तन का संदेश देता है। रमेश सिप्पी की ‘शोले’ में ‘‘यह हाथ नहीं, फांसी का फंदा है!’’ अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने का प्रतीक है।

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Satyakam: Amazon.in: Dharmendra, Sharmila Tagore, Harisikesh Mukherji,  Dharmendra, Sharmila Tagore: Movies & TV Shows

Anupama (1966) - IMDb

जी हाँ! ‘अनुपमा’, ‘बंदिनी’, ‘खामोशी’, ‘चुपके चुपके’, ‘गुड्डी’, ‘सत्यकाम’ सहित हृषिकेश मुखर्जी और विमल राय की कई सफल फिल्मों में धर्मेंद्र ने संजीदा व सॉफ्ट पुरुष के किरदार निभाए। बतौर अभिनेता उन्होंने हमेशा उन किरदारों को तवज्जो दी जिन्होंने बड़े-बड़े सवाल बड़ी सादगी से उठाए। इन फिल्मों में उन्होंने बहुत परतों वाला काम किया।

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निजी जीवन में धर्मेंद्र ‘धरती पुत्र’ कहलाए। पंजाब के फगवाड़ा से आया वह सीधा-सादा लड़का ताउम्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहा। उनकी सादगी, कविताएँ और खेतों के प्रति प्रेम बताता है कि पद्म अवॉर्ड के लिए जो गरिमा और सामाजिक जुड़ाव चाहिए, वह उनके व्यक्तित्व में हमेशा था। प्रशंसकों और फिल्म जानकारों का मानना है कि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। उन्हें 2012 में पद्म भूषण मिला था, लेकिन उनके कद और योगदान को देखते हुए ‘पद्म विभूषण’ की प्रतीक्षा थोड़ी लंबी रही।

Missing posters of Dharmendra once appeared in Bikaner; Praised Hitler's  rule during his MP tenure and called his election rival as 'younger brother'

धर्मेंद्र सिर्फ सिनेमाई पर्दे के ‘हीरो’ नहीं थे। उन्होंने राजनीति में भी सेवा दी। 2004 से 2009 तक बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे। आलोचकों ने संसद में उनकी कम उपस्थिति पर सवाल उठाए, पर किसी ने नहीं देखा कि ज़मीन पर वे क्या काम कर रहे थे। उन्होंने सांसद निधि से ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के कमरे बनवाए, शिक्षा बेहतर की, सड़कों का जाल बिछाया, पानी की समस्या दूर की। बीकानेर के कलाकारों और पारंपरिक कला को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दिया। चुनाव प्रचार में कहा था – ‘‘मैं यहाँ राजनीति करने नहीं, लोगों की सेवा करने आया हूँ।’’ बीकानेर की सड़कों पर धूल उड़ाते प्रचार करते हुए वह सुपरस्टार नहीं, ‘धरती पुत्र’ नज़र आते थे। अब सरकार ने पद्म विभूषण देने का फैसला किया, तो बीकानेर की जनता गर्व से कह रही है कि उनके ‘सांसद जी’ को उनका हक मिल गया।

Dharmendra Discharged From Hospital

\Farewell to Dharmendra, a star larger than the screen

आज धर्मेंद्र हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन यह सम्मान उनकी उस विरासत को सलाम है जो उन्होंने 89 वर्षों में छोड़ी। भारत सरकार का फैसला करोड़ों प्रशंसकों के लिए सुकून भरी खबर है।

धर्मेंद्र को मरणोपरांत मिला पद्म विभूषण सिर्फ एक कलाकार का सम्मान नहीं, बल्कि उस सच्चाई और सादगी को सलाम है जिसे उन्होंने ‘सत्यकाम’ जैसी फिल्मों और बीकानेर के सांसद के तौर पर जिया।

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