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शाहिद कपूर उन कलाकारों में से हैं, जो हमेशा बड़ी साफगोई के साथ बात करना पसंद करते हैं। वह सवालों के जवाब देते समय भी बहानेबाज़ी नहीं करते। वह हर मसले पर अपनी स्पष्ट राय रखना पसंद करते हैं। फिलहाल वह अपनी 13 फरवरी को रिलीज़ होने वाली फिल्म ‘ओ रोमियो’ को लेकर उत्साहित हैं। साजिद नाडियाडवाला निर्मित और विषाल भारद्वाज निर्देशित इस फिल्म में शाहिद कपूर के साथ तृप्ति डिमरी हैं। इस फिल्म को लेकर कई तरह की बातें की जा रही हैं।
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कुछ लोग इसे गैंगस्टर फिल्म बता रहे हैं, तो कुछ लोग अति हिंसा प्रधान फिल्म की संज्ञा दे रहे हैं। आइए देखें कि खुद शाहिद कपूर क्या सोचते हैं?
पेश है ‘मायापुरी’ के लिए शाहिद कपूर से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के खास अंश...
‘कमीने’, ‘हैदर’ और ‘रंगून’ के बाद विषाल भारद्वाज के निर्देशन में ‘ओ रोमियो’ आपकी चौथी फिल्म है। तीन फिल्में करने के बाद विषाल भारद्वाज के साथ आपकी ऐसी क्या ट्यूनिंग बनी कि आपको लगा कि उनके साथ चौथी फिल्म करनी चाहिए और वह भी सात साल के अंतराल के बाद?**
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हंसते हुए शाहिद कपूर ने कहा – यह सही है कि हम दोनों पूरे सात-आठ साल बाद एक साथ जुड़े हैं। देखिए, हकीकत यही है कि विषाल सर कुछ ऑफर करें, तो मैं उसे सुनूँगा ज़रूर। लेकिन हम दोनों बहुत ही खुले दिमाग के साथ मिले थे। देखिए उनकी अपनी करियर की यात्रा है और मेरी अपनी करियर की यात्रा है। कभी तालमेल मिलता है, कभी नहीं भी मिलता है। हम सभी की अपनी निजी यात्रा होती है। तो हम दोनों जब मिले तो बहुत रिलैक्स थे। हमने तय किया कि हमें मज़ा आया और लगेगा कि हमें साथ में काम करना चाहिए, तो हम एक साथ काम करेंगे। लेकिन जैसे ही विषाल सर ने पूरी फिल्म सुनाई। उन्होंने सुनाना बंद किया, मैंने तुरंत अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा कि चलो सर, हम इस फिल्म को करते हैं। क्योंकि स्क्रिप्ट सुनते-सुनते मुझे अहसास हुआ कि मेरी फिल्मोग्राफी में यह फिल्म होनी चाहिए। निश्चित तौर पर मैंने कुछ वर्ष पहले अपने दिमाग में यह तय कर लिया था कि मुझे एक्सपेरिमेंटल चीज़ें नहीं करनी हैं। अच्छी फिल्में मगर वह जो बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँच सकें, वह करनी है। तो कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिनका विषाल दर्शक वर्ग होता है। और कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिनका दर्शक वर्ग थोड़ा सीमित होता है। इस सब्जेक्ट में मुझे लगा कि इसमें विषाल दर्शक वर्ग तक पहुँचने की क्षमता है। यदि यह फिल्म अच्छी बनी तो इसकी कहानी के साथ विषाल दर्शक वर्ग रिलेट कर सकता है। इमोशंस के साथ लोग जुड़ सकते हैं। कहानी भी ऑथेंटिक और नई है। इमोशंस भी ऑथेंटिक हैं। इसी के साथ एक्सेसिबल है। फिर निर्देशक के तौर पर विषाल सर थे, तो हाँ करने में देर नहीं लगी।
फिल्म की कहानी की किस एक बात ने आपके दिमाग में ऐसा असर किया कि स्क्रिप्ट खत्म होते ही आपने फिल्म करने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया...?
प्रेम कहानी...। मुझे इसकी प्रेम कहानी अच्छी लगी। दूसरी बात मुझे जो किरदार विषाल सर ऑफर कर रहे थे, तो वह अच्छा लगा...। मुझे लगा कि किरदार मज़ेदार है। डार्क भी है, एजी भी है। और उसके अंदर एक लवर बॉय का तत्व भी है। वह एक साथ ही डार्क और फनी है। तो मुझे लगा कि इस किरदार को निभाने में बहुत मज़ा आएगा।
फिल्म ‘ओ रोमियो’ का टीज़र व ट्रेलर देखने के बाद कुछ लोग इसे गैंगस्टर व हिंसा वाली फिल्म बता रहे हैं?
कहानी का बैकड्रॉप तो गैंगस्टर का ही है और मेरा किरदार दिखता भी गैंगस्टर ही है। पर मेरा कहना है कि यह नब्बे के गैंगस्टर की प्रेम कहानी है और सभी जानते हैं कि विषाल भारद्वाज की फिल्मों की दुनिया थोड़ी अनोखी और अजीब होती है। फिल्म के अंदर एक ड्रामा है, पर यह फिल्म थोड़ी क्विर्की है। यह एक ही साथ में डरावनी भी है, रोमांटिक भी और इमोशनल भी।
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जब आप ‘कबीर सिंह’ या हुसैन उस्तरा के किरदार निभाते हैं, तो इन किरदारों में घुस जाते हैं या आत्मसात कर लेते हैं। फिर इनसे छुटकारा पाने के लिए क्या करते हैं?
पहले इस तरह के किरदारों का असर मुझ पर होता था। जब मैं मैच्योर नहीं था, अपरिपक्व था। जब मैंने इतना अधिक काम नहीं किया था। 22-23 साल काम करने के बाद एक प्रोसेस होता है। जब शूटिंग खत्म हो जाती है, तो फिर मैं उस फिल्म या उस किरदार के बारे में ज़्यादा सोचता ही नहीं हूँ। शूटिंग खत्म करने के बाद घर आता हूँ। घर में परिवार है, पत्नी और बच्चे हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरे काम का असर मेरे बच्चों पर पड़े। मैं किरदार के माइंड स्पेस को लेकर घर तक नहीं आता। तो मैं बहुत ही कट-टू-कट हो गया हूँ। लेकिन मन में कहीं न कहीं उस किरदार की एक यात्रा रहती है। मीरा कई बार मुझसे कह चुकी हैं कि जब मैं नई फिल्म पर काम शुरू करता हूँ, तो उसे अहसास हो जाता है कि अब अलग ज़ोन या अलग मूड आ गया है। हल्का सा असर किरदार का हर जाता होगा। पर मेरी कोशिश रहती है कि शूटिंग खत्म, काम खत्म तो खत्म। मैं उसमें ज़्यादा वक्त बिताना पसंद नहीं करता...।
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कभी बच्चों ने आपसे कुछ नहीं कहा?
मुझे लगता है कि बच्चों को तो पता भी नहीं होता कि मैं कब कौन सी फिल्म कर रहा हूँ। मुझे बच्चों को इन सब चीज़ों से दूर रखना अच्छा लगता है। बच्चों की अपनी दुनिया है। मैं उनके लिए सिर्फ डैड/पिता ही रहना चाहता हूँ।
आपकी फिल्म ‘ओ रोमियो’ तेरह फरवरी यानी कि वैलेंटाइन डे के अवसर पर रिलीज़ हो रही है। वैलेंटाइन डे का मतलब प्यार का जश्न। लेकिन आपकी फिल्म डार्क है। खून-खराबा भी है। आपका किरदार भी भय को पैदा करने का प्रयास करता है। तो आप फिल्म ‘ओ रोमियो’ के माध्यम से वैलेंटाइन डे पर किस तरह का संदेश देना चाहते हैं?
हंसते हुए... वैलेंटाइन एक अच्छा सप्ताह है। ऐसा नहीं है कि हम वैलेंटाइन डे पर कोई संदेश देना चाहते हैं। ऐसा भी नहीं है। यह बहुत ही ज़्यादा मनोरंजक फिल्म है। मज़ेदार फिल्म है और दिल से यह एक प्रेम कहानी है। पर फिल्म की कहानी जिस दुनिया पर आधारित है, हम उसके प्रति भी ईमानदार हैं। यह ज़रूर कहूँगा कि इसमें जो मोहब्बत है, वह बहुत स्ट्रॉन्ग है। मुझे लगता है कि वैलेंटाइन डे के लिए यह फिल्म सही है। हाँ! फिल्म की जो दुनिया है, हम उसके प्रति ईमानदार हैं और अगर दर्शकों ने उसे स्वीकार कर लिया तो यह एक बहुत ताज़गीपूर्ण अनुभव होगा।
आपने ‘पाठशाला’ के बाद दूसरी बार नाना पाटेकर के साथ काम किया है?
जी हाँ! नाना पाटेकर के साथ ‘पाठशाला’ में काम करके मज़ा आया था। मैं आज ही उनसे बात कर रहा था। मैंने उनसे कहा कि सर, आपकी और मेरी केमिस्ट्री बहुत सेक्सी है। उनके साथ काम करने में बहुत मज़ा आता है। वह बेहतरीन कलाकार हैं। जब कैमरा ऑन होता है और वह परफॉर्म करना शुरू करते हैं, तो काम करने में मज़ा तो आता ही है, साथ में उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मैंने तो उनको बचपन से देखा है। इस फिल्म में हमारे बहुत मज़ेदार सीन हैं।
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तृप्ति डिमरी के साथ पहली बार आपने काम किया। आप दोनों की केमिस्ट्री की काफी चर्चा हो रही है। दोनों के बीच बर्फ कैसे पिघली थी?
काफी समय तक हमें फिल्म को लेकर बात करने का अवसर ही नहीं मिला। क्योंकि उस तरह के सीन चल रहे थे। फिर सबसे पहले फिल्म को ही लेकर बातें हुईं। वह भी अच्छी कलाकार हैं। उसका किरदार काफी स्ट्रॉन्ग है। सच कह रहा हूँ। इस फिल्म में लड़की का किरदार बहुत स्ट्रॉन्ग है। उन्हें बहुत अच्छा मौका मिला है। और उन्होंने बहुत मेहनत की है। पूरे दिल से काम किया है। उनके साथ काम करके मैंने इंजॉय किया। पहली बार इस फिल्म में हमारी जोड़ी बनी है। मुझे यह देखने के लिए बेसब्री से इंतज़ार है कि दर्शक उनके किरदार को किस तरह से स्वीकार करता है।
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किसी भी किरदार की तैयारी करते या उसे आत्मसात करते समय आप उसमें अपने जीवन के अनुभव और अपनी कल्पनाशक्ति में से किसका कितना उपयोग करते हैं?
देखिए इमोशंस तो रीयल होने चाहिए। अगर आप परदे पर इमोशंस फेक दिखाओगे, तो लोग यकीन नहीं करेंगे। इसके अलावा जब आप ज़्यादा स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, इसके अलावा शिक्षा लेते समय जो आपकी अलग-अलग तरह की यात्रा होती है, तो दुनिया में अलग-अलग तरह के इंसानों की अलग-अलग तरह की यात्रा होती है। कई हद तक आप यह सब सिनेमा से भी सीखते हैं और फिर आप आम ज़िंदगी में ऑब्ज़र्व करते हैं। कहानियाँ पढ़कर भी ऑब्ज़र्व करते हैं। निजी जीवन में लोगों को देखकर भी सीखते हैं। ऑब्ज़र्व करते हैं। तो मेरी समझ से ऑब्ज़र्वेशन बहुत महत्वपूर्ण है। फिर चाहे परफॉर्मेंस को ऑब्ज़र्व करना हो या निजी ज़िंदगी में किसी को ऑब्ज़र्व करना हो। यह जानकारी लेकर उसे इमोशनली परदे पर प्रोजेक्ट करना, यही तो क्राफ्ट है। अब यह अबिलिटी/क्षमता आपके अंदर है या नहीं है, पर इसे सिखाया नहीं जा सकता। इसे आप पॉलिश कर सकते हैं।
तो फिर कुकुरमुत्ते की तरह एक्टिंग के ट्रेनिंग स्कूल हैं इन्हें क्या कहेंगे?
यह बिज़नेस है। हम सभी स्कूल भी तो जाते हैं। एक ही स्कूल का एक बच्चा आईएएस बन जाता है तो कुछ बच्चे कुछ नहीं सीख पाते। ट्रेनिंग स्कूल आपको बेसिक चीज़ तो सिखा रहा है, उसके आगे आपका अपना टैलेंट। आपकी मेहनत... आपकी तकदीर...।
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हुसैन उस्तरा नब्बे के दशक का है। क्या उस वक्त लोग टैटू बनवाते थे?
हंसते हुए... आप फिल्म देखिए फिर आपकी समझ में आएगी। टैटू नब्बे के दशक में क्या बहुत समय से बनते आ रहे हैं। यह तो ऑथेंटिक चीज़ है।
टैटू के पीछे भी इंसान की कोई न कोई सोच होती है? हुसैन उस्तरा की सोच...?
सब कुछ अभी बता दूँगा, तो फिल्म में क्या देखेंगे... इतने सवाल तो विशाल सर ने भी नहीं पूछे। फिल्म देखने के बाद सवाल पूछिएगा।
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